
बढ़ती डिजिटल लत पर चिंता: ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया के लिए सख्त नियमों की मांग
मेरठ के बेगमबाग क्षेत्र में शनिवार को सिटीजन वॉइस संस्था की बैठक में बच्चों और युवाओं पर डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव को लेकर गंभीर विमर्श हुआ। बैठक में वक्ताओं ने कहा कि ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया का अनियंत्रित उपयोग समाज के लिए नई चुनौती बनकर उभरा है। तकनीक के इस दौर में जहां इंटरनेट ने जीवन को आसान बनाया है, वहीं इसके दुष्प्रभाव भी तेजी से सामने आ रहे हैं।

बैठक की अध्यक्षता कर रहे संस्था के अध्यक्ष प्रशान्त कौशिक ने हाल ही में नोएडा में घटी एक दर्दनाक घटना का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि एक परिवार की तीन बेटियों ने कथित तौर पर इसलिए आत्मघाती कदम उठा लिया, क्योंकि उनके पिता ने ऑनलाइन गेम खेलने पर रोक लगा दी थी। इस घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या बच्चों की मानसिक स्थिति पर डिजिटल लत का असर जरूरत से ज्यादा गहरा हो चुका है।
बैठक में मौजूद शिक्षकों और समाजसेवियों ने कहा कि आज के समय में मोबाइल फोन और इंटरनेट बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक हर काम ऑनलाइन हो रहा है। लेकिन जब यही सुविधा लत में बदल जाती है, तो स्थिति चिंताजनक हो जाती है। कई बच्चे घंटों तक गेम खेलते रहते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई, नींद और व्यवहार प्रभावित होता है।
वक्ताओं ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने की होड़ युवाओं को खतरनाक कदम उठाने के लिए उकसा रही है। रील और वीडियो बनाने के चक्कर में कई बार वे जान जोखिम में डाल देते हैं। लाइक्स और फॉलोअर्स की संख्या को सफलता का पैमाना मान लेना मानसिक दबाव को बढ़ा रहा है। यह प्रवृत्ति समाज के लिए खतरे की घंटी है।
बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि तकनीक को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। डिजिटल प्लेटफॉर्म शिक्षा, रोजगार और रचनात्मकता के अनेक अवसर प्रदान करते हैं। जरूरत इस बात की है कि इनके उपयोग के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और निगरानी तंत्र तैयार किया जाए। एक मजबूत रेगुलेटरी व्यवस्था होनी चाहिए, जो ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर नजर रख सके।
सदस्यों ने सुझाव दिया कि सरकार को ऐसे कानून बनाने चाहिए, जिनके तहत हानिकारक कंटेंट, हिंसक गेम्स और भ्रामक प्रचार पर नियंत्रण लगाया जा सके। साथ ही प्लेटफॉर्म कंपनियों की जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए। यदि कोई प्लेटफॉर्म नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
बैठक में शिक्षकों ने कहा कि स्कूलों में डिजिटल साक्षरता को अनिवार्य किया जाना चाहिए। बच्चों को यह सिखाया जाए कि इंटरनेट का उपयोग कैसे सुरक्षित और संतुलित तरीके से किया जाए। अभिभावकों की भूमिका को भी बेहद अहम बताया गया। उन्हें चाहिए कि वे बच्चों के साथ संवाद बनाए रखें, स्क्रीन टाइम तय करें और उनके ऑनलाइन व्यवहार पर ध्यान दें।
समाजसेवियों ने यह भी कहा कि बच्चों को खेलकूद, पुस्तक पढ़ने और अन्य रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करना जरूरी है। यदि बच्चों को घर और समाज में सकारात्मक माहौल मिलेगा, तो वे आभासी दुनिया में खोने से बचेंगे। परिवार के साथ समय बिताना और संवाद बनाए रखना डिजिटल लत को कम करने में सहायक हो सकता है।
बैठक में प्रशान्त कौशिक, पुष्पेंद्र शर्मा, रिचा सिंह, सरला सिंह, जगमोहन शाकाल, पंडित अश्वनी कौशिक, आरके भटनागर, डॉ. प्रेम कुमार शर्मा, हर्षवर्धन राजवंशी, प्रदीप वत्स, दीपक शर्मा, कंवलजीत सिंह, गुरुकुलम स्कूल के चेयरमैन, सौरभ दिवाकर शर्मा, गौरव शर्मा, गौरव यादव और फुटबॉल खिलाड़ी रुद्राक्ष सिंह सहित कई लोग उपस्थित रहे। सभी ने इस विषय पर सामूहिक प्रयास करने का संकल्प लिया।
अंत में यह निर्णय लिया गया कि डिजिटल सुरक्षा और जागरूकता को लेकर जनअभियान चलाया जाएगा। कॉलोनियों, स्कूलों और सामाजिक मंचों पर कार्यक्रम आयोजित कर अभिभावकों और युवाओं को जागरूक किया जाएगा। प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया पर सख्त नियम लागू करने की मांग भी की जाएगी।
बैठक का निष्कर्ष यही रहा कि तकनीक से दूरी संभव नहीं है, लेकिन उसका संतुलित उपयोग ही समाज के हित में है। समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसके परिणाम और गंभीर हो सकते हैं। इसलिए अब जागरूकता, जिम्मेदारी और सख्त निगरानी—तीनों की जरूरत पहले से ज्यादा महसूस की जा रही है।



