
593 करोड़ के फर्जी GST बिलिंग नेटवर्क का खुलासा: DGGI की छापेमारी में टैक्स कंसल्टेंट गिरफ्तार, कई शेल कंपनियों का जाल सामने
देश में जीएसटी व्यवस्था लागू होने के बाद से कर चोरी के तौर-तरीके भी बदलते रहे हैं। अब नकद लेनदेन के बजाय डिजिटल बिलिंग और फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के जरिए राजस्व को नुकसान पहुंचाने के मामले सामने आ रहे हैं। इसी कड़ी में माल एवं सेवा कर खुफिया महानिदेशालय (डीजीजीआई) ने एक बड़े फर्जी बिलिंग नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जिसमें करीब 593 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन का खुलासा हुआ है। इस मामले में कथित मास्टरमाइंड मोहम्मद सैफुल्लाह को गिरफ्तार कर लिया गया है, जो बेंगलुरु से इस पूरे रैकेट का संचालन कर रहा था।

जांच की शुरुआत कैसे हुई
सूत्रों के अनुसार, इस मामले की शुरुआत एक संदिग्ध जीएसटी रजिस्ट्रेशन की नियमित जांच से हुई। जब अधिकारियों ने उस पंजीकरण से जुड़े रिटर्न और इनवॉइस डेटा का विश्लेषण किया, तो पाया कि कंपनी की घोषित खरीद-बिक्री और वास्तविक कारोबारी गतिविधियों में भारी अंतर है। इससे संदेह हुआ कि कहीं यह फर्जी इनवॉइस के जरिए टैक्स क्रेडिट लेने का मामला तो नहीं।
इस शुरुआती इनपुट के बाद डीजीजीआई की बेलगावी जोन टीम ने विस्तृत जांच शुरू की। डिजिटल रिकॉर्ड, बैंक ट्रांजेक्शन और ई-वे बिल की पड़ताल से एक ऐसा नेटवर्क सामने आया, जो कई कंपनियों और कंसल्टेंसी फर्मों के जरिए संगठित तरीके से फर्जी बिलिंग कर रहा था।
कंसल्टेंसी के नाम पर चलता था खेल
जांच में “स्टार टैक्स कंसल्टेंट” नाम से चल रहे एक प्रतिष्ठान की भूमिका सामने आई। डीजीजीआई ने इस कंसल्टेंसी से जुड़े कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। तलाशी के दौरान कंप्यूटर सिस्टम, हार्ड डिस्क, मोबाइल फोन, डिजिटल सिग्नेचर, बैंक दस्तावेज और ऑनलाइन अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर से जुड़ा डेटा जब्त किया गया।
इन दस्तावेजों से यह स्पष्ट हुआ कि यह केवल टैक्स सलाह देने वाली फर्म नहीं थी, बल्कि फर्जी बिलिंग और आईटीसी क्लेम कराने का संगठित केंद्र बन चुकी थी।
फर्जी इनवॉइस से कमाया करोड़ों का कमीशन
जांच एजेंसी के अनुसार, गिरोह का मुख्य काम बिना वास्तविक माल या सेवा के फर्जी इनवॉइस तैयार करना था। इन बिलों के आधार पर कंपनियां अपनी खरीद दिखाती थीं और उस पर इनपुट टैक्स क्रेडिट क्लेम कर लेती थीं। इससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान होता था, जबकि कंपनियां टैक्स बचाकर फायदा उठाती थीं।
बताया जा रहा है कि इस नेटवर्क के जरिए लगभग 235 करोड़ रुपये का आईटीसी गलत तरीके से लिया गया, जबकि कुल बिलिंग और वित्तीय गतिविधि का आकार करीब 593 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। जांच एजेंसी को आशंका है कि यह आंकड़ा आगे बढ़ सकता है, क्योंकि अभी डिजिटल डेटा की पूरी जांच बाकी है।
मास्टरमाइंड की भूमिका और नेटवर्क
जांच में सामने आया कि मोहम्मद सैफुल्लाह एक पंजीकृत जीएसटी प्रैक्टिशनर था और उसने कई निष्क्रिय या कागजी कंपनियों के जीएसटी नंबर अपने नियंत्रण में ले रखे थे। ये कंपनियां केवल दस्तावेजी अस्तित्व रखती थीं और उनका कोई वास्तविक व्यापार नहीं था।
इन शेल कंपनियों के जरिए फर्जी खरीद-बिक्री दिखाई जाती थी, ई-वे बिल बनाए जाते थे और क्लाइंट कंपनियों को ऐसे दस्तावेज दिए जाते थे जिनसे वे टैक्स क्रेडिट का लाभ ले सकें। बदले में सैफुल्लाह इनवॉइस मूल्य का एक प्रतिशत कमीशन के रूप में लेता था।
