
बाबा मुक्तेश्वरपूरी मठ का 800 साल पुराना है इतिहास यहा उमड़ता है भगतों का सैलाब
कोसली ,ओमप्रकाश डाबला
कोसली गांव की अपनी एक ऐतिहासिक विरासत है, यहां के खून में देशभक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा हुआ है।इसी का परिणाम है कि पहले विश्व युद्ध मे कोसली के 9 वीर जवान वीरगति को प्राप्त हुए यही से इस गांव की शौर्य गाथा शुरू हो जाती है।शौर्य की बात हो या फिर आस्था की यहां के सैनिक व बाबा का मठ देश से विदेश तक मे अपनी पहचान रखते है।
शुक्रवार को कोसली में होली फॉग बड़ी धूमधाम से मनाया गया जिसमें हजारो लोगो ने शिरकत की। प्राचीन पर्व होली,फाग को देश की संस्कृति का शृंगार कहा जाता हैं। समय के साथ आधुनिकता की चकाचौंध में प्राचीन त्योहार भी अपनी पहचान खोते जा रहे हैं, लेकिन कुछ परंपराएं ऐसी भी हैं, जिनमें समय के साथ कोई बदलाव देखने को नहीं मिला है।
करीब 800 साल पूर्व गांव नठेड़ा सेे शुरू हुई होली गायन की अनूठी परंपरा अभी भी निभाई जा रही है। क्षेत्र के 13 गांवों में होली के गीतों की यह परंपरा महाशिवरात्रि के पावन पर्व के साथ शुरू होती है। धुलंडी फाग पर कोसली के बाबा मुक्तेश्वरपुरी मठधाम के चबूतरे पर इसका समापन होता है। गायन व परंपरा के इस अनूठे संगम में क्षेत्र के लोग हर साल डुबकी लगाते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी आज भी उन गीतों को गाया जा रहा है,जो सालों पहले गाए जाते थे। इस दिन यहां पर अपने-अपने गांवों से ग्रामीण ढ़ोल नगाड़ों, डफ व ढ़पली के साथ नृत्य-गायन करते हुए पैदल मार्च कर मठ तक का सफर तय करते है। मठ में इक्कठा होकर सभी गांवों के ग्रामीण सामूहिक होली गायन का हिस्सा बनते है। बाबा मुक्तेश्वर पुरी की पूजा के साथ पर्व संपन्न हो जाता है।
हरियाणा, व देश के अन्य राज्यो से आते हैं श्रद्घालु होली के अवसर पर कोसली मठ में हजारों श्रद्घालु आते है,जो मन्नत मांगते है। मेले में हरियाणा सहित देश के दूर-दराज से हजारों लोग पहुंचते है। कई श्रद्धालु पेट पलनिया भी आते है।ये श्रद्घालु यहां आकर बच्चों के बालों का मुंडन कराते है तथा नव दंपतियों के गठजोड़ों की धौक लगती है। इसके अलावा यहां कुश्ती की प्रतियोगिताएं भी कराई जाती है, जिसमें दूर-दराज के पहलवान हिस्सा लेते हैं।
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ये हैं मान्यता
सदियों पहले ग्रामीणों से अनबन के कारण एक डाकू ने अपने सैकड़ों साथियों के साथ गांव पर हमला कर दिया था। हमले में ग्रामीणो ने डाकुओं के सरदार का सिर कलम कर दिया था। इसी खुशी में फाग के दिन गांव का धन्नानाई, मठाधीश महाराज, नंबरदार व ग्रामीणों की मौजूदगी में ठाकुर की प्रतिमा को सजाकर चौपाल से मठ तक लाया जाता है। इसके बाद फाग का मेला शुरू हो जाता है। मेले के दौरान जो चढ़ावा आता उसे लेकर चौपाल में जाते हैं, जहां चढ़ावे के रूप में आए पैसों को गिनकर करीब आठ सौ साल पुरानी बही में लेखा-जोखा लिखा जाता है।इस अवसर पर बाबा शिवपुरी,भाजपा नेता वीरकुमार यादव,मेजर डॉ टीसी राव व उनकी पत्नी कमलेश राव, सरपंच रामकिशन,सरपंच मनोज नठेड़ा,सुबेदार महेंद्र सिंह,डॉ सुचेत यादव,होशियार सिंह लम्बरदार,पंच ओमप्रकाश डाबला, कैप्टन सर्वशुख, कैप्टन कर्म सिंह,पंच सतबीर सिंह,पंच कृष्ण कुमार, सुकर्मपाल, संजय यादव,नरेंद्र सिंह बाबू,पंडित गुरूदत्त व रामचंद्र भारद्वाज आदि लोग उपस्थित रहे।


