
: 4 दिन में गर्भवती होने का दावा, हाईकोर्ट ने दिया DNA टेस्ट का आदेश
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक आर्मी जवान और उसकी पत्नी के बीच चल रहे लंबे वैवाहिक विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए डीएनए टेस्ट के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह जांच बच्चे को अवैध ठहराने के लिए नहीं, बल्कि पत्नी पर लगाए गए व्यभिचार के आरोपों की सच्चाई जानने के लिए आवश्यक है। इस फैसले ने पारिवारिक विवादों और तलाक से जुड़े मामलों में कानूनी बहस को नई दिशा दे दी है।

यह मामला करीब एक दशक पुराने वैवाहिक तनाव से जुड़ा है। पति भारतीय सेना में कार्यरत है और दोनों के बीच लंबे समय से मतभेद चल रहे हैं। तलाक की तीन अलग-अलग याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं, लेकिन विवाद का अंतिम समाधान अब तक नहीं हो सका। इसी बीच पत्नी द्वारा बच्चे के डीएनए टेस्ट के आदेश को चुनौती देने पर मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ में हुई। पत्नी की ओर से दलील दी गई कि डीएनए टेस्ट का आदेश बच्चे की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाता है और यह उसके सम्मान और अधिकारों के खिलाफ है। हालांकि अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि डीएनए जांच का उद्देश्य बच्चे की कानूनी स्थिति तय करना नहीं है। यह सिर्फ इस बात की जांच के लिए है कि पति द्वारा लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है।
विवाद की जड़ उस दावे से जुड़ी है, जिसने पूरे मामले को गंभीर बना दिया। पति का कहना है कि वह अक्टूबर 2015 में पत्नी के बुलावे पर घर आया था। कुछ समय साथ बिताने के बाद वह वापस अपनी ड्यूटी पर लौट गया। उसके लौटने के महज चार दिन बाद पत्नी ने उसे बताया कि वह गर्भवती है। पति का तर्क है कि मेडिकल साइंस के अनुसार इतनी जल्दी गर्भावस्था की पुष्टि होना संदिग्ध है। यही बात उसके मन में शंका का कारण बनी।
इसके अलावा बच्ची का जन्म अक्टूबर 2015 के लगभग आठ महीने बाद हुआ। पति ने अदालत में यह भी कहा कि उस अवधि में वह लगातार ड्यूटी पर तैनात था और पत्नी के साथ नहीं रह रहा था। इन परिस्थितियों को देखते हुए उसने फैमिली कोर्ट में डीएनए टेस्ट की मांग की थी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि बच्ची जैविक रूप से उसकी संतान है या नहीं।
फैमिली कोर्ट ने परिस्थितियों और प्रस्तुत तथ्यों को देखते हुए डीएनए टेस्ट का आदेश दिया। पत्नी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसका कहना था कि इस तरह की जांच से बच्चे की सामाजिक पहचान और भविष्य प्रभावित हो सकता है। लेकिन हाईकोर्ट ने माना कि जब तलाक का आधार व्यभिचार हो और पति स्पष्ट रूप से कह रहा हो कि वह बच्चे की वैधता या भरण-पोषण पर विवाद नहीं कर रहा, तब सच्चाई सामने लाने के लिए डीएनए टेस्ट कराना गलत नहीं है।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यदि पत्नी डीएनए सैंपल देने से इनकार करती है, तो फैमिली कोर्ट को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(h) या नए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA 2023) के तहत प्रतिकूल अनुमान लगाने का अधिकार होगा। इसका मतलब है कि यदि कोई पक्ष जांच से बचने की कोशिश करता है, तो अदालत उसके खिलाफ अनुमान लगा सकती है।
इस मामले का एक और अहम पहलू यह है कि पति ने पहले भी तलाक की दो याचिकाएं दाखिल की थीं। वर्ष 2019 में पहली याचिका दायर की गई थी, जिसे आपसी सहमति से तलाक का आश्वासन मिलने पर वापस ले लिया गया। उसी वर्ष दूसरी याचिका दाखिल की गई, लेकिन पत्नी दूसरी मोशन में पेश नहीं हुई, जिसके कारण मार्च 2021 में वह मामला बंद हो गया। इसके बाद 2021 में तीसरी तलाक याचिका दायर की गई, जो अभी भी लंबित है। इसी याचिका में व्यभिचार का आरोप लगाते हुए डीएनए टेस्ट की मांग की गई थी।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि अदालत का काम सच्चाई तक पहुंचना है। यदि तथ्यों और परिस्थितियों से गंभीर संदेह उत्पन्न होता है, तो वैज्ञानिक जांच को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। डीएनए टेस्ट आज के समय में सटीक और विश्वसनीय माध्यम माना जाता है, जिससे जैविक संबंधों की पुष्टि की जा सकती है। ऐसे में अदालत ने इसे न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा मानते हुए उचित ठहराया।
यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, जहां पति-पत्नी के बीच विश्वास का संकट और गंभीर आरोप-प्रत्यारोप हों। अदालत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए यह सुनिश्चित किया कि बच्चे की कानूनी स्थिति प्रभावित न हो, साथ ही आरोपों की निष्पक्ष जांच भी हो सके।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय पारिवारिक मामलों में डीएनए जांच की सीमा और उपयोगिता को लेकर स्पष्ट दिशा देता है। कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि यदि तलाक का आधार व्यभिचार हो और तथ्यों से संदेह उत्पन्न हो, तो वैज्ञानिक परीक्षण का सहारा लेना कानून के दायरे में है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह दिखाया है कि वैवाहिक विवाद केवल निजी मसला नहीं रह जाता, बल्कि कानूनी और सामाजिक पहलुओं से भी गहराई से जुड़ जाता है। अब सबकी निगाहें फैमिली कोर्ट की आगे की कार्यवाही पर टिकी हैं, जहां डीएनए जांच की रिपोर्ट इस लंबे विवाद की दिशा तय कर सकती है।



