
सचिवालय मार्च बना संघर्ष का मैदान: सिलीगुड़ी में जनजातीय आंदोलन पर पुलिस कार्रवाई, सियासत भी गरमाई
उत्तर बंगाल के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में गुरुवार का दिन उथल-पुथल भरा रहा। जनजातीय अधिकारों को लेकर निकाले गए एक विरोध मार्च ने अचानक टकराव का रूप ले लिया, जब पुलिस ने जुलूस को रोकने के लिए बल प्रयोग किया। यह घटना उत्तर बंगाल के प्रमुख शहर सिलीगुड़ी में हुई, जहां जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा आयोजित ‘उत्तरकन्या अभियान’ के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हो गई।

इस झड़प में कई लोग घायल हुए और पुलिस ने कम से कम 16 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। घटना के बाद से इलाके में तनावपूर्ण शांति बनी हुई है और राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है।
आंदोलन की पृष्ठभूमि
दरअसल, पिछले सप्ताह फांसीदेवा क्षेत्र में जमीन विवाद को लेकर एक गंभीर घटना सामने आई थी। आरोप है कि विवाद के दौरान एक आदिवासी गर्भवती महिला के साथ मारपीट की गई। बाद में उसने बच्चे को जन्म दिया, लेकिन नवजात की मौत हो गई। इस घटना ने स्थानीय जनजातीय समुदाय में आक्रोश पैदा कर दिया।
इसी के विरोध में जनजाति सुरक्षा मंच ने राज्य सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए ‘उत्तरकन्या अभियान’ का आह्वान किया। उत्तरकन्या, जो कि उत्तर बंगाल में राज्य प्रशासन का मुख्य सचिवालय है, प्रतीकात्मक रूप से सत्ता का केंद्र माना जाता है। इसलिए प्रदर्शनकारियों का लक्ष्य वहीं तक मार्च करना था, ताकि सरकार पर दबाव बनाया जा सके। यह सचिवालय परिसर उत्तरकन्या सचिवालय के नाम से जाना जाता है।
इस अभियान को विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी का समर्थन भी प्राप्त था। यही कारण था कि मार्च में बड़ी संख्या में राजनीतिक कार्यकर्ता भी शामिल हुए और आंदोलन को राजनीतिक स्वरूप मिल गया।
कैसे शुरू हुआ मार्च
गुरुवार सुबह से ही प्रदर्शनकारियों का जुटान शुरू हो गया था। जलपाई मोड़ से मार्च की शुरुआत हुई और लोग नारेबाजी करते हुए सचिवालय की ओर बढ़ने लगे। मार्च में स्थानीय भाजपा नेताओं के साथ पार्टी के विधायक भी शामिल थे। इनमें डाबग्राम-फूलबाड़ी से विधायक शिखा चट्टोपाध्याय और फांसीदेवा से विधायक दुर्गा मुर्मू प्रमुख रूप से मौजूद थीं।
प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि जमीन विवाद की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों पर कार्रवाई हो और आदिवासी समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। मार्च के दौरान नारेबाजी और भाषणों में प्रशासन पर लापरवाही और पक्षपात के आरोप लगाए गए।
पुलिस की रोक और बढ़ता तनाव
जुलूस शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ रहा था, लेकिन जैसे ही यह तीनबत्ती मोड़ के पास पहुंचा, पुलिस ने बैरिकेड लगाकर रास्ता रोक दिया। पुलिस अधिकारियों ने कहा कि सचिवालय की ओर मार्च निकालने की अनुमति नहीं थी और सुरक्षा कारणों से भीड़ को आगे नहीं जाने दिया जा सकता।
पुलिस के इस फैसले से प्रदर्शनकारियों में नाराजगी फैल गई। कई लोग बैरिकेड हटाने की कोशिश करने लगे और पुलिस के साथ बहस शुरू हो गई। कुछ देर तक दोनों पक्षों के बीच नोकझोंक चलती रही, लेकिन धीरे-धीरे स्थिति बिगड़ने लगी।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब कुछ प्रदर्शनकारी बैरिकेड पार करने की कोशिश करने लगे, तब धक्का-मुक्की शुरू हो गई। माहौल तनावपूर्ण हो गया और पुलिस को लगा कि भीड़ नियंत्रण से बाहर हो सकती है।
