
समय पर इलाज से जीती जंग: 5 हजार बच्चों ने हराया कैंसर
देश में बाल कैंसर को लेकर एक बेहद सकारात्मक और उम्मीद जगाने वाली खबर सामने आई है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को मात देकर पांच हजार से अधिक बच्चे आज पूरी तरह स्वस्थ और सामान्य जीवन जी रहे हैं। यह उपलब्धि न केवल आधुनिक चिकित्सा पद्धति की सफलता को दर्शाती है, बल्कि समय पर पहचान, सही इलाज और नियमित फॉलोअप की अहमियत को भी रेखांकित करती है।

यह महत्वपूर्ण जानकारी देश के प्रतिष्ठित संस्थान एम्स दिल्ली के पीडियाट्रिक विभाग की ऑन्कोलॉजी इकाई द्वारा किए गए एक विस्तृत अध्ययन में सामने आई है। इस अध्ययन का नेतृत्व विभाग की प्रमुख डॉ. रचना सेठ ने किया। शोध के अनुसार, इलाज के पांच साल बाद भी करीब 95 प्रतिशत बच्चे पूरी तरह स्वस्थ जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
2016 से 2024 के बीच 20 केंद्रों पर हुआ अध्ययन
यह अध्ययन वर्ष 2016 से 2024 के बीच देशभर के 20 प्रमुख चिकित्सा केंद्रों में किया गया। इसमें 0 से 18 वर्ष तक के कुल 5,419 कैंसर सर्वाइवर बच्चों को शामिल किया गया। अध्ययन की रिपोर्ट इसी महीने प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल The Lancet Child & Adolescent Health में प्रकाशित हुई है, जिससे इसकी विश्वसनीयता और महत्व और भी बढ़ जाता है।
अध्ययन के आंकड़े बेहद उत्साहजनक हैं। पूरे समूह में पांच वर्षों तक कुल सर्वाइवल दर 94.5 प्रतिशत रही, जबकि 89.9 प्रतिशत बच्चे पूरी तरह बीमारी से मुक्त पाए गए। इसका मतलब यह है कि अधिकांश बच्चों ने न केवल कैंसर को हराया, बल्कि लंबे समय तक स्वस्थ भी बने रहे।
नियमित फॉलोअप से और बेहतर परिणाम
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जिन बच्चों ने इलाज के बाद कम से कम दो वर्षों तक नियमित पोस्ट-ट्रीटमेंट फॉलोअप लिया, उनमें परिणाम और भी बेहतर रहे। ऐसे 2,266 बच्चों में पांच वर्ष तक सर्वाइवल दर 98.2 प्रतिशत रही और 95.7 प्रतिशत बच्चे पूरी तरह कैंसर-मुक्त पाए गए।
डॉ. रचना सेठ के अनुसार, समय पर निदान, उचित इलाज और निरंतर निगरानी बच्चों के स्वस्थ भविष्य की कुंजी है। उन्होंने बताया कि आज ये बच्चे सामान्य स्कूल जा रहे हैं, खेलकूद में भाग ले रहे हैं और अपने सपनों को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
इलाज की प्रक्रिया: कीमो, सर्जरी और रेडियोथेरेपी
अध्ययन में यह भी बताया गया कि इलाज के दौरान 94.7 प्रतिशत बच्चों को कीमोथेरेपी दी गई। लगभग 30.3 प्रतिशत बच्चों की सर्जरी की गई, जबकि 26.3 प्रतिशत को रेडियोथेरेपी दी गई। कई मामलों में इलाज का संयोजन अपनाया गया, ताकि बीमारी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सके।
लड़कों में कैंसर के मामले अपेक्षाकृत अधिक पाए गए। कुल 3,537 लड़के और 1,812 लड़कियां अध्ययन में शामिल थीं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतर सामाजिक और जागरूकता संबंधी कारणों से भी जुड़ा हो सकता है।
बच्चों में पाए गए प्रमुख कैंसर
रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों में सबसे अधिक एक्यूट ल्यूकेमिया के मामले सामने आए, जो कुल मामलों का लगभग 40.9 प्रतिशत था। इसके अलावा लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (34.4%), हॉजकिन लिंफोमा (12.9%), रेटिनोब्लास्टोमा (7.4%), बोन ट्यूमर (8.4%) और किडनी ट्यूमर (4.61%) जैसे कैंसर भी दर्ज किए गए।
विशेषज्ञों का कहना है कि बाल कैंसर वयस्कों के कैंसर से कई मामलों में अलग होता है। बच्चों में कैंसर का इलाज समय रहते शुरू कर दिया जाए तो उसके ठीक होने की संभावना काफी अधिक रहती है। यही कारण है कि इस अध्ययन के परिणाम उम्मीद जगाने वाले हैं।
जागरूकता बढ़ाने की पहल
बाल कैंसर के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाने के लिए रविवार को दिल्ली के इंडिया गेट पर एक वॉकथॉन का आयोजन किया जाएगा। इस कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों को यह संदेश देना है कि कैंसर का मतलब अंत नहीं है। सही समय पर इलाज और परिवार के सहयोग से इसे हराया जा सकता है।
उम्मीद और विश्वास की नई कहानी
कभी कैंसर का नाम सुनते ही लोग डर और निराशा से भर जाते थे, खासकर जब बात बच्चों की हो। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि चिकित्सा विज्ञान ने कितनी प्रगति कर ली है। अब कैंसर को शुरुआती चरण में पहचान कर उसका सफल इलाज संभव है।
विशेषज्ञों का मानना है कि माता-पिता को बच्चों में लंबे समय तक रहने वाले बुखार, असामान्य सूजन, अचानक वजन कम होना, बार-बार संक्रमण या आंखों में सफेद चमक जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच और इलाज से जीवन बचाया जा सकता है।
यह अध्ययन केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि हजारों परिवारों की खुशियों की वापसी की कहानी है। उन बच्चों की मुस्कान की कहानी है, जिन्होंने कठिन इलाज, दर्द और चुनौतियों के बावजूद जीवन को दोबारा अपनाया।
आज ये पांच हजार से अधिक बच्चे इस बात के जीवंत उदाहरण हैं कि कैंसर पर जीत संभव है। जरूरत है जागरूकता, सही इलाज और निरंतर देखभाल की। समय पर उठाया गया एक कदम न केवल बीमारी को रोक सकता है, बल्कि एक पूरे परिवार की दुनिया को फिर से रोशन कर सकता है।



