
वेलकम झील की हकीकत: करोड़ों खर्च के बाद सूखा जलाशय, मैदान बना ‘लेक’ और सिस्टम पर उठे सवाल
पूर्वी दिल्ली में स्थित Welcome Lake आज एक ऐसी कहानी बयां कर रही है, जो सरकारी योजनाओं और उनके क्रियान्वयन के बीच की दूरी को साफ उजागर करती है। कभी यह झील इलाके की शान हुआ करती थी—चारों तरफ पानी, हरियाली और सुकून का माहौल। लेकिन आज यही झील सूखकर धूल भरे मैदान में बदल चुकी है, जहां अब बच्चे क्रिकेट खेलते हैं और लोग इसे एक खाली पड़ी जमीन के रूप में देखने लगे हैं।

करीब 32 एकड़ में फैला यह क्षेत्र अब अपनी पहचान खो चुका है। जहां पहले पानी लहराता था, वहां अब सूखी मिट्टी और धूल उड़ती नजर आती है। झील के बीचों-बीच सिर्फ एक छोटा सा गड्ढा बचा है, जिसमें गंदा और बदबूदार पानी जमा है। आसपास से गुजरने वाले लोग भी इस बदहाली को देखकर हैरान रह जाते हैं।
स्थानीय निवासियों के अनुसार, वेलकम झील का क्षेत्र पहले लगभग 39 एकड़ हुआ करता था। लेकिन समय के साथ अतिक्रमण और उपेक्षा के कारण इसका दायरा घटकर 32 एकड़ रह गया। इसमें भी केवल 14 एकड़ क्षेत्र में झील को विकसित करने की योजना बनाई गई थी। हालांकि, यह योजना अब तक अधूरी ही पड़ी है।
इस झील के पुनर्जीवन की योजना कोई हालिया नहीं है। करीब 20 साल पहले इसे पुनर्जीवित करने का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन लंबे समय तक यह फाइलों में ही अटका रहा। बाद में सरकार ने करीब 22 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया और उम्मीद जगी कि अब झील की तस्वीर बदलेगी। लेकिन यह उम्मीद भी पूरी नहीं हो सकी।
परियोजना के तहत झील में पानी बनाए रखने के लिए नालों के गंदे पानी को साफ कर उसे झील में डालने की योजना बनाई गई थी। इसके लिए लगभग 7 करोड़ रुपये की लागत से एक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगाया गया। लेकिन यह प्लांट कुछ समय बाद ही बंद हो गया और अब कई सालों से बेकार पड़ा है। इसके चलते झील में पानी पहुंचाने की पूरी व्यवस्था ठप हो चुकी है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि हर साल झील के पुनर्जीवन को लेकर नई घोषणाएं होती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं दिखता। किशन नाम के एक निवासी बताते हैं कि पहले यहां पानी होता था और लोग परिवार के साथ घूमने आते थे, लेकिन अब यह जगह मैदान बन गई है। उनका कहना है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद झील की हालत जस की तस बनी हुई है।
सुंदर पाल का कहना है कि उन्होंने पिछले कई सालों से इस झील को सूखा ही देखा है और इसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही है। वहीं राम निवास कहते हैं कि हर साल यही सुनने को मिलता है कि इस बार काम पूरा हो जाएगा, लेकिन कुछ भी बदलता नहीं है।
वसीम नाम के एक अन्य स्थानीय निवासी ने भी नाराजगी जताई। उनका कहना है कि झील में अब पानी नहीं, बल्कि बदबूदार गंदगी है। इसके बावजूद यहां लेजर शो और कैफे जैसी योजनाओं की बात की जाती है, जो हकीकत से बिल्कुल अलग हैं।
यह स्थिति केवल वेलकम झील की नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की भी झलक दिखाती है, जहां योजनाएं तो बड़े स्तर पर बनाई जाती हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन कमजोर रहता है। इससे न केवल सरकारी धन की बर्बादी होती है, बल्कि लोगों का भरोसा भी टूटता है।
पर्यावरण के नजरिए से भी यह स्थिति चिंताजनक है। झीलें और जलाशय किसी भी शहर के लिए बेहद जरूरी होते हैं। ये न केवल भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद करते हैं, बल्कि तापमान को संतुलित रखने और प्रदूषण को कम करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में वेलकम झील का सूख जाना पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस झील का सही तरीके से पुनर्जीवन किया जाए, तो यह क्षेत्र एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल बन सकता है। इसके लिए जरूरी है कि प्रशासन इस परियोजना को गंभीरता से ले और इसे तय समय सीमा में पूरा करने के लिए ठोस कदम उठाए।
अतिक्रमण हटाना, एसटीपी को दोबारा चालू करना और झील में नियमित रूप से साफ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करना इस दिशा में जरूरी कदम हो सकते हैं। साथ ही स्थानीय समुदाय को भी इस प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए, ताकि झील की देखभाल बेहतर तरीके से हो सके।
अंततः, वेलकम झील की मौजूदा स्थिति एक बड़ा सबक है। यह हमें बताती है कि केवल योजनाएं बनाना काफी नहीं है, बल्कि उनका सही और समय पर क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी और निगरानी मजबूत नहीं होगी, तब तक ऐसे ही करोड़ों रुपये खर्च होते रहेंगे और नतीजे शून्य ही रहेंगे।
अब समय है कि संबंधित विभाग इस ओर ध्यान दें और इस झील को फिर से जीवंत बनाने के लिए ठोस कदम उठाएं। ताकि यह स्थान एक बार फिर से लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सके, न कि सरकारी लापरवाही और विफलता का प्रतीक।