अधिकारियों ने बताया कि जब उसे डिजिटल रिकॉर्ड और बैंकिंग ट्रेल दिखाए गए, तो उसने कथित रूप से अपनी भूमिका स्वीकार कर ली।
गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई
डीजीजीआई ने उसे जीएसटी अधिनियम, 2017 की धारा 69 के तहत गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद उसे आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों की विशेष अदालत में पेश किया गया, जहां से ट्रांजिट रिमांड मंजूर हुआ। बाद में उसे बेलगावी की अदालत में प्रस्तुत किया गया, जिसने न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
अब एजेंसी उससे पूछताछ कर यह पता लगाने में जुटी है कि इस नेटवर्क से जुड़ी अन्य कंपनियां कौन-कौन हैं, किन राज्यों में इसका विस्तार था और किन कारोबारियों ने इसका लाभ उठाया।
शेल कंपनियों का संगठित नेटवर्क
जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह ने कई फर्जी कंपनियां बनाकर उन्हें अलग-अलग राज्यों में पंजीकृत कराया था। इन कंपनियों के नाम पर बैंक खाते खोले गए और डिजिटल सिग्नेचर जारी कराए गए। फिर ऑनलाइन अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर में काल्पनिक लेनदेन दर्ज किए जाते थे।
कई कंपनियों के पते जांच में फर्जी निकले। कुछ जगहों पर बंद दुकानें, तो कहीं खाली प्लॉट या किराये के कमरे दिखाए गए थे। इससे साफ है कि इनका इस्तेमाल केवल दस्तावेजी लेनदेन के लिए किया जा रहा था।
टेक्नोलॉजी से छिपाया जाता था ट्रेल
इस रैकेट की खास बात यह थी कि इसमें आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा था। क्लाउड आधारित अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर के जरिए कई कंपनियों के खाते एक साथ नियंत्रित किए जाते थे। इससे फर्जी बिलिंग, कर गणना और रिटर्न फाइलिंग का पूरा सिस्टम एक ही नेटवर्क से संचालित हो रहा था।
अब जांच एजेंसी इन सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म, सर्वर लॉग और आईपी एड्रेस की भी जांच कर रही है, ताकि यह पता चल सके कि इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोग कौन हैं।
सरकार की सख्ती और बढ़ती निगरानी
केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड यानी CBIC के अधीन काम करने वाली डीजीजीआई ने हाल के वर्षों में फर्जी आईटीसी और बिलिंग के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि जीएसटी प्रणाली में डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल ट्रैकिंग मजबूत होने से अब ऐसे मामलों का पता लगाना आसान हो गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि फर्जी आईटीसी नेटवर्क से न केवल सरकार को नुकसान होता है, बल्कि बाजार में ईमानदार करदाताओं के लिए प्रतिस्पर्धा भी प्रभावित होती है। इसलिए ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई जरूरी है।
आगे की जांच और संभावित कार्रवाई
जांच अभी जारी है और एजेंसी को उम्मीद है कि पूछताछ से कई अन्य लाभार्थियों के नाम सामने आ सकते हैं। यदि यह साबित होता है कि कंपनियों ने जानबूझकर फर्जी आईटीसी लिया है, तो उन्हें टैक्स वसूली, भारी जुर्माना और आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है।
डीजीजीआई के अधिकारी संकेत दे रहे हैं कि आने वाले समय में और छापेमारी तथा गिरफ्तारियां हो सकती हैं, क्योंकि इस नेटवर्क की जड़ें कई राज्यों तक फैली होने की आशंका है।
