उत्तर प्रदेश

महंगा पड़ सकता है एक्सप्रेसवे का सफर: लखनऊ-कानपुर मार्ग पर टोल दरों ने बढ़ाई यात्रियों की चिंता

उत्तर प्रदेश में तेजी से विकसित हो रहे सड़क नेटवर्क के बीच लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे को एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इसके शुरू होने से पहले ही टोल दरों को लेकर लोगों में असंतोष नजर आने लगा है। जहां सरकार इसे तेज और आधुनिक यात्रा का विकल्प बता रही है, वहीं आम यात्रियों को इसका खर्च भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। खासकर रोजाना सफर करने वाले लोगों के लिए यह एक्सप्रेसवे जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है।

नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) द्वारा तय की गई टोल दरों के अनुसार, कार, जीप और वैन जैसे हल्के वाहनों के लिए एक तरफ का टोल 275 रुपये रखा गया है। अगर कोई यात्री एक ही दिन में लौटता है, तो उसे 415 रुपये खर्च करने होंगे। यह राशि केवल टोल की है, इसमें पेट्रोल या डीजल का खर्च शामिल नहीं है। ऐसे में कुल यात्रा खर्च और अधिक बढ़ जाता है, जो आम आदमी के बजट को प्रभावित कर सकता है।

यह एक्सप्रेसवे करीब 3600 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया है और इसे दो चरणों में विकसित किया गया है। परियोजना का उद्देश्य लखनऊ और कानपुर के बीच यात्रा को तेज और सुगम बनाना था। हालांकि, इसके रूट को लेकर कुछ सवाल उठ रहे हैं। यह एक्सप्रेसवे सीधे कानपुर शहर तक नहीं पहुंचता, बल्कि उन्नाव के शुक्लागंज में समाप्त होता है। वहां से यात्रियों को गंगा नदी पार कर जाजमऊ होते हुए कानपुर में प्रवेश करना पड़ता है।

यही कारण है कि कई विशेषज्ञ और यात्री संगठन इस परियोजना के नामकरण पर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि इसे “लखनऊ-उन्नाव एक्सप्रेसवे” कहना अधिक उपयुक्त होगा, क्योंकि यह कानपुर शहर तक सीधी कनेक्टिविटी नहीं देता। इसके चलते एक्सप्रेसवे का समय बचाने वाला दावा भी पूरी तरह सही नहीं माना जा रहा है।

प्रशासन का दावा है कि एक्सप्रेसवे पर वाहन 35 से 40 मिनट में शुक्लागंज तक पहुंच जाएंगे। लेकिन वहां से कानपुर शहर तक पहुंचने में अतिरिक्त समय लग सकता है, खासकर जाजमऊ क्षेत्र में ट्रैफिक जाम की स्थिति के कारण। ऐसे में कुल यात्रा समय डेढ़ से दो घंटे तक हो सकता है, जो अपेक्षित समय से अधिक है।

इसके विपरीत, ट्रेन यात्रा को अधिक सुविधाजनक और सस्ता विकल्प माना जा रहा है। लखनऊ से कानपुर के बीच चलने वाली प्रमुख ट्रेनें जैसे तेजस एक्सप्रेस, शताब्दी एक्सप्रेस और वंदे भारत एक्सप्रेस यात्रियों को कम समय में गंतव्य तक पहुंचाती हैं। तेजस एक्सप्रेस लगभग 1 घंटा 10 मिनट में कानपुर पहुंचा देती है और इसका किराया करीब 489 रुपये है।

शताब्दी एक्सप्रेस का चेयरकार किराया लगभग 500 रुपये है और यह करीब 1 घंटा 18 मिनट में यात्रा पूरी करती है। वंदे भारत एक्सप्रेस भी इसी रूट पर तेज और आरामदायक सेवा प्रदान कर रही है, जिसका किराया करीब 490 रुपये है। इसके अलावा अन्य ट्रेनों में स्लीपर क्लास का किराया 150 रुपये तक है, जो आम यात्रियों के लिए काफी सस्ता विकल्प है।

यदि खर्च और समय दोनों की तुलना की जाए, तो ट्रेन यात्रा एक्सप्रेसवे से अधिक लाभकारी नजर आती है। एक्सप्रेसवे पर टोल के अलावा ईंधन का खर्च, वाहन की मेंटेनेंस और ट्रैफिक जाम की संभावना भी जुड़ी हुई है, जिससे कुल खर्च और समय दोनों बढ़ जाते हैं।

एक्सप्रेसवे पर अन्य वाहनों के लिए भी टोल दरें कम नहीं हैं। हल्के व्यावसायिक वाहनों के लिए एक तरफ का टोल 445 रुपये और वापसी पर 670 रुपये निर्धारित किया गया है। बस और ट्रक के लिए यह शुल्क 935 रुपये और 1405 रुपये तक पहुंचता है। तीन एक्सल वाले भारी वाहनों के लिए यह और अधिक है, जो 1020 रुपये से 1530 रुपये तक जाता है।

नियमित यात्रियों के लिए वार्षिक पास की सुविधा भी दी गई है, जिसकी कीमत 3075 रुपये रखी गई है। इस पास के जरिए एक साल में 200 बार यात्रा की जा सकती है। हालांकि, यह सुविधा केवल सीमित यात्रियों के लिए ही उपयोगी साबित हो सकती है।

लखनऊ-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर वर्तमान में टोल मात्र 95 रुपये है, जो एक्सप्रेसवे की तुलना में काफी कम है। ऐसे में कई लोग पुराने मार्ग को ही प्राथमिकता दे सकते हैं, भले ही उसमें थोड़ा अधिक समय लगे।

एक्सप्रेसवे के उद्घाटन को लेकर भी तैयारियां जोरों पर हैं। अधिकारियों के अनुसार, इसका उद्घाटन 15 मई के बाद किसी भी दिन किया जा सकता है। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, सड़क परिवहन मंत्री और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।

फिलहाल, यह परियोजना जहां एक ओर आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का प्रतीक है, वहीं इसकी लागत और उपयोगिता को लेकर चर्चा भी जारी है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि लोग इस एक्सप्रेसवे को कितना अपनाते हैं और यह उनकी यात्रा को कितना आसान बना पाता है।

कुल मिलाकर, लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे एक महत्वपूर्ण परियोजना जरूर है, लेकिन इसकी महंगी टोल दरें और अधूरी कनेक्टिविटी यात्रियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। ऐसे में फिलहाल ट्रेन यात्रा अधिक सस्ता, तेज और सुविधाजनक विकल्प बनकर उभर रही है।

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