
मानसिक बीमारी बनी वजह, नवजात की मौत मामले में मां को कोर्ट से बरी
पंजाब के मोहाली से सामने आए एक बेहद संवेदनशील और चौंकाने वाले मामले में अदालत ने तीन दिन की नवजात बच्ची की मौत के आरोप में फंसी मां को बरी कर दिया। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में जागरूकता की जरूरत को भी उजागर करता है। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि घटना के समय महिला की मानसिक स्थिति सामान्य नहीं थी, जिसके चलते उसे अपने कृत्य के परिणामों का ज्ञान नहीं था।

यह मामला नयागांव के वाड़ी करोरां इलाके का है, जहां रहने वाले राज कुमार ने 6 फरवरी 2023 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी अनीता ने उनकी तीन दिन की बच्ची को जिंदा मिट्टी में दबा दिया। इस घटना के बाद परिजनों ने बच्ची को तुरंत बाहर निकालकर अस्पताल पहुंचाया, लेकिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
घटना के बाद पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू की। शुरुआती तौर पर यह मामला बेहद गंभीर और जघन्य अपराध के रूप में देखा गया, जिसने पूरे इलाके को झकझोर दिया था।
मामले की सुनवाई अतिरिक्त सत्र न्यायालय में हुई, जहां अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष ने अपने-अपने तर्क रखे। अभियोजन पक्ष का कहना था कि महिला ने जानबूझकर अपनी नवजात बच्ची की हत्या की है और उसे सख्त सजा दी जानी चाहिए। उनका मानना था कि यह एक सोचा-समझा अपराध था।
दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि अनीता लंबे समय से मानसिक बीमारी से जूझ रही थी। उन्होंने कहा कि घटना के समय उसकी मानसिक स्थिति इतनी खराब थी कि वह सही और गलत का अंतर समझने में सक्षम नहीं थी। इसीलिए उसे अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।
सुनवाई के दौरान सबसे अहम भूमिका मेडिकल साक्ष्यों की रही। डॉक्टरों की टीम द्वारा अदालत में पेश की गई रिपोर्ट में यह सामने आया कि अनीता कई वर्षों से मानसिक रोग से पीड़ित थी और घटना के समय वह साइकोटिक लक्षणों से गुजर रही थी। डॉक्टरों ने यह भी बताया कि उसे अपनी गर्भावस्था तक का सही एहसास नहीं था, जो उसकी मानसिक स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।
अदालत ने अपने फैसले में इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि पूरे मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। यानी घटना को किसी ने अपनी आंखों से नहीं देखा था। पूरा केस परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, जो अपने आप में पर्याप्त नहीं माने जाते, खासकर तब जब बचाव पक्ष के पास मजबूत मेडिकल प्रमाण हों।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि आरोपी महिला को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि जब यह साबित हो चुका है कि घटना के समय महिला मानसिक रूप से अस्थिर थी, तो उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इसी आधार पर अदालत ने अनीता को बरी कर दिया और आदेश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।
इस फैसले के बाद समाज में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे न्यायसंगत मानते हैं, क्योंकि इसमें मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखा गया है। वहीं कुछ लोग इस बात से दुखी हैं कि एक मासूम बच्ची की जान चली गई और किसी को सजा नहीं मिली।
यह मामला एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में कितनी जागरूकता है। अक्सर मानसिक बीमारियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिसके परिणाम कभी-कभी बेहद गंभीर हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति को समय पर इलाज और देखभाल मिलना बेहद जरूरी है। परिवार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि ऐसे लोगों की स्थिति को समझें और उन्हें उचित सहायता प्रदान करें।
यह घटना एक परिवार के लिए गहरा आघात है, जिसने अपने ही घर में एक मासूम को खो दिया। साथ ही, यह पूरे समाज के लिए एक चेतावनी भी है कि मानसिक स्वास्थ्य को हल्के में लेना कितना खतरनाक हो सकता है।
फिलहाल, अदालत के फैसले के बाद यह मामला कानूनी रूप से समाप्त हो गया है, लेकिन इसके सामाजिक और मानवीय पहलुओं पर चर्चा अभी भी जारी है। यह घटना लंबे समय तक लोगों के मन में बनी रहेगी और हमें यह याद दिलाती रहेगी कि इंसान की मानसिक स्थिति को समझना और उसका सही इलाज करना कितना जरूरी है।