लाठीचार्ज और भगदड़
स्थिति को संभालने के लिए पुलिस ने पहले चेतावनी दी, लेकिन जब भीड़ पीछे नहीं हटी तो लाठीचार्ज कर दिया गया। अचानक हुई कार्रवाई से भगदड़ मच गई। कई लोग गिर पड़े और कुछ को चोटें आईं। घायल प्रदर्शनकारियों को पास के अस्पतालों में इलाज के लिए ले जाया गया।
पुलिस ने मौके से 16 लोगों को हिरासत में लिया। अधिकारियों का कहना है कि ये वे लोग थे जो बैरिकेड तोड़ने या पुलिस से उलझने में आगे थे। पुलिस का दावा है कि कार्रवाई कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए की गई और न्यूनतम बल का प्रयोग किया गया।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
घटना के तुरंत बाद भाजपा नेताओं ने पुलिस कार्रवाई की तीखी आलोचना की। उनका कहना है कि यह लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है और राज्य सरकार विरोध की आवाज दबाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल कर रही है। नेताओं ने चेतावनी दी कि अगर जनजातीय समुदाय के साथ न्याय नहीं हुआ, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि सचिवालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र की ओर बिना अनुमति भीड़ को बढ़ने देना जोखिम भरा होता। अधिकारियों के मुताबिक, यदि भीड़ को नहीं रोका जाता तो स्थिति और गंभीर हो सकती थी।
सुरक्षा बढ़ाई गई
घटना के बाद पूरे इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। संवेदनशील स्थानों पर निगरानी बढ़ा दी गई है और प्रशासन ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। पुलिस का कहना है कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन किसी भी अप्रिय घटना से निपटने के लिए तैयारी पूरी है।
असली मुद्दा क्या है?
विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला सिर्फ एक विरोध मार्च या पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं है। इसके पीछे जमीन विवाद, आदिवासी अधिकार, प्रशासनिक संवेदनशीलता और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसे कई कारक जुड़े हुए हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर जमीन विवाद के मामले को समय रहते गंभीरता से सुलझाया जाता, तो इतना बड़ा आंदोलन नहीं होता। उनका मानना है कि प्रशासन और जनजातीय समुदाय के बीच संवाद की कमी ने स्थिति को बिगाड़ा।
आगे क्या?
पुलिस अब हिरासत में लिए गए लोगों से पूछताछ कर रही है और घटनास्थल के वीडियो फुटेज की जांच भी की जा रही है। प्रशासन यह जानने की कोशिश कर रहा है कि टकराव की शुरुआत कैसे हुई और क्या इसे टाला जा सकता था।
साथ ही, जमीन विवाद और गर्भवती महिला से जुड़े मामले की भी जांच जारी है। यही वह मुद्दा है जिसने पूरे आंदोलन को जन्म दिया और जिसने सिलीगुड़ी की सड़कों को संघर्ष का मैदान बना दिया।
निष्कर्ष
सिलीगुड़ी की यह घटना दिखाती है कि जब सामाजिक मुद्दे, राजनीतिक समर्थन और प्रशासनिक कार्रवाई एक साथ टकराते हैं, तो हालात कितनी जल्दी बिगड़ सकते हैं। अब सबकी नजर जांच पर है — क्या यह आंदोलन किसी बड़े राजनीतिक संघर्ष का संकेत बनेगा, या फिर प्रशासनिक कदमों से स्थिति शांत हो जाएगी?
फिलहाल इतना तय है कि इस टकराव ने उत्तर बंगाल की राजनीति और प्रशासन दोनों को नई चुनौती दे दी है।
