
धूल छंटी तो सामने था मौत का मंजर — हाईवे पर तड़पती मिलीं महिलाएं, महोबा हादसे ने तोड़ दिए कई घर
उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में भोर के सन्नाटे को चीरती एक तेज टक्कर ने ऐसा दर्दनाक दृश्य पैदा किया, जिसे देखने वालों की रूह तक कांप गई। कानपुर-सागर हाईवे पर हुए इस हादसे में सड़क किनारे काम करने जा रही महिला मजदूरों को एक तेज रफ्तार पिकअप ने कुचल दिया। धूल का गुबार जब छंटा तो सड़क पर खून से लथपथ पांच महिलाएं अलग-अलग दिशाओं में पड़ी थीं, और हवा में गूंज रही थी दर्द से भरी कराह।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक सुबह करीब तीन बजे तेज आवाज हुई, जैसे लोहे से लोहे की टक्कर हुई हो। आसपास के लोग दौड़कर पहुंचे तो एक महिला टूटती सांसों के बीच बस इतना कह सकी — “हम तो मर गए…” और कुछ ही देर बाद उसकी आवाज हमेशा के लिए थम गई। इस एक वाक्य ने वहां मौजूद लोगों को अंदर तक हिला दिया।
राहगीरों ने तुरंत पुलिस और एम्बुलेंस को सूचना दी। पुलिस मौके पर पहुंची और सभी घायलों को अस्पताल भेजा गया, लेकिन तीन महिलाओं ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। हादसे की खबर जैसे ही गांव पहुंची, कई घरों में सुबह होने से पहले ही मातम छा गया। जिन मांओं के हाथों से घर का चूल्हा जलता था, वही अब लौटकर नहीं आने वाली थीं।
अस्पताल में जब परिजन पहुंचे तो उनका दर्द संभालना मुश्किल हो गया। कोई मां के शव से लिपटकर रो रहा था, तो कोई बदहवास होकर डॉक्टरों से सवाल पूछ रहा था। बच्चों की आंखों में डर, खालीपन और अनजाना भविष्य साफ दिखाई दे रहा था। लोगों का गुस्सा भी फूट पड़ा — हर कोई उस अज्ञात पिकअप चालक को कोस रहा था, जिसने लापरवाही में कई जिंदगियां उजाड़ दीं।
इस हादसे ने दो परिवारों को पूरी तरह तोड़ दिया। भगवती और गीता नाम की दो महिलाओं के पति पहले ही दुनिया छोड़ चुके थे। दोनों अपने बच्चों की परवरिश के लिए मजदूरी करती थीं, शादी-ब्याह में खाना बनाती थीं और जैसे-तैसे घर चलाती थीं। अब उनके जाने के बाद उनके बच्चों के सिर से मां-बाप दोनों का साया उठ गया। भगवती के दो बेटे हैं, जबकि गीता की दो बेटियां और एक बेटा — जिनके सामने अब जीवन की कठिन राह खड़ी है।
गीता के परिवार के लिए यह दूसरा बड़ा हादसा है। करीब तीन साल पहले सड़क दुर्घटना में ही उसके पति की मौत हुई थी। तब से उसने अकेले ही बच्चों को संभाला, उन्हें पढ़ाया और मजदूरी करके घर चलाया। अब उसकी मौत ने पूरे परिवार को फिर उसी दर्दनाक मोड़ पर ला खड़ा किया है।
रिश्तेदार बताते हैं कि गीता बेहद मेहनती महिला थी। गांव छोड़कर वह शहर के पास आकर रहने लगी थी ताकि बच्चों की पढ़ाई ठीक से हो सके। सुबह-सुबह काम पर निकलना, दिन भर मेहनत करना और फिर घर लौटकर बच्चों की पढ़ाई देखना — यही उसकी दिनचर्या थी। अब उसके बच्चों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनका भरण-पोषण कैसे होगा।
हादसे के बाद हाईवे से लेकर जिला अस्पताल तक चीख-पुकार का माहौल रहा। जब घायलों को अस्पताल लाया गया तो वहां मौजूद लोगों ने भी मदद की कोशिश की, लेकिन परिजनों के पहुंचते ही माहौल और भारी हो गया। अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में रोने की आवाजें गूंजती रहीं।
बाद में शवों को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चुरी में रखा गया। जब पुलिस ने पंचायतनामा की प्रक्रिया के दौरान एक-एक कर शव बाहर निकाले तो वहां मौजूद बच्चे और रिश्तेदार खुद को संभाल नहीं पाए। कई लोग जमीन पर बैठकर रो पड़े, तो कुछ चुपचाप आंखों से बहते आंसुओं को पोंछते रहे। किसी के पास शब्द नहीं थे, बस सन्नाटा था और दर्द था।
घटनास्थल की जांच में पुलिस को सड़क पर बिखरे टमाटर मिले। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि पिकअप में सब्जियां लदी थीं। वाहन का टूटा हिस्सा भी मौके से बरामद हुआ, जिसके आधार पर पुलिस वाहन और चालक की तलाश कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही आरोपी को पकड़ लिया जाएगा।
लेकिन कानून की कार्रवाई से ज्यादा बड़ा सवाल उन बच्चों के भविष्य का है, जिनकी दुनिया एक पल में उजड़ गई। पिता के बाद मां को खोना किसी भी बच्चे के लिए असहनीय आघात होता है। अस्पताल में कई बच्चे पहले बिलखते रहे, फिर अचानक चुप हो गए — जैसे उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि उनके साथ क्या हो गया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि हाईवे पर तेज रफ्तार और लापरवाही की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। रात और सुबह के समय सड़क किनारे काम करने वाले मजदूर सबसे ज्यादा खतरे में रहते हैं। यदि समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसे हादसे आगे भी कई परिवारों को बर्बाद कर सकते हैं।
इस दुर्घटना ने सिर्फ तीन महिलाओं की जान नहीं ली, बल्कि कई मासूमों का बचपन छीन लिया, कई घरों का सहारा खत्म कर दिया और पूरे इलाके को गहरे सदमे में डाल दिया। महोबा की इस सुबह ने साबित कर दिया कि सड़क हादसे सिर्फ आंकड़े नहीं होते — वे जिंदा लोगों की जिंदगी बदल देने वाली त्रासदी बन जाते हैं।



