
इलाहाबाद हाईकोर्ट का कड़ा संदेश: बिना सबूत चरित्र हनन करना क्रूरता, पति की सामाजिक-मानसिक हत्या के बराबर
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि बिना किसी प्रमाण के पति पर अवैध संबंधों का आरोप लगाना न सिर्फ क्रूरता है, बल्कि उसकी सामाजिक और मानसिक हत्या के समान है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्षों तक चुप रहना यह साबित नहीं करता कि व्यक्ति प्रताड़ित नहीं हुआ। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति की तलाक याचिका स्वीकार कर ली।

यह फैसला न्यायमूर्ति नीरज तिवारी और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने कहा कि भारतीय समाज में पुरुष अक्सर लोकलाज, सामाजिक प्रतिष्ठा और बच्चों के भविष्य के चलते लंबे समय तक मानसिक पीड़ा सहते रहते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके साथ क्रूरता नहीं हुई।
वाराणसी से जुड़ा है मामला
मामला वाराणसी का है। पति गुरुग्राम में एक निजी कंपनी में उप-प्रबंधक के पद पर कार्यरत है, जबकि पत्नी वाराणसी में अध्यापिका थी। दोनों की शादी 25 नवंबर 2003 को हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। दंपती के दो बेटे हैं।
आपसी अविश्वास और शक के कारण वर्ष 2011 से पति-पत्नी अलग-अलग रहने लगे। बच्चों की जिम्मेदारी दादा-दादी निभा रहे थे।
पति के आरोप: मानसिक और पारिवारिक उत्पीड़न
पति ने वर्ष 2014 में पारिवारिक न्यायालय में क्रूरता के आधार पर तलाक की अर्जी दाखिल की। उसने आरोप लगाया कि पत्नी अत्यधिक शंकालु और झगड़ालू स्वभाव की है और लगातार उस पर उसकी भाभी के साथ अवैध संबंध होने का आरोप लगाती रही।
याचिका में यह भी कहा गया कि पत्नी का व्यवहार बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता के प्रति भी क्रूर रहा। पति ने 2009 की एक घटना का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि पत्नी ने चार महीने के बेटे को छत से लटका दिया और उसकी वृद्ध मां पर गर्म दाल फेंक दी।
इसके अलावा, पत्नी द्वारा सुसाइड नोट लिखकर पूरे परिवार को जेल भिजवाने की धमकी देने का भी दावा किया गया। पति ने अपने आरोपों के समर्थन में वॉइस रिकॉर्डिंग भी अदालत में पेश की, जिसमें कथित तौर पर अपमानजनक और धमकी भरी भाषा दर्ज थी।
परिवार न्यायालय से हाईकोर्ट तक
पहले परिवार न्यायालय ने पति की तलाक अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी कि उसने पत्नी के व्यवहार को माफ कर दिया था और विधिवत नोटिस नहीं भेजा गया। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील की।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि पत्नी ने स्वयं स्वीकार किया था कि उसने पति पर भाभी के साथ अवैध संबंध होने का आरोप लगाया है। कोर्ट ने माना कि ऐसे आरोपों से पति गहरे मानसिक अवसाद में चला गया था और वह आत्महत्या तक के विचारों से जूझ रहा था।
रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ कि पत्नी ने पति द्वारा भेजे गए नोटिस को लेने से इनकार कर दिया और बाद में दोनों बेटों को छोड़कर वाराणसी में अलग किराये के मकान में रहने लगी।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की—
“जब एक पत्नी बिना प्रमाण पति के चरित्र पर कीचड़ उछालती है और मां वर्षों तक अपने बच्चों को छोड़ देती है, तो उस विवाह में केवल ढांचा बचता है, आत्मा नहीं। ऐसी स्थिति में तलाक ही एकमात्र व्यवहारिक विकल्प रह जाता है।”
अदालत ने साफ कहा कि चरित्र हनन के निराधार आरोप पति को असहनीय मानसिक पीड़ा देते हैं, जो कानून की नजर में स्पष्ट रूप से क्रूरता है।
तलाक मंजूर, अहम नजीर
सभी तथ्यों और सबूतों को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति की अपील स्वीकार करते हुए तलाक मंजूर कर दिया। यह फैसला उन मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है, जहां वैवाहिक रिश्तों में झूठे आरोपों के जरिए मानसिक उत्पीड़न किया जाता है।
निष्कर्ष:
हाईकोर्ट के इस फैसले ने साफ संदेश दिया है कि विवाह में सम्मान और विश्वास अनिवार्य हैं। बिना सबूत लगाए गए चरित्र हनन के आरोप न सिर्फ रिश्तों को तोड़ते हैं, बल्कि कानून की नजर में गंभीर अपराध जैसे माने जाते हैं।



