
बेअदबी पर सख्ती की तैयारी: नया कानून फिलहाल टला, 2008 के एक्ट में बदलाव से कड़े होंगे प्रावधान
पंजाब में धार्मिक आस्थाओं से जुड़े मामलों को लेकर एक बार फिर बड़ा नीतिगत फैसला सामने आया है। राज्य सरकार ने फिलहाल नया कानून लागू करने के बजाय पुराने कानून को ही मजबूत बनाने का रास्ता चुना है। बेअदबी की घटनाओं को लेकर लंबे समय से सख्त कानून की मांग उठती रही है, और इसी दिशा में सरकार ने अब 18 साल पुराने “दि जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार अधिनियम-2008” में संशोधन करने का निर्णय लिया है।

दरअसल, सरकार पहले एक नया और व्यापक कानून लाने की तैयारी में थी, जिसका उद्देश्य सभी धर्मों के पवित्र ग्रंथों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। “पवित्र धर्मग्रंथों के विरुद्ध अपराध निवारण अधिनियम-2025” नाम से प्रस्तावित इस कानून का मसौदा तैयार कर लिया गया था और इसे जुलाई 2025 में विधानसभा में भी पेश किया गया। इस प्रस्ताव में सिख धर्म के साथ-साथ अन्य धर्मों के ग्रंथों को भी शामिल किया गया था, ताकि किसी भी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले मामलों पर सख्त कार्रवाई हो सके।
लेकिन विधानसभा में चर्चा के दौरान यह महसूस किया गया कि यह विषय अत्यंत संवेदनशील है और इसे जल्दबाजी में लागू करना सही नहीं होगा। इसके बाद इस मसौदे को एक सिलेक्ट कमेटी को सौंप दिया गया, जिसकी अध्यक्षता विधायक डॉ. इंदरबीर सिंह निज्जर कर रहे थे। इस कमेटी को विभिन्न धर्मों के विद्वानों, कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों से सुझाव लेने और एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
सिलेक्ट कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है, जिसमें कई अहम सुझाव शामिल हैं। कुछ विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया कि कानून में केवल धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि देवी-देवताओं, महापुरुषों और शहीदों की मूर्तियों और तस्वीरों की बेअदबी को भी शामिल किया जाना चाहिए। इससे कानून का दायरा काफी बढ़ जाता और इसे लागू करना भी अधिक जटिल हो सकता था।
सरकार का मानना है कि इस रिपोर्ट पर अभी और गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। यही कारण है कि फिलहाल नए कानून को लागू करने का फैसला टाल दिया गया है। इसके बजाय सरकार ने पुराने कानून में संशोधन कर तुरंत सख्ती दिखाने का रास्ता चुना है।
“दि जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार अधिनियम-2008” मूल रूप से सिख धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ की मर्यादा और सम्मान बनाए रखने के लिए बनाया गया था। इस कानून के तहत शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी को ही इस ग्रंथ की प्रतियों के प्रकाशन, भंडारण और वितरण का अधिकार दिया गया है।
हालांकि, इस कानून में सजा के प्रावधान को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। वर्तमान में इस अधिनियम के उल्लंघन पर अधिकतम दो साल की कैद और 50 हजार रुपये तक का जुर्माना निर्धारित है, जिसे कई लोग पर्याप्त नहीं मानते। यही वजह है कि अब सरकार इसमें बदलाव कर सजा को और सख्त बनाने की तैयारी कर रही है।
प्रस्तावित संशोधन के तहत बेअदबी के मामलों में सजा को बढ़ाकर 10 साल से लेकर उम्रकैद तक किया जा सकता है। इसके अलावा जुर्माने की राशि भी बढ़ाकर लाखों रुपये तक की जा सकती है। यह कदम स्पष्ट संकेत देता है कि सरकार धार्मिक भावनाओं के अपमान को लेकर अब और सख्त रुख अपनाने जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, सरकार इस कानून के केवल कुछ चुनिंदा प्रावधानों में ही बदलाव करेगी, ताकि प्रक्रिया लंबी न हो और कानून को जल्दी लागू किया जा सके। इसके लिए धार्मिक विद्वानों और कानूनी विशेषज्ञों से लगातार सलाह ली जा रही है, ताकि संशोधन संतुलित और प्रभावी हो।
एक और अहम पहलू तकनीकी सुधारों का है। सरकार श्री गुरु ग्रंथ साहिब की प्रतियों की सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए डिजिटल उपायों पर भी काम कर रही है। इसमें बारकोड, क्यूआर कोड और डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम लागू करने की योजना शामिल है, जिससे हर प्रति की निगरानी संभव हो सके और किसी भी तरह की गड़बड़ी को तुरंत पकड़ा जा सके।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चूंकि राज्य में चुनावी माहौल है, इसलिए सरकार पर यह दबाव है कि वह अपने वादों को जल्द से जल्द पूरा करे। नया कानून बनाने में समय लग सकता था, जबकि पुराने कानून में संशोधन कर तुरंत प्रभाव दिखाया जा सकता है।
सूत्रों के मुताबिक, सरकार 13 अप्रैल को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी में है। यह दिन सिख धर्म के लिए बेहद खास है, क्योंकि इसी दिन 1699 में खालसा पंथ की स्थापना हुई थी। इस अवसर पर संशोधन बिल पेश कर पारित कराने की योजना है, जिससे इस कदम को धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी मिल सके।
हालांकि, विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार पर सवाल उठा सकता है। कुछ दल यह तर्क दे सकते हैं कि जब नया कानून तैयार था, तो उसे लागू क्यों नहीं किया गया। इसके जवाब में सरकार का कहना है कि इतने संवेदनशील विषय पर सभी पक्षों की सहमति जरूरी है और जल्दबाजी में लिया गया फैसला भविष्य में विवाद पैदा कर सकता है।
कुल मिलाकर, पंजाब सरकार का यह कदम एक संतुलित रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। जहां एक ओर तत्काल सख्ती दिखाने के लिए पुराने कानून को मजबूत किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर नए और व्यापक कानून के लिए विचार-विमर्श की प्रक्रिया जारी रखी गई है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संशोधित कानून कितना प्रभावी साबित होता है और क्या इससे बेअदबी की घटनाओं पर वास्तव में अंकुश लगाया जा सकेगा। फिलहाल, पूरे राज्य की नजरें आने वाले विधानसभा सत्र पर टिकी हैं, जहां इस महत्वपूर्ण संशोधन को अंतिम रूप दिया जाएगा।



