
अधूरी रह गई ‘शिक्षा का अधिकार’ की पहल: हरियाणा में 19 हजार से ज्यादा सीटें खाली, पोर्टल बंद होने से बढ़ी चिंता
हरियाणा में शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के तहत निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को मुफ्त शिक्षा दिलाने की प्रक्रिया इस वर्ष कई चुनौतियों के साथ समाप्त हुई। सरकार द्वारा निर्धारित समय सीमा पूरी होते ही आरटीई एडमिशन पोर्टल को बंद कर दिया गया, लेकिन इसके साथ ही कई अहम सवाल भी खड़े हो गए। आंकड़ों के मुताबिक इस बार हजारों सीटें खाली रह गईं और बड़ी संख्या में पात्र बच्चे दाखिले से वंचित रह गए।

राज्यभर में कुल 60,479 सीटें आरटीई के तहत उपलब्ध कराई गई थीं, लेकिन इन सीटों के मुकाबले केवल 41,160 आवेदन ही दर्ज हो सके। इसका सीधा असर यह हुआ कि 19,319 सीटें खाली रह गईं। यह स्थिति न केवल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि योजना का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने में कहीं न कहीं कमी रह गई है।
इस बार एक और बड़ी समस्या यह सामने आई कि करीब 14 हजार से अधिक अभ्यर्थी अपने आवेदन को अंतिम रूप नहीं दे सके। यानी उन्होंने आवेदन प्रक्रिया शुरू तो की, लेकिन तकनीकी या अन्य कारणों से उसे पूरा नहीं कर पाए। ऐसे में इन बच्चों का दाखिला अधर में लटक गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन आवेदनों को पूरा करने का मौका दिया जाता, तो काफी हद तक खाली सीटों को भरा जा सकता था।
शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि आवेदन प्रक्रिया में आई तकनीकी खामियां और जटिल नियम इसकी सबसे बड़ी वजह रहे। कई अभिभावकों को ऑनलाइन आवेदन करने में कठिनाई हुई, खासकर ग्रामीण और कम शिक्षित परिवारों को। दस्तावेज अपलोड करना, फॉर्म भरना और अंतिम सबमिशन करना उनके लिए आसान नहीं था। इसके अलावा कई बार सर्वर की समस्या और वेबसाइट की धीमी गति ने भी लोगों को निराश किया।
यदि आंकड़ों को गहराई से देखें, तो जिलावार स्थिति भी काफी असमान नजर आती है। कुछ जिलों में आवेदन संख्या संतोषजनक रही, जबकि कई जिलों में बेहद कम आवेदन दर्ज हुए। उदाहरण के तौर पर फरीदाबाद में 8,468 सीटों के मुकाबले केवल 3,175 आवेदन आए, जो बेहद कम है। गुरुग्राम में 4,359 सीटों के लिए महज 1,688 आवेदन दर्ज हुए, जो दर्शाता है कि शहरी क्षेत्रों में भी इस योजना की पहुंच सीमित रही।
वहीं करनाल और यमुनानगर जैसे जिलों में स्थिति बेहतर दिखी। करनाल में 3,336 सीटों के लिए 3,925 आवेदन आए, जबकि यमुनानगर में 2,332 सीटों के मुकाबले 3,774 आवेदन दर्ज हुए। इससे यह संकेत मिलता है कि जहां जागरूकता और प्रक्रिया की समझ बेहतर है, वहां लोग इस योजना का अधिक लाभ उठा रहे हैं।
दूसरी ओर महेंद्रगढ़ और नूंह (मेवात) जैसे जिलों में स्थिति चिंताजनक रही। महेंद्रगढ़ में 1,874 सीटों के मुकाबले केवल 736 आवेदन आए, जबकि नूंह में 2,201 सीटों के लिए महज 734 आवेदन दर्ज हुए। यह आंकड़े बताते हैं कि जिन क्षेत्रों में शिक्षा की सबसे अधिक जरूरत है, वहीं योजना का लाभ सबसे कम लोगों तक पहुंच पाया।
पंचकूला, झज्जर, पलवल, रेवाड़ी और रोहतक जैसे जिलों में भी सीटों के मुकाबले आवेदन कम रहे। यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि केवल पोर्टल खोल देना ही काफी नहीं है, बल्कि लोगों को सही जानकारी और मार्गदर्शन देना भी जरूरी है।
आवेदन करने वालों के आंकड़ों में भी दिलचस्प पहलू सामने आया है। कुल आवेदनों में 21,188 लड़के और 19,970 लड़कियां शामिल हैं। यह दर्शाता है कि लड़कियों की भागीदारी भी लगभग बराबर है, जो एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि कुल आवेदन संख्या कम होना चिंता का विषय बना हुआ है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आगे क्या होगा? क्या सरकार इन खाली सीटों को भरने के लिए दोबारा आवेदन का मौका देगी? या फिर ये सीटें यूं ही खाली रह जाएंगी? शिक्षाविदों का मानना है कि सरकार को इस दिशा में तुरंत कदम उठाना चाहिए। यदि पोर्टल को दोबारा खोला जाए या आवेदन की तारीख बढ़ाई जाए, तो हजारों बच्चों को इस योजना का लाभ मिल सकता है।
विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे रहे हैं कि भविष्य में आवेदन प्रक्रिया को और सरल बनाया जाए। इसके लिए ऑफलाइन सहायता केंद्र, हेल्पलाइन नंबर और स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। इसके अलावा स्कूलों और पंचायतों की मदद से भी लोगों तक सही जानकारी पहुंचाई जा सकती है।
यह मामला केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे हजारों बच्चों का भविष्य जुड़ा हुआ है। आरटीई कानून का उद्देश्य ही यह है कि हर बच्चे को समान शिक्षा का अवसर मिले, चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कैसी भी हो। लेकिन जब इतनी बड़ी संख्या में सीटें खाली रह जाती हैं, तो यह उद्देश्य अधूरा नजर आता है।
हरियाणा में इस साल की आरटीई दाखिला प्रक्रिया एक सीख के रूप में सामने आई है। यह स्पष्ट हो गया है कि केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें सही तरीके से लागू करना और लोगों तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में भी यही स्थिति दोहराई जा सकती है।
अंततः, यह सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि कोई भी बच्चा केवल प्रक्रिया की जटिलता या जानकारी के अभाव में शिक्षा से वंचित न रहे। यदि आरटीई जैसे कानून का सही तरीके से क्रियान्वयन हो, तो यह हजारों परिवारों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाती है और क्या आने वाले समय में इस व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।



