उत्तर प्रदेश

गंगा एक्सप्रेसवे टोल पर बार-बार बदलाव से बढ़ी उलझन: तीन दिन में तीन अलग दरें, यात्रियों में असमंजस

उत्तर प्रदेश की सबसे महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में शामिल Ganga Expressway इन दिनों अपने टोल रेट्स को लेकर चर्चा के केंद्र में है। उद्घाटन के तुरंत बाद ही टोल दरों में लगातार बदलाव ने यात्रियों, परिवहन कंपनियों और आम लोगों को उलझन में डाल दिया है। महज तीन दिनों के भीतर तीन अलग-अलग दरें घोषित होने से यह सवाल उठने लगा है कि आखिर अंतिम टोल कितना होगा।

तीन दिन में तीन फैसले—क्यों बदलीं दरें?

गंगा एक्सप्रेसवे पर टोल दरों को लेकर Uttar Pradesh Expressways Industrial Development Authority (यूपीडा) स्पष्ट निर्णय नहीं ले पाया। पहले जो दरें तय की गईं, वे अगले ही दिन बदल दी गईं, और फिर एक बार फिर संशोधन किया गया।

सबसे पहले कार, जीप और हल्के वाहनों के लिए कुल टोल लगभग 1514 रुपये तय किया गया था। यह दर प्रति किलोमीटर 2.55 रुपये के हिसाब से निर्धारित की गई थी। चूंकि एक्सप्रेसवे की कुल लंबाई 594 किलोमीटर है, इसलिए यह राशि गणना के अनुसार तय हुई।

लेकिन यह दर ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। अगले ही दिन इसमें बड़ा बदलाव करते हुए टोल को बढ़ाकर 1800 रुपये कर दिया गया। इसके बाद तीसरे दिन एक बार फिर संशोधन किया गया और टोल को घटाकर 1765 रुपये कर दिया गया।

उद्घाटन के साथ ही शुरू हुई असमंजस की स्थिति

इस एक्सप्रेसवे का उद्घाटन 29 अप्रैल को प्रधानमंत्री Narendra Modi ने किया था। उद्घाटन से ठीक पहले और उसके बाद जारी दरों में लगातार बदलाव ने यह संकेत दिया कि टोल निर्धारण को लेकर अभी पूरी स्पष्टता नहीं थी।

आमतौर पर इतनी बड़ी परियोजनाओं में टोल दरें पहले ही अंतिम रूप में तय कर दी जाती हैं, लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ। इससे परियोजना की शुरुआती छवि पर भी असर पड़ा है।

अलग-अलग कंपनियों का हिस्सा

नवीनतम दरों के अनुसार, 1765 रुपये के टोल में विभिन्न कंपनियों का हिस्सा तय किया गया है। इसमें लगभग 1365 रुपये Adani Enterprises को और 440 रुपये IRB Infrastructure Developers को मिलने हैं।

यह दर्शाता है कि इस परियोजना में निजी कंपनियों की भागीदारी है और टोल दरों का निर्धारण उनके निवेश और रिटर्न को ध्यान में रखकर किया जा रहा है।

यात्रियों और ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर असर

बार-बार बदलती टोल दरों ने सबसे ज्यादा असर यात्रियों और ट्रांसपोर्ट कंपनियों पर डाला है। लंबी दूरी तय करने वाले वाहन चालकों के लिए टोल का खर्च महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में दरों में अनिश्चितता उनकी योजना को प्रभावित करती है।

ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि अगर टोल दरें पहले से स्पष्ट होतीं, तो वे अपने किराए और लॉजिस्टिक्स प्लानिंग को बेहतर तरीके से तय कर सकते थे। अब उन्हें बार-बार बदलाव के अनुसार अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है।

क्या ज्यादा महंगा है नया टोल?

यदि तुलना करें तो शुरुआती 1514 रुपये की दर सबसे कम थी। इसके मुकाबले 1800 रुपये की दर काफी ज्यादा थी, जबकि 1765 रुपये की अंतिम दर थोड़ी कम जरूर है, लेकिन फिर भी शुरुआती दर से ज्यादा है।

इसका मतलब यह हुआ कि यात्रियों को अब पहले की तुलना में अधिक टोल देना पड़ेगा। हालांकि एक्सप्रेसवे पर मिलने वाली सुविधाएं—जैसे बेहतर सड़क, कम समय और सुरक्षित यात्रा—को देखते हुए कुछ लोग इसे उचित भी मानते हैं।

परियोजना का रणनीतिक महत्व

गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण परियोजना है। इससे यात्रा का समय काफी कम हो जाएगा और औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।

यह एक्सप्रेसवे न केवल यातायात को सुगम बनाएगा, बल्कि व्यापार, पर्यटन और निवेश के नए अवसर भी पैदा करेगा। इसलिए इसकी सफलता राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम मानी जा रही है।

पारदर्शिता की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि टोल दरों को लेकर पारदर्शिता और स्थिरता बेहद जरूरी है। यदि दरें बार-बार बदलती हैं, तो इससे लोगों का भरोसा कम हो सकता है।

सरकार और यूपीडा को चाहिए कि वे स्पष्ट रूप से बताएं कि दरों में बदलाव क्यों किया गया और अंतिम दर क्या होगी। इससे भ्रम की स्थिति खत्म होगी और परियोजना के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ेगा।

आगे क्या हो सकता है?

अब सभी की नजर इस बात पर है कि टोल दरों को कब स्थायी रूप से तय किया जाएगा। उम्मीद है कि जल्द ही एक अंतिम और स्थिर दर घोषित की जाएगी, जिससे यात्रियों को राहत मिलेगी।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भविष्य में टोल दरों में संशोधन हो सकता है, लेकिन वह एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत होना चाहिए, न कि बार-बार अचानक बदलाव के रूप में।

निष्कर्ष

गंगा एक्सप्रेसवे जैसी बड़ी परियोजना से लोगों को काफी उम्मीदें हैं, लेकिन टोल दरों में बार-बार बदलाव ने शुरुआत में ही भ्रम पैदा कर दिया है। 1514 रुपये से 1800 रुपये और फिर 1765 रुपये तक का उतार-चढ़ाव यह दिखाता है कि निर्णय प्रक्रिया में अभी सुधार की जरूरत है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और संबंधित एजेंसियां इस स्थिति को कैसे संभालती हैं और यात्रियों को कब एक स्थिर और भरोसेमंद टोल प्रणाली मिलती है।

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