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हरियाणा राज्यसभा चुनाव—दूसरी सीट पर नजर, रणनीति तेज

हरियाणा के आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। सत्ता पक्ष भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस बार दोनों सीटें जीतने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है, जबकि कांग्रेस भी अपनी ताकत के दम पर कम से कम एक सीट सुरक्षित मानकर चल रही है। चुनावी गणित, क्रॉस-वोटिंग की संभावनाएं और राजनीतिक प्रबंधन—ये सभी फैक्टर इस चुनाव को बेहद दिलचस्प बना रहे हैं।

इसी बीच भाजपा खेमे में एक नाम लगातार चर्चा में है—तरुण भंडारी। माना जा रहा है कि पार्टी उन्हें एक बार फिर अहम जिम्मेदारी दे सकती है। भंडारी पहले भी अपने राजनीतिक प्रबंधन कौशल का प्रदर्शन कर चुके हैं, खासकर हिमाचल प्रदेश के राज्यसभा चुनाव में उनकी भूमिका को लेकर काफी चर्चा रही थी।

बताया जाता है कि हिमाचल के पिछले राज्यसभा चुनाव में सत्ता पक्ष कांग्रेस को बड़ा झटका लगा था। उस समय आरोप लगे थे कि कांग्रेस के छह विधायकों और तीन निर्दलीय विधायकों ने भाजपा उम्मीदवार हर्ष महाजन के पक्ष में मतदान किया। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा रही कि इस पूरी रणनीति के पीछे तरुण भंडारी की अहम भूमिका थी। हालांकि इस घटनाक्रम के बाद उन्हें कानूनी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। शिमला में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और हाल ही में हिमाचल पुलिस की एसआईटी ने उनसे पूछताछ भी की है।

दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान जब पूर्व मंत्री किरण चौधरी अपनी बेटी श्रुति चौधरी के साथ भाजपा में शामिल हुईं, तब मंच से उन्होंने खुलकर तरुण भंडारी का नाम लिया था। किरण चौधरी ने कहा था कि भाजपा में आने की प्रक्रिया में भंडारी का सबसे ज्यादा सहयोग रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे पार्टी के भीतर भंडारी की पकड़ और मजबूत मानी जा रही है।

सूत्रों के अनुसार, भाजपा में शामिल होने से पहले भंडारी ने किरण चौधरी और श्रुति चौधरी की केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक भी करवाई थी। यही वजह है कि हरियाणा की राजनीति में उन्हें भाजपा का रणनीतिकार या ‘चाणक्य’ तक कहा जाने लगा है। पार्टी हाईकमान में भी उनकी स्वीकार्यता बढ़ती बताई जा रही है।

अगर हरियाणा के राज्यसभा चुनावों के इतिहास पर नजर डालें तो यह साफ हो जाता है कि यहां केवल संख्या बल ही नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रबंधन भी निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। जून 2022 के चुनाव इसका ताजा उदाहरण हैं। उस चुनाव में हरियाणा से दो सीटों पर मतदान हुआ था। भाजपा के कृष्ण लाल पंवार ने एक सीट आसानी से जीत ली थी। दूसरी सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार कार्तिकेय शर्मा विजयी रहे थे, जिन्हें भाजपा का समर्थन प्राप्त था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय माकन उस मुकाबले में हार गए थे।

2022 का चुनाव इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि इसमें क्रॉस-वोटिंग की खबरें सामने आई थीं। साथ ही “पेन–स्याही” विवाद ने भी उस चुनाव को सुर्खियों में ला दिया था। यह हरियाणा के राज्यसभा चुनावों का सबसे चर्चित प्रक्रियात्मक विवाद माना जाता है।

अगर इससे पीछे जाएं तो 2016 का राज्यसभा चुनाव भी हरियाणा की राजनीति में एक नाटकीय उदाहरण के तौर पर याद किया जाता है। उस समय भी दो सीटों के लिए मतदान हुआ था। प्रमुख मुकाबला निर्दलीय लेकिन भाजपा समर्थित सुभाष चंद्रा और कांग्रेस समर्थित आर.के. आनंद के बीच था। विधानसभा में भाजपा के स्पष्ट बहुमत और मजबूत संगठनात्मक प्रबंधन ने सुभाष चंद्रा की जीत सुनिश्चित कर दी थी। वहीं आर.के. आनंद संख्या बल के अभाव में पीछे रह गए थे।

इन दोनों चुनावों ने यह साबित किया कि राज्यसभा चुनाव केवल लोकप्रियता का नहीं, बल्कि विधानसभा के अंकगणित और रणनीतिक प्रबंधन का खेल होता है। यही कारण है कि 2026 के संभावित चुनाव को लेकर भी राजनीतिक दल पूरी सतर्कता के साथ अपनी रणनीति बना रहे हैं।

अब अगर मौजूदा विधानसभा गणित की बात करें तो हरियाणा विधानसभा में कुल 90 विधायक हैं। इनमें भाजपा के पास 48 विधायक हैं, कांग्रेस के पास 37 विधायक, दो अन्य और तीन निर्दलीय विधायक हैं। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए कम से कम 31 विधायकों के वोट जरूरी होते हैं।

इस गणित के हिसाब से भाजपा अपने दम पर एक सीट आसानी से जीत सकती है, क्योंकि उसके पास 48 विधायक हैं। लेकिन दोनों सीटें जीतने के लिए उसे 62 वोटों की जरूरत होगी, जो उसके पास फिलहाल नहीं हैं। यानी दूसरी सीट के लिए भाजपा को निर्दलीय या अन्य विधायकों का समर्थन जुटाना होगा—या फिर किसी तरह की क्रॉस-वोटिंग उसके पक्ष में होनी होगी।

दूसरी तरफ कांग्रेस के पास 37 विधायक हैं, जो उसे एक सीट जिताने के लिए पर्याप्त हैं—बशर्ते पार्टी के सभी विधायक एकजुट होकर वोट करें। लेकिन राज्यसभा चुनावों का इतिहास बताता है कि कई बार क्रॉस-वोटिंग पूरे समीकरण को पलट देती है।

यही वजह है कि दोनों दल अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने पर खास जोर दे रहे हैं। पार्टी बैठकों, व्हिप और अंदरूनी समन्वय की भूमिका इस चुनाव में बेहद अहम रहने वाली है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर भाजपा को दूसरी सीट जीतनी है तो उसे अतिरिक्त समर्थन जुटाने के साथ-साथ मजबूत चुनावी प्रबंधन भी करना होगा। वहीं कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों को पूरी तरह एकजुट रखना होगी।

कुल मिलाकर हरियाणा का आगामी राज्यसभा चुनाव सीधा मुकाबला कम और रणनीति की जंग ज्यादा नजर आ रहा है। संख्या बल जहां अपनी जगह अहम है, वहीं राजनीतिक कौशल, समय पर लिए गए फैसले और विधायकों की वफादारी—ये सभी फैक्टर तय करेंगे कि आखिर राज्यसभा की दोनों सीटों पर किसका कब्जा होता है।

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