
गेहूं खरीद पर सियासी घमासान, अभय चौटाला ने लगाया हजारों करोड़ के घोटाले का आरोप
हरियाणा में गेहूं खरीद को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है, जिसने प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है। इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभय सिंह चौटाला ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि गेहूं खरीद प्रक्रिया में बड़े स्तर पर गड़बड़ी हुई है और इससे करीब 2000 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आता है। उनके इस बयान के बाद किसान, विपक्ष और सरकार—तीनों के बीच यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बन गया है।

चंडीगढ़ में मीडिया से बातचीत करते हुए अभय चौटाला ने कहा कि सरकार द्वारा गेहूं खरीद के आंकड़ों में हेरफेर किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश से गेहूं सस्ते दामों पर खरीदकर उसे हरियाणा की मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर दिखाया गया। इस पूरी प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा है।
चौटाला के अनुसार, उत्तर प्रदेश के किसानों से गेहूं 600 से 800 रुपये प्रति क्विंटल कम कीमत पर खरीदा गया और फिर उसी गेहूं को हरियाणा में एमएसपी पर बेचकर भारी लाभ कमाया गया। उन्होंने दावा किया कि इस तरह के लेन-देन से लगभग 2000 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है। यह आरोप सीधे तौर पर सरकारी खरीद व्यवस्था की पारदर्शिता और ईमानदारी पर सवाल खड़े करता है।
उन्होंने सरकार के उस दावे को भी गलत बताया, जिसमें कहा गया था कि किसानों को उनकी फसल का भुगतान 72 घंटे के भीतर कर दिया जाता है। चौटाला ने कहा कि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। उनके मुताबिक, राज्य के कई किसानों को अब तक भुगतान नहीं मिला है और करीब 30 प्रतिशत किसानों का पैसा अभी भी बकाया है। इस स्थिति ने किसानों की आर्थिक हालत को और ज्यादा कठिन बना दिया है।
चौटाला ने यह भी आरोप लगाया कि मंडियों में किसानों से अवैध रूप से मजदूरी शुल्क वसूला जा रहा है। उन्होंने कहा कि किसानों को न केवल उनकी उपज का सही मूल्य नहीं मिल रहा, बल्कि उनसे अतिरिक्त पैसे भी लिए जा रहे हैं, जो पूरी तरह गलत है। यह किसानों के शोषण का एक और उदाहरण है।
सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए चौटाला ने बताया कि इस साल हरियाणा की मंडियों में 84.76 लाख टन गेहूं की आवक दर्ज की गई है, जिसमें से करीब 83 लाख टन गेहूं की खरीद एमएसपी पर की गई है। यह आंकड़ा पिछले साल की तुलना में लगभग 15 लाख टन अधिक है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में अतिरिक्त गेहूं कहां से आया।
उनका कहना है कि यह अतिरिक्त गेहूं वास्तव में उत्तर प्रदेश से लाया गया है और इसे हरियाणा की खरीद में शामिल दिखाया गया है। अगर यह सच है, तो यह एक बड़ा घोटाला है, जिसमें कई स्तरों पर मिलीभगत हो सकती है। इस तरह के आरोपों ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।
चौटाला ने यह भी कहा कि इस घोटाले को छिपाने के लिए सरकार ने ई-खरीद पोर्टल पर पूरी जानकारी अपलोड नहीं की है। उन्होंने इसे पारदर्शिता की कमी बताते हुए कहा कि यदि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो उसे सभी आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। उन्होंने मांग की कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके।
इस मुद्दे पर विपक्ष के अन्य नेताओं ने भी सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। किसानों से जुड़े संगठनों ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया है और कहा है कि यदि आरोप सही हैं, तो यह किसानों के साथ बड़ा धोखा है। उन्होंने सरकार से जल्द से जल्द इस मामले पर स्पष्ट जवाब देने की मांग की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर गेहूं खरीद में इस तरह की अनियमितताएं हुई हैं, तो इसका असर केवल किसानों पर ही नहीं, बल्कि पूरे कृषि तंत्र पर पड़ेगा। इससे सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे और भविष्य में किसानों का भरोसा कमजोर हो सकता है।
वहीं, अभी तक सरकार की ओर से इन आरोपों पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, यह मामला अब तेजी से राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है और आने वाले समय में इस पर और बहस देखने को मिल सकती है।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब किसान पहले ही कई तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। भुगतान में देरी, लागत में वृद्धि और बाजार की अनिश्चितता ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में यदि खरीद प्रक्रिया में भी गड़बड़ी होती है, तो यह किसानों के लिए और भी बड़ी परेशानी बन जाती है।
कुल मिलाकर, हरियाणा में गेहूं खरीद को लेकर उठे इस विवाद ने राज्य की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। अब यह देखना अहम होगा कि सरकार इन आरोपों का क्या जवाब देती है और क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाती है या नहीं। अगर जांच होती है, तो उससे सच्चाई सामने आ सकती है और दोषियों पर कार्रवाई भी संभव हो सकती है।



