
जीएसटी के नाम पर बड़ा खेल: अमरोहा की पंचायतों से लाखों की वसूली, फर्म संचालक पर शिकंजा, सचिव भी जांच के घेरे में
उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में पंचायत स्तर पर वित्तीय अनियमितताओं का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां स्टेशनरी सप्लाई करने वाली एक फर्म ने जीएसटी के नाम पर लाखों रुपये की वसूली तो की, लेकिन यह रकम सरकारी खाते में जमा नहीं कराई गई। इस घोटाले के उजागर होने के बाद प्रशासन में हड़कंप मच गया है और अब जांच का दायरा फर्म संचालक के साथ-साथ पंचायत सचिवों तक भी फैल गया है।

मामले के अनुसार, हसनपुर क्षेत्र में संचालित ‘राखी फोटो स्टूडियो’ नाम की फर्म पिछले करीब चार वर्षों से जिले की विभिन्न पंचायतों में स्टेशनरी की आपूर्ति कर रही थी। इस दौरान फर्म ने अमरोहा, जोया, हसनपुर, गंगेश्वरी, गजरौला और मंडी धनौरा ब्लॉकों की पंचायतों को लगभग 80 लाख रुपये का सामान सप्लाई किया। पहली नजर में यह एक सामान्य सरकारी खरीद प्रक्रिया लग रही थी, लेकिन जांच में सामने आया कि इसके पीछे बड़ा वित्तीय खेल चल रहा था।
दरअसल, फर्म संचालक हर बिल में 18 प्रतिशत जीएसटी जोड़कर पंचायतों से वसूलता था। पंचायतें भी इस टैक्स को नियमित प्रक्रिया का हिस्सा मानकर भुगतान कर देती थीं। लेकिन बाद में पता चला कि यह जीएसटी राशि वाणिज्य कर विभाग में जमा ही नहीं कराई जा रही थी। यानी फर्म संचालक इस टैक्स की रकम को अपने पास ही रख रहा था और सरकार को सीधा नुकसान पहुंचा रहा था।
इस गड़बड़ी की शिकायत मिलने के बाद प्रशासन हरकत में आया। मंडलायुक्त के निर्देश पर जिलाधिकारी ने पूरे मामले की जांच के आदेश दिए। इसके लिए मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) एके मिश्र की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित की गई, जिसे सभी संबंधित रिकॉर्ड की जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया।
जांच कमेटी ने जब पंचायतों में किए गए खरीद के बिलों की पड़ताल शुरू की, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। प्रारंभिक जांच में ही करीब पांच लाख रुपये की गड़बड़ी सामने आई है, हालांकि अधिकारियों का मानना है कि यह आंकड़ा जांच पूरी होने तक और बढ़ सकता है। क्योंकि अभी कई पंचायतों के रिकॉर्ड की जांच बाकी है।
जांच के दौरान एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है, जो पंचायत सचिवों की भूमिका पर सवाल खड़े करता है। कमेटी ने जब सचिवों से पिछले चार वर्षों के बिल और रिकॉर्ड मांगे, तो कई सचिव उन्हें प्रस्तुत करने में असमर्थ नजर आए। कुछ ने यह भी कहा कि पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में प्रशासन को शक है कि कहीं न कहीं इस पूरे खेल में लापरवाही या मिलीभगत भी हो सकती है।
अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि जो भी सचिव जांच में सहयोग नहीं करेंगे या जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराएंगे, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। जांच कमेटी इस मामले में पूरी सख्ती बरतने के मूड में है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।
फर्म संचालक की कार्यप्रणाली बेहद सुनियोजित थी। वह हर बार सामान की आपूर्ति करते समय जीएसटी जोड़ता, जिससे यह प्रक्रिया पूरी तरह वैध दिखाई देती थी। पंचायतों को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनके द्वारा भुगतान किया गया टैक्स सरकारी खाते में जमा नहीं हो रहा है। इसी का फायदा उठाकर फर्म संचालक लंबे समय से इस गड़बड़ी को अंजाम देता रहा।
इस पूरे मामले ने पंचायत स्तर पर होने वाले वित्तीय लेन-देन की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आमतौर पर गांव स्तर पर होने वाली खरीद और खर्च की निगरानी सीमित होती है, जिसका फायदा उठाकर इस तरह के घोटाले सामने आते हैं। यह मामला भी इसी कमी को उजागर करता है।
फिलहाल जांच कमेटी लगातार दूसरे दिन भी रिकॉर्ड खंगालने में जुटी रही। पंचायतों से जुड़े दस्तावेजों की बारीकी से जांच की जा रही है, ताकि पूरे घोटाले का सही आकलन किया जा सके। अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही जांच पूरी कर रिपोर्ट जिलाधिकारी को सौंप दी जाएगी।
रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी, जिसमें फर्म संचालक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ दोषी पाए जाने वाले पंचायत कर्मियों पर भी सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। इसके अलावा भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए पंचायतों में खरीद प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाने की दिशा में भी काम किया जाएगा।
यह मामला एक बड़ी चेतावनी के रूप में सामने आया है कि अगर समय पर निगरानी और ऑडिट न किया जाए, तो छोटे स्तर पर भी बड़े घोटाले हो सकते हैं। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में कितनी सख्ती दिखाता है और क्या इससे भविष्य में ऐसी गड़बड़ियों पर रोक लगाई जा सकेगी।



