
इथेनॉल कूटनीति से बदलेगा दक्षिण एशिया का ऊर्जा नक्शा, नेपाल के साथ नई साझेदारी की ओर भारत का बड़ा कदम
भारत अब केवल अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह अपने पड़ोसी देशों के साथ मिलकर एक क्षेत्रीय ऊर्जा नेटवर्क तैयार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसी रणनीति के तहत इथेनॉल निर्यात को लेकर नई संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, जिसकी शुरुआत नेपाल के साथ बातचीत से हुई है। यह पहल आने वाले समय में भारत की ऊर्जा नीति को नई दिशा दे सकती है और पूरे दक्षिण एशिया में सहयोग का एक नया मॉडल स्थापित कर सकती है।

दरअसल, इथेनॉल एक ऐसा जैव ईंधन है जो गन्ने, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में इथेनॉल उत्पादन और उसके उपयोग को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति के जरिए न केवल प्रदूषण को कम किया जा रहा है, बल्कि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता भी घटाई जा रही है। इसी कड़ी में अब सरकार निर्यात के विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार कर रही है।
ग्रेन्स इथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (JEMA) के अध्यक्ष सीके जैन का कहना है कि फिलहाल 1G इथेनॉल के निर्यात पर प्रतिबंध है, लेकिन पड़ोसी देशों की मांग को देखते हुए इस नीति में बदलाव संभव है। उन्होंने बताया कि नेपाल में इथेनॉल मिश्रण की शुरुआत के लिए भारत से सहयोग मांगा गया है, जिस पर दोनों देशों के बीच सकारात्मक बातचीत चल रही है।
हाल ही में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने नेपाल का दौरा किया, जहां वहां के अधिकारियों के साथ इथेनॉल मिश्रण को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। इस दौरान नेपाल को 10 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण (E10) अपनाने का सुझाव दिया गया। अगर यह योजना लागू होती है, तो भारत नेपाल को इथेनॉल की आपूर्ति कर सकता है। इससे न केवल दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ेगा, बल्कि ऊर्जा के क्षेत्र में एक नई साझेदारी भी विकसित होगी।
भारत पहले ही इथेनॉल मिश्रण के मामले में तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश का लक्ष्य E20 यानी 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण को व्यापक स्तर पर लागू करना है। इस पहल से हर साल लगभग 40,000 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत E85 और E100 जैसे उच्च स्तरों तक पहुंचता है, तो यह बचत 1 लाख करोड़ रुपये तक जा सकती है।
इथेनॉल उत्पादन बढ़ने का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिलने वाला है। गन्ना, मक्का और अन्य फसलों की मांग बढ़ने से किसानों की आय में सुधार होगा। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में इथेनॉल प्लांट्स की स्थापना से रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। इस तरह यह पहल कृषि और उद्योग दोनों क्षेत्रों को एक साथ मजबूती देने का काम करेगी।
ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए भारत फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों पर भी जोर दे रहा है। ये ऐसे वाहन होते हैं जो पेट्रोल और इथेनॉल के अलग-अलग मिश्रणों पर आसानी से चल सकते हैं। SIAM और सरकार के बीच इस तकनीक को लेकर लगातार चर्चा चल रही है। माना जा रहा है कि अगले 2-3 वर्षों में भारतीय बाजार में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन आम हो सकते हैं।
हालांकि, आम लोगों के बीच अभी भी इथेनॉल को लेकर कुछ भ्रम है, खासकर माइलेज को लेकर। कई लोग मानते हैं कि इथेनॉल मिश्रित ईंधन से गाड़ियों की माइलेज कम हो जाती है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि थोड़े बहुत अंतर के बावजूद इसके फायदे कहीं अधिक बड़े हैं। इथेनॉल एक स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है, जो पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाता है और देश को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाता है।
इसी बीच, भारत और नेपाल के कूटनीतिक संबंध भी लगातार मजबूत हो रहे हैं। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने हाल ही में नेपाल के निवर्तमान राजदूत शंकर प्रसाद शर्मा से मुलाकात की। इस बैठक में दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों की समीक्षा की गई और उन्हें और मजबूत बनाने पर जोर दिया गया।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस मुलाकात में भारत-नेपाल संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए प्रतिबद्धता दोहराई गई। विक्रम मिसरी ने कहा कि भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ सहयोग को और गहरा करना चाहता है और नेपाल इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने डॉ. शर्मा के कार्यकाल की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती मिली है।
शंकर प्रसाद शर्मा ने भी अपने कार्यकाल के दौरान भारत-नेपाल सहयोग को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है। उनकी आर्थिक समझ और कूटनीतिक अनुभव ने दोनों देशों के बीच विश्वास और साझेदारी को मजबूत किया है।
इथेनॉल निर्यात की यह पहल केवल एक व्यापारिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए भारत दक्षिण एशिया में अपनी भूमिका को और मजबूत करना चाहता है। अगर यह योजना सफल होती है, तो भविष्य में बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान जैसे अन्य देशों के साथ भी इसी तरह के समझौते हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, भारत की यह पहल कई स्तरों पर फायदे देने वाली है। इससे किसानों की आय बढ़ेगी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, पर्यावरण को लाभ होगा और देश की विदेशी मुद्रा की बचत भी होगी। साथ ही, पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में भी नई ऊर्जा आएगी।
आने वाले वर्षों में इथेनॉल कूटनीति भारत की विदेश नीति और ऊर्जा नीति दोनों का अहम हिस्सा बन सकती है। नेपाल के साथ शुरू हुई यह बातचीत इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो पूरे दक्षिण एशिया के ऊर्जा परिदृश्य को बदलने की क्षमता रखता है।

