
जम्मू-कश्मीर में आतंक के खिलाफ बड़ा बदलाव: पहाड़ों में छिपे ठिकानों पर अब सीधे भारी हथियारों से कार्रवाई
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ चल रहे अभियानों में सुरक्षा बल अब एक नई और अधिक आक्रामक रणनीति अपनाने की तैयारी में हैं। लंबे समय तक सुरक्षाबलों की कार्यप्रणाली मुख्य रूप से घेराबंदी और मुठभेड़ आधारित रही, जिसमें आतंकियों के बाहर आने या गतिविधि दिखाने का इंतजार किया जाता था। लेकिन हाल के वर्षों में बढ़े खतरे, आधुनिक हथियारों से लैस आतंकियों की मौजूदगी और ऊंचाई वाले इलाकों में उनके सुरक्षित ठिकानों ने सुरक्षा एजेंसियों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है।

सूत्रों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग इलाकों में करीब 80 से अधिक विदेशी आतंकियों के सक्रिय होने की आशंका है। इनमें से अधिकांश को सीमा पार से घुसपैठ कर भेजा गया माना जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इन आतंकियों को बेहतर प्रशिक्षण, आधुनिक हथियार और विशेष गोला-बारूद उपलब्ध कराया गया है, जिससे वे लंबे समय तक छिपकर कार्रवाई करने में सक्षम हो जाते हैं।
पहाड़ी इलाकों में सुरक्षित ठिकाने बड़ी चुनौती
जांच एजेंसियों और सैन्य सूत्रों के मुताबिक, आतंकी अक्सर ऊंचे पहाड़ों, घने जंगलों और प्राकृतिक गुफाओं में छिपे रहते हैं। ऐसे स्थानों तक पहुंचना बेहद कठिन होता है और घेराबंदी के दौरान जवानों को ऊपर से हमले का खतरा रहता है। कई बार आतंकियों ने ऊंचाई का फायदा उठाकर घात लगाकर हमला किया, जिससे सुरक्षाबलों को नुकसान उठाना पड़ा।
इसी अनुभव के आधार पर अब रणनीति बदली जा रही है। नई योजना के अनुसार, अगर आतंकियों के ठिकानों की सटीक जानकारी मिलती है, तो उन्हें बाहर निकालने के बजाय सीधे ठिकानों को निशाना बनाया जाएगा। इसके लिए मोर्टार और अन्य भारी हथियारों के इस्तेमाल की संभावना पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
आधुनिक हथियारों से बढ़ा खतरा
सुरक्षा एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चिंता आतंकियों के पास मौजूद आधुनिक हथियार हैं। कई अभियानों में बरामद हथियारों से यह स्पष्ट हुआ है कि आतंकियों के पास अमेरिकी डिजाइन की राइफलें, स्वचालित हथियार और विशेष प्रकार की स्टील कोर वाली गोलियां मौजूद हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी गोलियां सामान्य बुलेटप्रूफ जैकेट और वाहन सुरक्षा को भी भेद सकती हैं।
2017 में पुलवामा के लेथपोरा कैंप पर हुए हमले के दौरान पहली बार इस तरह की गोलियों के इस्तेमाल ने सुरक्षा तंत्र को चौंका दिया था। उस हमले में सीआरपीएफ के जवानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। इसके बाद से जांच एजेंसियां लगातार ऐसे गोला-बारूद की सप्लाई चेन को समझने की कोशिश कर रही हैं।
विदेशी समर्थन और हथियारों की सप्लाई
सुरक्षा एजेंसियों को संदेह है कि आतंकियों को मिलने वाले हथियार और गोला-बारूद सीमा पार से संगठित नेटवर्क के जरिए पहुंचाए जाते हैं। हाल की एक मुठभेड़ में मारे गए आतंकियों के पास से मिले हथियारों ने इस शक को और मजबूत किया है। इन आतंकियों को जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों से जुड़ा बताया गया है, जो लंबे समय से भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे हैं।
कुछ रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि विशेष प्रकार की गोलियों के निर्माण में विदेशी तकनीक का इस्तेमाल होता है और इनके स्रोतों में चीन का नाम भी चर्चा में रहा है। हालांकि इस तरह की सूचनाओं की आधिकारिक पुष्टि करना अक्सर मुश्किल होता है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां इन पहलुओं की जांच करती रहती हैं।
अंतरराष्ट्रीय नियम और हथियारों की बहस
विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ प्रकार के आर्मर-पियर्सिंग गोला-बारूद के इस्तेमाल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा होती रही है। उदाहरण के तौर पर नाटो ने भी कई प्रकार के अत्यधिक घातक गोला-बारूद के उपयोग पर सीमाएं तय की हैं। भारत में भी सुरक्षा बलों के लिए कुछ हथियारों के इस्तेमाल पर कानूनी नियम लागू हैं, जिससे आतंकियों और सुरक्षाबलों के हथियारों में अंतर बना रहता है।
यही कारण है कि अब सुरक्षा एजेंसियां सीधे मुकाबले के बजाय तकनीक आधारित और दूर से किए जाने वाले हमलों पर अधिक ध्यान दे रही हैं।
नई रणनीति में तकनीक की बड़ी भूमिका
सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, आने वाले अभियानों में ड्रोन निगरानी, थर्मल इमेजिंग, सैटेलाइट इनपुट और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस का इस्तेमाल बढ़ाया जाएगा। इन तकनीकों से आतंकियों के ठिकानों की सटीक लोकेशन मिल सकेगी। इसके बाद जरूरत पड़ने पर मोर्टार या अन्य भारी हथियारों से ठिकानों को निशाना बनाया जा सकता है।
इस रणनीति का उद्देश्य दोहरा है — पहला, आतंकियों को सुरक्षित पनाहगाह का लाभ न मिले; और दूसरा, जवानों के हताहत होने का जोखिम कम किया जा सके। पिछले कुछ वर्षों में कई अभियानों में जवानों को नुकसान उठाना पड़ा है, खासकर तब जब आतंकियों ने ऊंचाई और कवर का फायदा उठाया।
स्थानीय नेटवर्क पर भी नजर
सुरक्षा एजेंसियां केवल विदेशी आतंकियों पर ही नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर सक्रिय नेटवर्क पर भी ध्यान दे रही हैं। खुफिया जानकारी जुटाने, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने और सीमा पार से घुसपैठ रोकने के लिए निगरानी और समन्वय बढ़ाया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सैन्य कार्रवाई से नहीं जीती जा सकती, बल्कि इसके लिए खुफिया, तकनीकी और सामाजिक स्तर पर भी समन्वित प्रयास जरूरी हैं। इसी सोच के तहत नई रणनीति तैयार की जा रही है।
निर्णायक चरण की ओर अभियान
सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यह बदलाव दर्शाता है कि अब सुरक्षाबल रक्षात्मक रणनीति से आगे बढ़कर निर्णायक कार्रवाई की ओर बढ़ रहे हैं। अगर नई नीति प्रभावी साबित होती है, तो पहाड़ी इलाकों में बने आतंकियों के सुरक्षित ठिकाने खत्म हो सकते हैं और उनके नेटवर्क को बड़ा झटका लग सकता है।
कुल मिलाकर, जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियान अब एक नए चरण में प्रवेश करता दिख रहा है, जहां तकनीक, खुफिया जानकारी और आक्रामक रणनीति का संयोजन भविष्य की कार्रवाई तय करेगा।

