
सोना-चांदी में झटके ने बदला निवेश का खेल, निवेशकों ने अपनाया ‘थ्री-वे सेफ्टी फॉर्मूला’; मल्टी एसेट फंड बने नई ढाल
कुछ समय पहले तक सोना और चांदी निवेशकों के लिए सबसे भरोसेमंद ठिकाने माने जा रहे थे। खासकर चांदी ने तो बीते महीनों में ऐसा उछाल दिखाया कि निवेशकों को तिहरे अंकों में रिटर्न की उम्मीद बंध गई। लेकिन बाजार का मिजाज कब बदल जाए, यह कोई नहीं जानता। हाल के दिनों में चांदी की कीमतों में एक ही दिन में करीब 25 फीसदी की भारी गिरावट ने निवेशकों को झकझोर कर रख दिया। जो निवेशक जोखिम से बचने के लिए चांदी छोड़कर सोने की ओर मुड़े, वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली, क्योंकि सोने की कीमतों में भी लगातार कमजोरी देखने को मिली।

इस दोहरे झटके के बाद निवेशकों ने अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना शुरू किया और अब उनका रुझान तेजी से मल्टी एसेट एलोकेशन म्यूचुअल फंड्स की ओर बढ़ता नजर आ रहा है।
जब एक एसेट डगमगाए, तो दूसरा संभाले
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि किसी एक ही एसेट क्लास पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहना निवेश के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। सोना और चांदी दोनों ही लंबे समय में पोर्टफोलियो को सुरक्षा देते हैं, लेकिन इनमें अचानक आने वाले बड़े उतार-चढ़ाव छोटे और मध्यम निवेशकों के लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं।
इसी जोखिम को कम करने के लिए मल्टी एसेट एलोकेशन फंड्स एक संतुलित समाधान पेश करते हैं। ये फंड इक्विटी, डेट और कमोडिटी—तीनों में एक साथ निवेश करते हैं। यानी जहां इक्विटी ग्रोथ का मौका देती है, वहीं डेट स्थिरता लाता है और कमोडिटी महंगाई व अनिश्चितता के दौर में सुरक्षा कवच का काम करती है।
सेबी के नियमों से बढ़ा भरोसा
मल्टी एसेट एलोकेशन फंड्स की सबसे बड़ी ताकत इनके लिए बनाए गए सख्त नियामकीय ढांचे में छिपी है। सेबी के दिशानिर्देशों के अनुसार, इन फंड्स को कम से कम तीन अलग-अलग एसेट क्लास में न्यूनतम 10-10 फीसदी निवेश करना अनिवार्य होता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि फंड किसी एक सेक्टर या एसेट पर अत्यधिक निर्भर न हो।
इसके अलावा, फंड मैनेजरों को यह स्वतंत्रता भी दी गई है कि वे बाजार की स्थिति के अनुसार एसेट एलोकेशन में बदलाव कर सकें। जब इक्विटी बाजार तेज हों, तो इक्विटी का हिस्सा बढ़ाया जा सकता है और जब जोखिम बढ़े, तो डेट या कमोडिटी में वजन बढ़ाकर नुकसान को सीमित किया जा सकता है।
अस्थिर बाजार में संतुलन का फायदा
पिछले कुछ समय से वैश्विक और घरेलू बाजारों में अनिश्चितता बनी हुई है। कभी महंगाई का दबाव, तो कभी ब्याज दरों को लेकर आशंका—इन सबका असर सीधे निवेश पर पड़ता है। ऐसे माहौल में जहां इक्विटी बाजार झूलते नजर आ रहे हैं और डेट इंस्ट्रूमेंट्स में रिटर्न सीमित हो गया है, मल्टी एसेट एलोकेशन फंड्स ने निवेशकों को संतुलन का रास्ता दिखाया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यही वजह है कि हाल के महीनों में इन फंड्स में निवेश का प्रवाह तेजी से बढ़ा है। निवेशक अब केवल ऊंचे रिटर्न के पीछे नहीं भाग रहे, बल्कि वे ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जो जोखिम को भी काबू में रखें।
रिटर्न के आंकड़े भी दे रहे हैं समर्थन
मल्टी एसेट एलोकेशन फंड्स का आकर्षण सिर्फ सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि आंकड़े भी इनके पक्ष में खड़े नजर आते हैं। बीते कुछ वर्षों में इन फंड्स ने न केवल स्थिरता दिखाई है, बल्कि रिटर्न के मामले में भी कई बार हाइब्रिड और कुछ शुद्ध इक्विटी फंड्स को पीछे छोड़ दिया है।
उदाहरण के तौर पर, निप्पॉन इंडिया मल्टी एसेट एलोकेशन फंड ने पिछले एक वर्ष में करीब 23.97 फीसदी, दो वर्षों में 20.47 फीसदी और तीन वर्षों में 22.62 फीसदी का रिटर्न दिया है।
कुल मिलाकर, शीर्ष-10 मल्टी एसेट एलोकेशन फंड्स ने एक साल में औसतन 20.26 फीसदी और तीन वर्षों में लगभग 21.01 फीसदी की सीएजीआर से वृद्धि दर्ज की है। इसकी तुलना में, शीर्ष-10 इक्विटी फंड्स का एक साल का औसत रिटर्न लगभग 16.62 फीसदी रहा है।
निवेशकों की बदलती सोच
विशेषज्ञों का कहना है कि सोना और चांदी जैसे एसेट्स पोर्टफोलियो का अहम हिस्सा बने रहेंगे, लेकिन अब निवेशक उन्हें अकेले सहारे के रूप में नहीं देख रहे। वे ऐसे विकल्पों की तलाश में हैं, जहां जोखिम बंटा हुआ हो और किसी एक बाजार झटके से पूरा निवेश प्रभावित न हो।
मल्टी एसेट एलोकेशन फंड्स इसी सोच को मजबूती देते हैं। ये फंड उन निवेशकों के लिए खास तौर पर उपयोगी साबित हो रहे हैं, जो लंबी अवधि में स्थिर और संतुलित रिटर्न चाहते हैं, लेकिन बाजार की तेज उठापटक से घबराते हैं।
निष्कर्ष: रणनीति में बदलाव का समय
सोना-चांदी की हालिया गिरावट ने यह साफ संकेत दे दिया है कि बाजार में स्थिरता स्थायी नहीं होती। बदलते हालात में निवेशकों के लिए जरूरी हो गया है कि वे अपनी रणनीति को समय-समय पर परखें और विविधता को प्राथमिकता दें।
मल्टी एसेट एलोकेशन फंड्स आज ऐसे समय में उभरकर सामने आए हैं, जब निवेशकों को एक साथ सुरक्षा, संतुलन और रिटर्न—तीनों की जरूरत है। यही वजह है कि इन्हें अब निवेश की दुनिया का नया ‘सेफ्टी शील्ड’ माना जा रहा है।
