
पराली जलाने पर पहली बड़ी कार्रवाई—5 किसानों पर FIR, 4 पर जुर्माना, एक दिन में 376 मामले दर्ज
चंडीगढ़ में रबी सीजन के दौरान पराली (फाने) जलाने की समस्या एक बार फिर गंभीर रूप लेती दिख रही है। प्रदूषण और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली इस प्रथा पर रोक लगाने के लिए प्रशासन ने इस बार सख्ती का रुख अपनाया है। पहली बार इस सीजन में पराली जलाने के मामलों में सीधे कानूनी कार्रवाई की गई है, जिसमें पांच किसानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है और चार किसानों पर जुर्माना लगाया गया है। इसके बावजूद हालात में सुधार नहीं दिख रहा है और घटनाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है।

कृषि विभाग और निगरानी एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार, हरसेक (HARSAC) से प्राप्त सैटेलाइट डेटा के आधार पर इन मामलों की पहचान की गई है। इसी तकनीकी निगरानी के जरिए उन किसानों को चिन्हित किया गया जिन्होंने खेतों में पराली जलाई। इस आधार पर फरीदाबाद, पलवल और सिरसा जिलों में कार्रवाई की गई है। फरीदाबाद और पलवल में दो-दो किसानों पर एफआईआर दर्ज हुई है, जबकि सिरसा में एक किसान के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।
इसके साथ ही आर्थिक दंड भी लगाया गया है। फरीदाबाद में दो मामलों में कुल 10 हजार रुपये का जुर्माना, पलवल में एक मामले में 5 हजार रुपये और सिरसा में एक मामले में 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है। कुल मिलाकर चार मामलों में 25 हजार रुपये का आर्थिक दंड लगाया गया है। प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई चेतावनी के रूप में है, ताकि अन्य किसान पराली जलाने से बचें।
हालांकि, इन सख्त कदमों के बावजूद पराली जलाने की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। बुधवार को ही एक ही दिन में पूरे राज्य में 376 मामले दर्ज किए गए, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। यह आंकड़ा बताता है कि अभी भी बड़ी संख्या में किसान खेतों में पराली जलाने की पुरानी पद्धति का इस्तेमाल कर रहे हैं।
अगर पूरे सीजन की बात करें, तो अब तक कुल 1327 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है और प्रशासन के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण को तेजी से बढ़ाता है, जिससे आसपास के क्षेत्रों में स्मॉग की स्थिति बन जाती है और लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है।
जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो बुधवार को सबसे ज्यादा मामले जींद जिले में दर्ज किए गए, जहां 121 घटनाएं सामने आईं। इसके बाद कैथल में 55, करनाल में 47 और रोहतक में 29 मामले दर्ज हुए। पानीपत और हिसार में 26-26 घटनाएं सामने आईं, जबकि फरीदाबाद में 25 और अंबाला व सिरसा में 11-11 मामले दर्ज किए गए। यह आंकड़े दिखाते हैं कि पराली जलाने की समस्या केवल एक या दो जिलों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राज्य में फैली हुई है।
अगर 1 अप्रैल से 29 अप्रैल तक के कुल आंकड़ों को देखें तो जींद जिला सबसे आगे है, जहां अब तक 207 मामले दर्ज किए गए हैं। इसके बाद रोहतक में 196, झज्जर में 156, करनाल में 111 और सोनीपत में 109 मामले सामने आए हैं। कैथल में 107, हिसार में 68, पानीपत में 85 और फतेहाबाद में 54 मामले दर्ज किए गए हैं। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि कुछ जिले पराली जलाने के मामलों में लगातार आगे बने हुए हैं।
पराली जलाने का मुख्य कारण किसानों द्वारा इसे जल्दी और कम लागत में निपटाने की कोशिश माना जाता है। खेतों में फसल कटाई के बाद बची पराली को हटाने के लिए मशीनरी या अन्य उपायों में समय और पैसा लगता है, इसलिए कई किसान इसे जलाना आसान तरीका मानते हैं। लेकिन इसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ता है और वायु गुणवत्ता बहुत खराब हो जाती है।
सरकार और कृषि विभाग लगातार किसानों को जागरूक करने की कोशिश कर रहे हैं कि पराली जलाने के बजाय वैकल्पिक तरीकों को अपनाया जाए। इसके लिए कई योजनाएं भी चलाई जा रही हैं, जिनमें पराली प्रबंधन मशीनों पर सब्सिडी, जागरूकता अभियान और तकनीकी सहायता शामिल है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर बदलाव की गति धीमी बनी हुई है।
प्रशासन का कहना है कि आगे भी इस तरह की घटनाओं पर कड़ी नजर रखी जाएगी और नियम तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रहेगी। जिन किसानों को चेतावनी के बावजूद पराली जलाते पाया जाएगा, उनके खिलाफ जुर्माना और कानूनी कार्रवाई दोनों की जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल दंडात्मक कार्रवाई से इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसके लिए किसानों को व्यवहारिक और आर्थिक रूप से लाभकारी विकल्प उपलब्ध कराना जरूरी है। जब तक पराली प्रबंधन के सस्ते और आसान उपाय व्यापक स्तर पर नहीं अपनाए जाएंगे, तब तक यह समस्या पूरी तरह खत्म होना मुश्किल है।
कुल मिलाकर, यह स्थिति सरकार, किसानों और पर्यावरण तीनों के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। जहां एक ओर प्रशासन सख्ती बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर किसानों की मजबूरी और संसाधनों की कमी भी इस समस्या को बढ़ा रही है। अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में इस दिशा में क्या नए कदम उठाए जाते हैं और क्या पराली जलाने की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है या नहीं।



