
कॉमर्शियल गैस सिलिंडर की कमी से मुरथल के ढाबों पर संकट, एक तिहाई दुकानों की रसोई पर मंडराया खतरा
हरियाणा के Sonipat जिले में स्थित मशहूर Murthal के ढाबे देश-विदेश में अपने स्वादिष्ट पराठों और देसी खाने के लिए जाने जाते हैं। लेकिन इन दिनों यहां के कई ढाबा संचालकों के सामने एक नई समस्या खड़ी हो गई है। कॉमर्शियल गैस सिलिंडर की आपूर्ति बंद होने से यहां के कई ढाबों की रसोई प्रभावित होने लगी है। अगर स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई तो मुरथल की पहचान बने ढाबों की रौनक कम पड़ सकती है।

दरअसल, मुरथल में सड़क किनारे सैकड़ों ढाबे और रेस्तरां मौजूद हैं, जहां दिन-रात ग्राहकों की भीड़ लगी रहती है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और अन्य राज्यों से आने वाले लोग यहां खासतौर पर पराठे खाने के लिए पहुंचते हैं। लेकिन गैस सिलिंडर की आपूर्ति रुकने के कारण ढाबा संचालकों की चिंता बढ़ गई है।
मुरथल में करीब 100 से अधिक ढाबे संचालित हो रहे हैं। इनमें से लगभग 25 बड़े ढाबों में पाइपलाइन के जरिए गैस यानी पीएनजी की सप्लाई होती है, जबकि बाकी ढाबे कॉमर्शियल गैस सिलिंडर पर निर्भर हैं। ऐसे में जब सिलिंडर की आपूर्ति प्रभावित होती है तो सबसे ज्यादा परेशानी उन्हीं ढाबों को होती है जिनके पास पाइपलाइन गैस की सुविधा नहीं है।
मुरथल के ढाबे मुख्य रूप से NH-44 के किनारे स्थित हैं। इस हाईवे पर दिल्ली से पानीपत की ओर जाने वाले लेन के किनारे पीएनजी गैस पाइपलाइन बिछाई गई है। इसी तरफ मौजूद कुछ बड़े ढाबों को पाइपलाइन गैस कनेक्शन मिला हुआ है।
लेकिन हाईवे के दूसरी तरफ स्थित ढाबों तक अभी तक पाइपलाइन नहीं पहुंची है। इस कारण उस तरफ के सभी ढाबे पूरी तरह कॉमर्शियल गैस सिलिंडरों पर ही निर्भर हैं। सिलिंडर की सप्लाई बंद होने से अब इन ढाबों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
ढाबा संचालकों का कहना है कि फिलहाल उनके पास कुछ दिनों का गैस स्टॉक मौजूद है, लेकिन अगर जल्द सप्लाई बहाल नहीं हुई तो रसोई चलाना मुश्किल हो सकता है। कई ढाबों में रोजाना बड़ी मात्रा में गैस की खपत होती है।
मुरथल के प्रसिद्ध ढाबों में से एक Mannat Haveli Dhaba के मैनेजर सचिन ने बताया कि यहां गैस की खपत काफी अधिक होती है। उनके अनुसार ढाबे में रोजाना करीब 15 कॉमर्शियल गैस सिलिंडर इस्तेमाल होते हैं।
उन्होंने बताया कि ढाबा संचालक आमतौर पर दो से तीन सिलिंडर का बैकअप रखते हैं ताकि अचानक सप्लाई में रुकावट आने पर कुछ दिन तक काम चल सके। लेकिन यदि यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है तो ढाबों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
सचिन ने बताया कि स्थिति को देखते हुए उन्होंने वैकल्पिक व्यवस्था करने की कोशिश शुरू कर दी है। ढाबे में इंडक्शन भट्ठी और डीजल से चलने वाली भट्ठी लगाने का इंतजाम किया जा रहा है ताकि जरूरत पड़ने पर खाना पकाने का काम जारी रखा जा सके।
हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि ऐसी व्यवस्था तुरंत उपलब्ध नहीं हो पाती। इंडक्शन भट्ठी या डीजल भट्ठी मंगाने के लिए पहले ऑर्डर देना पड़ता है और उनकी सप्लाई भी तुरंत नहीं मिलती।
इसके अलावा इन मशीनों को लगाने के लिए अतिरिक्त जगह और बिजली की व्यवस्था भी करनी पड़ती है, जो हर ढाबे के लिए आसान नहीं है। इसी वजह से कई छोटे ढाबा संचालक अभी भी गैस सिलिंडर की सप्लाई बहाल होने का इंतजार कर रहे हैं।
ढाबा संचालकों का कहना है कि मुरथल के ढाबे केवल स्थानीय लोगों के लिए ही नहीं बल्कि दूर-दराज से आने वाले यात्रियों के लिए भी खास आकर्षण का केंद्र हैं। हर दिन सैकड़ों गाड़ियां यहां रुकती हैं और लोग परिवार या दोस्तों के साथ खाना खाने के लिए ढाबों पर पहुंचते हैं।
अगर गैस की समस्या के कारण कुछ ढाबों की रसोई बंद हो जाती है तो इससे न केवल व्यापार प्रभावित होगा बल्कि यहां आने वाले ग्राहकों को भी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
मुरथल के ढाबों की पहचान खास तौर पर उनके देसी घी के पराठों, मक्खन और पारंपरिक पंजाबी खाने के लिए होती है। यही वजह है कि दिल्ली और आसपास के इलाकों के लोग अक्सर देर रात या सुबह-सुबह यहां पहुंच जाते हैं।
ढाबा संचालकों का कहना है कि सरकार और संबंधित विभागों को इस समस्या का जल्द समाधान निकालना चाहिए। उनका मानना है कि यदि हाईवे के दूसरी तरफ भी पीएनजी पाइपलाइन बिछा दी जाए तो भविष्य में ऐसी समस्या से बचा जा सकता है।
कुछ ढाबा संचालकों का कहना है कि पाइपलाइन गैस की सुविधा मिलने से न केवल गैस की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित होगी बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी बेहतर होगा।
फिलहाल मुरथल के ढाबा मालिक उम्मीद कर रहे हैं कि कॉमर्शियल गैस सिलिंडर की सप्लाई जल्द शुरू हो जाएगी। लेकिन अगर यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है तो इससे मुरथल के प्रसिद्ध ढाबों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन और संबंधित विभाग इस समस्या के समाधान के लिए क्या कदम उठाते हैं और मुरथल के ढाबों की रसोई कब तक सामान्य रूप से चल पाती है।

