हरियाणा

एक साल बाद भी अधूरी पहचान: लेफ्टिनेंट विनय नरवाल की शहादत फाइलों में अटकी, पिता की भावुक गुहार

पहलगाम में हुए आतंकी हमले में देश के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले नौसेना के लेफ्टिनेंट विनय नरवाल को शहीद हुए एक वर्ष पूरा हो चुका है। लेकिन यह बीता हुआ एक साल उनके परिवार के लिए केवल समय का अंतराल नहीं, बल्कि इंतजार, उम्मीद और निराशा का मिला-जुला सफर रहा है। जिस सम्मान और पहचान की उम्मीद परिवार और समाज को थी, वह अब तक अधूरी है।

विनय नरवाल के पिता राजेश नरवाल आज भी अपने बेटे को ‘शहीद’ का दर्जा मिलने का इंतजार कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार की ओर से आर्थिक सहायता और परिवार के एक सदस्य को नौकरी जरूर दी गई है, लेकिन उनके बेटे को आधिकारिक रूप से ‘शहीद’ घोषित किए जाने को लेकर अब तक कोई स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया है। यह बात उन्हें सबसे ज्यादा कचोटती है।

अटल सेक्टर-7 में रहने वाले इस परिवार के लिए विनय केवल एक बेटा नहीं, बल्कि गर्व और देशभक्ति की मिसाल था। पिता का कहना है कि अगर सरकार उनके बेटे के नाम पर किसी बड़े संस्थान—जैसे अस्पताल, मेडिकल कॉलेज या अन्य सार्वजनिक संस्थान—का नामकरण करती है, तो वह अपनी संपत्ति में से विनय का हिस्सा और सरकार से मिली आर्थिक सहायता उस संस्था को समर्पित कर देंगे। उनका मानना है कि इससे उनके बेटे का नाम केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाज सेवा के जरिए हमेशा जीवित रहेगा।

22 अप्रैल को हुए इस आतंकी हमले के बाद जब विनय नरवाल का पार्थिव शरीर उनके घर लाया गया था, तब पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई थी। श्रद्धांजलि सभा में कई बड़े नेता और जनप्रतिनिधि पहुंचे थे। उस समय हर किसी ने विनय की शहादत को सलाम किया और परिवार को भरोसा दिलाया कि उनके बेटे को पूरा सम्मान मिलेगा।

श्रद्धांजलि देने पहुंचे नेताओं में केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल, विधानसभा अध्यक्ष हरविन्द्र कल्याण, स्थानीय विधायक और नगर निगम के प्रतिनिधि शामिल थे। सभी ने अलग-अलग स्तर पर कई वादे किए थे।

24 अप्रैल 2025 को केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल ने परिवार से मुलाकात के दौरान कहा था कि विनय नरवाल के नाम को अमर रखने के लिए किसी सड़क या सार्वजनिक स्थान का नाम उनके नाम पर रखा जाएगा। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया था कि इस संबंध में राज्य सरकार से बातचीत कर जल्द निर्णय लिया जाएगा। लेकिन एक साल गुजर जाने के बाद भी यह वादा कागजों में ही सिमटा हुआ है।

इसी तरह 27 अप्रैल 2025 को विधानसभा अध्यक्ष हरविन्द्र कल्याण ने परिवार को भरोसा दिलाया था कि सरकार विनय नरवाल को ‘शहीद’ का दर्जा दिलाने का प्रयास करेगी। साथ ही 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा भी की गई थी। इनमें से आर्थिक सहायता और नौकरी का वादा पूरा हो चुका है, लेकिन ‘शहीद’ का दर्जा अब भी अधूरा है।

इस बीच कुछ सामाजिक और शैक्षणिक संस्थानों ने अपने स्तर पर विनय नरवाल को श्रद्धांजलि देने की पहल की। संत कबीर स्कूल ने उनके सम्मान में स्कूल परिसर में ‘मेमोरी वॉल’ बनाने का वादा किया था, जिसे हरियाणा शहीदी दिवस (23 सितंबर) पर पूरा किया गया। यह प्रयास सराहनीय जरूर है, लेकिन परिवार की अपेक्षाएं इससे कहीं अधिक हैं।

विनय नरवाल की शहादत के बाद स्थानीय लोगों और संगठनों ने भी कई मांगें उठाईं। हिंद एंटी क्राइम आर्गेनाइजेशन ने सेक्टर-7 के एक चौक का नाम विनय के नाम पर रखने की मांग की थी। इसके अलावा क्षेत्र के लोगों ने किसी सरकारी स्कूल, पार्क या ग्रीन बेल्ट का नाम भी उनके नाम पर रखने का सुझाव दिया था। लेकिन इन प्रस्तावों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

नगर निगम और स्थानीय प्रशासन की ओर से भी कुछ बयान सामने आए हैं। मेयर रेनू बाला गुप्ता ने कहा है कि सेक्टर-7 में विनय नरवाल के घर तक जाने वाली सड़क का नाम उनके नाम पर रखने की योजना है और जल्द ही इसकी घोषणा की जाएगी। वहीं, संबंधित विधायक का कहना है कि सड़क नामकरण नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आता है, जबकि किसी संस्थान का नामकरण करने के लिए परिवार की सहमति जरूरी होती है। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया है कि इस विषय पर राज्य स्तर पर चर्चा की जाएगी।

इसके बावजूद, एक साल बीत जाने के बाद भी ठोस परिणाम सामने नहीं आना कई सवाल खड़े करता है। क्या शहादत के बाद किए गए वादे केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं? क्या परिवारों को अपने प्रियजनों के सम्मान के लिए लंबा इंतजार करना ही पड़ता है?

विनय नरवाल की शहादत केवल एक घटना नहीं है, बल्कि यह देश के प्रति सर्वोच्च बलिदान का उदाहरण है। ऐसे में उन्हें उचित सम्मान मिलना न केवल उनके परिवार का हक है, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी भी है।

पिता राजेश नरवाल की भावुक अपील इस बात का प्रतीक है कि उनके लिए आर्थिक सहायता से ज्यादा महत्वपूर्ण उनके बेटे की पहचान और सम्मान है। वह चाहते हैं कि विनय का नाम आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करे और समाज में एक सकारात्मक संदेश छोड़े।

यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि देश के लिए जान देने वालों को समय पर सम्मान देना कितना जरूरी है। क्योंकि शहादत की असली कीमत केवल शब्दों में नहीं, बल्कि ठोस कदमों और निर्णयों में दिखाई देती है।

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