
पीड़िता ने बदल दिए बयान, दुष्कर्म के आरोपी को अदालत ने किया बरी
रोहतक। डेढ़ साल पहले पड़ोस के युवक पर अपहरण और दुष्कर्म का आरोप लगाने वाली 16 वर्षीय युवती ने अदालत में अपने बयान बदल दिए। अब पुलिस और अदालत की जांच के दौरान सामने आया कि युवती ने मर्जी से अपने गांव जाने का निर्णय लिया था। इस बदलाव के बाद एएसजे शैलेंद्र सिंह की अदालत ने आरोपी अमित को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

मामले के रिकॉर्ड के अनुसार, जुलाई 2024 में रोहतक में रहने वाले एक परिवार ने पुलिस को शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी 16 वर्षीय बेटी अचानक गायब हो गई। परिवार का कहना था कि वे पिछले दो साल से रोहतक में रह रहे थे और उनके पड़ोस में एक अन्य व्यक्ति भी रहता था। उसी पड़ोसी के साले ने कुछ दिन पहले उनके इलाके में आकर रहना शुरू किया था।
उस दिन पिता और मां अपनी नौकरी पर गए हुए थे और जब वापस लौटे तो देखा कि उनकी बेटी घर पर नहीं है। पड़ोसी का साला भी घर पर मौजूद नहीं था। इस पर परिवार ने नाबालिग के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई और पुलिस ने आरोपी की तलाश शुरू की।
अगस्त 2024 में पुलिस ने लड़की को उसके पिता के माध्यम से थाने में पेश किया। युवती के बयान को अदालत में दर्ज किया गया, जिसमें उसने पहले कहा कि आरोपी ने उसे जबरन अपहरण किया और 15 दिन तक उसके साथ दुष्कर्म किया। इसके बाद पुलिस ने पॉक्सो एक्ट की धारा 6 और दुष्कर्म की धाराओं के तहत आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। केस जिला अदालत में लंबित रहा और सुनवाई चलती रही।
लेकिन सुनवाई के दौरान ही युवती ने अपने बयान में बदलाव किया। उसने अदालत में स्पष्ट कहा कि वह मर्जी से अपने गांव गई थी और उसके पिता उसे बाद में वापस ले आए। युवती ने यह भी आरोप लगाया कि थाने में पुलिस ने उसे कोरे कागज पर हस्ताक्षर करवाए थे, और वह उन दस्तावेज़ों को बिना पढ़े ही साइन करने को मजबूर हुई थी।
इस बदलाव के बाद युवती के माता-पिता ने भी अपने पुराने बयानों से पलटते हुए कहा कि उनके दिए गए बयान पूरी तरह सही नहीं थे। परिवार और पीड़िता दोनों ने अदालत को बताया कि उनके द्वारा पहले दिए गए बयान में असंगतियां थीं और अब जो बयान दिया जा रहा है, वह वास्तविकता के अधिक करीब है।
साक्ष्यों और गवाहों की कमी के कारण अदालत ने आरोपी अमित को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। जज शैलेंद्र सिंह ने फैसला सुनाते हुए कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण मौजूद नहीं हैं और इसलिए आरोपी को बरी किया जाता है।
विशेष रूप से, इस मामले में यह देखा गया कि नाबालिग की गवाही में बदलाव, उसके माता-पिता की राय में परिवर्तन और प्रारंभिक पुलिस रिपोर्ट में असंगतियों ने मामले की दिशा पूरी तरह बदल दी। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी पहले से ही परिवार और युवती को जानता था, और युवती के अनुसार, उसके साथ कोई गलत कार्य नहीं हुआ।
इस मामले ने कानून व्यवस्था और पुलिस जांच के तरीकों पर भी सवाल उठाए हैं। यह पहली बार नहीं है कि पुलिस द्वारा युवती से कोरे कागजात पर हस्ताक्षर करवाने का आरोप सामने आया हो। इससे यह साफ होता है कि जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता और सही दस्तावेज़ीकरण कितना महत्वपूर्ण है।
मामले के दौरान स्थानीय पुलिस ने कई गवाहों से पूछताछ की और क्षेत्र में लगे सीसीटीवी फुटेज का भी निरीक्षण किया। हालांकि, इन सभी प्रयासों के बावजूद यह साबित नहीं हो पाया कि आरोपी ने युवती के साथ कोई गैरकानूनी कार्य किया।
वकील और न्याय विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला युवाओं और परिवारों के लिए एक चेतावनी है कि किसी भी आरोप या शिकायत को दर्ज करने से पहले पूरी जांच और तथ्यों को समझना जरूरी है। अधूरी जानकारी या गलत बयान गंभीर कानूनी परिणाम ला सकते हैं।
इस मामले में यह भी देखा गया कि जब युवती और उसके माता-पिता ने अदालत में अपने पुराने बयानों को पलटा, तो आरोपी के लिए कानूनी प्रक्रिया में राहत की स्थिति बन गई। अदालत ने साफ किया कि दोष सिद्ध न होने तक किसी को दोषी नहीं माना जा सकता।
सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने कहा कि पीड़िता के बयान में बदलाव और साक्ष्यों की कमी ने मामले की गंभीरता को प्रभावित किया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि भविष्य में इस तरह के मामलों में जांच प्रक्रिया और बयानों को अधिक सावधानी और निष्पक्षता से लिया जाए।
इस पूरे घटनाक्रम ने समाज में एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि नाबालिगों के मामलों में आरोप लगाने और साबित करने की प्रक्रिया कितनी संवेदनशील और जटिल होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल आरोपों पर ही कोई निष्कर्ष निकालना गलत होगा, बल्कि सभी तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ही न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है।
आखिरकार, इस मामले में आरोपी अमित अब कानूनी रूप से बरी हो चुका है और उसके खिलाफ सभी आरोप समाप्त हो गए हैं। वहीं, युवती और उसके परिवार के लिए यह अनुभव कठिन रहा, लेकिन अदालत ने सुनिश्चित किया कि सभी पक्षों के अधिकारों और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाए।
यह मामला न केवल रोहतक के लिए बल्कि पूरे देश के लिए एक उदाहरण है कि कानून व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों और गवाही की अहमियत कितनी अधिक है।

