देश

राज्यसभा हार के बाद महागठबंधन में दरार—तेजस्वी पर सवाल, विधायकों की नाराजगी खुलकर आई सामने

बिहार की राजनीति में राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर सियासी समीकरणों को हिला कर रख दिया है। पांचों सीटों पर एनडीए की जीत के बाद महागठबंधन के भीतर असंतोष और आपसी खींचतान खुलकर सामने आ गई है। यह हार केवल संख्याओं का खेल नहीं रही, बल्कि इसके पीछे गहरी अंदरूनी नाराजगी, असहमति और नेतृत्व पर उठते सवाल भी छिपे हुए हैं। अब स्थिति यह बन गई है कि विपक्षी गठबंधन के भीतर ही एकजुटता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।

राज्यसभा चुनाव में मिली इस हार के बाद सबसे ज्यादा दबाव राष्ट्रीय जनता दल के नेता और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav पर है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि अगर कुछ लोगों ने धोखा नहीं दिया होता तो परिणाम अलग हो सकते थे। उनके इस बयान ने यह संकेत दे दिया कि हार के पीछे विपक्ष के अपने ही विधायक जिम्मेदार हैं। हालांकि, यह बयान जितना सीधा था, उतना ही सियासी रूप से संवेदनशील भी, क्योंकि इससे गठबंधन के भीतर अविश्वास और बढ़ सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर तेजस्वी यादव अपने ही विधायकों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं, तो यह उनके लिए भारी पड़ सकता है। खासतौर पर अगर राजद विधायक Faisal Rahman पर कोई सख्त कदम उठाया जाता है, तो इससे विधानसभा में उनकी संख्या घट सकती है और नेता प्रतिपक्ष का पद भी खतरे में आ सकता है। बिहार विधानसभा में इस पद के लिए न्यूनतम 25 विधायकों का समर्थन जरूरी होता है।

दूसरी ओर कांग्रेस भी इस पूरे घटनाक्रम में खुद को अलग-थलग महसूस कर रही है। पार्टी के भीतर से ही आवाज उठने लगी है कि उनके नेताओं और विधायकों की अनदेखी की गई। कांग्रेस विधायक Surendra Kushwaha ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की और टिकट चयन पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि महागठबंधन के पास एक सीट जीतने का मौका था, लेकिन गलत उम्मीदवार के चयन के कारण यह अवसर गंवा दिया गया।

कुशवाहा ने अपने बयान में यह भी कहा कि अगर Deepak Yadav या Mukesh Sahani जैसे नेताओं को उम्मीदवार बनाया जाता, तो स्थिति अलग हो सकती थी। उनके अनुसार, जिस उम्मीदवार को टिकट दिया गया, उसका जनाधार महागठबंधन के पक्ष में नहीं था, जिससे कार्यकर्ताओं और विधायकों में असंतोष पैदा हुआ।

यह असंतोष केवल एक विधायक तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस के अन्य विधायकों ने भी अलग-अलग कारण बताते हुए मतदान से दूरी बनाई। Manoj Vishwas ने कहा कि जब पार्टी के विधायकों को ही सम्मान नहीं मिलेगा, तो मतदान करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। वहीं Manohar Prasad Singh ने आरोप लगाया कि उम्मीदवार चयन में दलित, अल्पसंख्यक और ओबीसी वर्गों की अनदेखी की गई, जो उनके मतदान न करने का मुख्य कारण बना।

इन बयानों से साफ है कि महागठबंधन के भीतर केवल राजनीतिक मतभेद ही नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर भी असंतोष है। यह स्थिति गठबंधन की भविष्य की रणनीति के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।

इस पूरे चुनाव में एक और दिलचस्प पहलू यह रहा कि महागठबंधन अपने बाहरी समर्थन को तो जुटाने में सफल रहा, लेकिन अपने ही विधायकों को एकजुट नहीं रख सका। तेजस्वी यादव ने AIMIM और BSP के विधायकों का समर्थन हासिल कर लिया था, जिससे जीत की उम्मीद बढ़ गई थी। लेकिन मतदान के दिन चार विधायकों की गैरहाजिरी ने पूरा खेल बिगाड़ दिया।

यह गैरहाजिरी ही हार का सबसे बड़ा कारण बनी। महागठबंधन के कुल 37 विधायकों ने ही मतदान किया, जबकि बाकी विधायक अलग-अलग कारणों से अनुपस्थित रहे। किसी ने उम्मीदवार को लेकर असहमति जताई, तो किसी ने व्यक्तिगत या पारिवारिक कारण बताए। लेकिन राजनीतिक तौर पर यह साफ है कि यह केवल संयोग नहीं, बल्कि रणनीतिक विफलता का परिणाम था।

इस हार के बाद अब गठबंधन के भीतर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। पूर्णिया से सांसद Pappu Yadav ने भी तेजस्वी यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उनकी जिम्मेदारी थी कि वे सभी सहयोगी दलों से बातचीत करते और उन्हें साथ लेकर चलते। उनका कहना है कि कांग्रेस नेतृत्व से संवाद की कमी इस हार का एक बड़ा कारण बनी।

वहीं कांग्रेस के विधान पार्षद Sameer Singh ने भी माना कि पार्टी अपने विधायकों को एकजुट रखने में असफल रही। उन्होंने कहा कि दूसरों पर आरोप लगाने के बजाय आत्ममंथन की जरूरत है, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति से बचा जा सके।

इस बीच एनडीए की ओर से भी विपक्ष पर तीखे हमले किए गए। केंद्रीय मंत्री Jitan Ram Manjhi ने सोशल मीडिया के जरिए तंज कसते हुए कहा कि जब टिकट वितरण में पारदर्शिता नहीं होगी, तो विधायक नाराज होंगे ही। उनका बयान विपक्ष की अंदरूनी कमजोरी को उजागर करने वाला माना जा रहा है।

पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अगर कांग्रेस अपने विधायकों के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो उसकी संख्या और कम हो सकती है। ऐसे में पार्टी पहले से ही कमजोर स्थिति में और पीछे चली जाएगी। यही वजह है कि फिलहाल कांग्रेस और राजद दोनों ही कार्रवाई और सुलह के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

राजनीतिक दृष्टि से यह हार केवल एक चुनावी पराजय नहीं, बल्कि नेतृत्व और रणनीति की परीक्षा भी है। Tejashwi Yadav के लिए यह समय बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्हें न केवल अपने दल को एकजुट रखना है, बल्कि सहयोगी दलों का भरोसा भी कायम रखना है।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि महागठबंधन इस संकट से कैसे उबरता है। क्या वह अपने मतभेदों को सुलझाकर एक मजबूत रणनीति बना पाएगा, या फिर यह दरार और गहरी होती जाएगी?

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि बिहार की राजनीति में यह घटना एक बड़े बदलाव का संकेत दे रही है। जहां एक ओर सत्ता पक्ष मजबूत होता नजर आ रहा है, वहीं विपक्ष को अपनी कमजोरियों पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। अगर समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले चुनावों में भी ऐसे ही नतीजे देखने को मिल सकते हैं।

यह हार एक सबक भी है—सिर्फ संख्या जुटाना काफी नहीं होता, बल्कि एकजुटता और भरोसा भी उतना ही जरूरी होता है। महागठबंधन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने भीतर के मतभेदों को दूर कर एक मजबूत और विश्वसनीय विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करे।

Join WhatsApp Channel Join Now
Subscribe and Follow on YouTube Subscribe
Follow on Facebook Follow
Follow on X-twitter Follow
Download from Google Play Store Download

Related Articles

Back to top button