
रवि काना रिहाई प्रकरण में तीन जेल अधिकारी जिम्मेदार, एसआईटी जांच तेज
बांदा जेल से कुख्यात गैंगस्टर रविंद्र नागर उर्फ रवि काना की विवादित रिहाई के मामले में विभागीय जांच ने बड़ा फैसला सुनाया है। जांच में निलंबित जेल अधीक्षक, जेलर और डिप्टी जेलर को दोषी ठहराया गया है। डीआईजी जेल प्रयागराज रेंज राजेश श्रीवास्तव ने अपनी रिपोर्ट जेल मुख्यालय को भेज दी है, जिसके आधार पर अब इन अधिकारियों के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई की तैयारी है। दूसरी ओर, इस मामले की आपराधिक जांच कर रही एसआईटी ने भी अपनी कार्रवाई तेज कर दी है।

जानकारी के अनुसार, रवि काना को पहले नोएडा जेल से स्थानांतरित कर बांदा जेल में रखा गया था। 29 जनवरी को गौतमबुद्ध नगर के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने वसूली से जुड़े एक मामले में उसे बी वारंट पर तलब किया था। उसकी पेशी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कराई गई। लेकिन इसी दिन देर शाम जेल प्रशासन ने उसे रिहा कर दिया। जब यह तथ्य अदालत के संज्ञान में आया तो न्यायालय ने कड़ी नाराजगी जाहिर की और मामले की जांच के आदेश दिए गए।
प्रारंभिक जांच के बाद सबसे पहले जेलर विक्रम सिंह को निलंबित किया गया। इसके बाद जांच का दायरा बढ़ाया गया और जेल अधीक्षक अनिल कुमार गौतम तथा डिप्टी जेलर निर्भय सिंह को भी सस्पेंड कर दिया गया। अब विस्तृत विभागीय जांच में तीनों अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है और उन्हें दोषी माना गया है।
जांच रिपोर्ट के मुताबिक, जेल अधीक्षक पर निगरानी में लापरवाही का आरोप है। यानी उन्होंने अधीनस्थ अधिकारियों की कार्रवाई पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं रखा। वहीं जेलर और डिप्टी जेलर को इस पूरे प्रकरण में अधिक जिम्मेदार पाया गया है। आरोप है कि रिहाई की प्रक्रिया में जरूरी कानूनी बिंदुओं की अनदेखी की गई और यह सुनिश्चित नहीं किया गया कि आरोपी के खिलाफ लंबित मामलों की स्थिति क्या है।
डीआईजी जेल राजेश श्रीवास्तव ने बताया कि सभी दस्तावेजों, आदेशों और अधिकारियों के बयानों की समीक्षा के बाद रिपोर्ट तैयार कर मुख्यालय भेजी गई है। अब मुख्यालय स्तर पर तय होगा कि दोषी अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की जाए। विभागीय नियमों के तहत इनके खिलाफ कठोर दंडात्मक कदम उठाए जा सकते हैं।
उधर, बांदा पुलिस पहले ही तीनों अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज कर चुकी है। अब एसआईटी इस मामले की गहराई से जांच कर रही है। सूत्रों के अनुसार, संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर उनके बयान दर्ज किए जाएंगे। एसआईटी यह भी जांच करेगी कि रिहाई में सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही थी या फिर किसी तरह की मिलीभगत या दबाव की भूमिका भी रही।
इस घटना ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। किसी आरोपी को बी वारंट पर तलब किए जाने के बाद उसी दिन रिहा कर देना एक बड़ी चूक मानी जा रही है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में रिहाई से पहले सभी लंबित वारंट और मामलों की पूरी पुष्टि करना अनिवार्य होता है।
फिलहाल विभागीय जांच में दोष तय हो चुका है, लेकिन अंतिम कार्रवाई और आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण एसआईटी की रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट होगा। इस पूरे प्रकरण पर प्रदेश स्तर पर नजर रखी जा रही है और आगे और भी कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।



