
साइबर ठगों का बड़ा खेल उजागर: 1100 बैंक खातों के जरिए 34 करोड़ की ठगी, गरीबों को बनाया गया माध्यम
मुरादाबाद में साइबर अपराध का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें ठगों ने बेहद सुनियोजित तरीके से गरीब और जरूरतमंद लोगों को अपने जाल में फंसाकर करोड़ों रुपये की ठगी को अंजाम दिया। साइबर पुलिस की जांच में खुलासा हुआ है कि पिछले तीन वर्षों में करीब 34 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी 1100 बैंक खातों के माध्यम से की गई। इस पूरे नेटवर्क का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन लोगों के नाम पर ये खाते खोले गए, वे अधिकतर आर्थिक रूप से कमजोर और जागरूकता की कमी से जूझ रहे थे।

जांच के दौरान पुलिस ने पाया कि इन बैंक खातों का इस्तेमाल केवल और केवल ठगी के पैसों के लेनदेन के लिए किया गया। सामान्य बैंकिंग गतिविधियां जैसे रोजमर्रा के ट्रांजैक्शन या बचत इन खातों में नहीं की गईं। इससे यह स्पष्ट हो गया कि इन खातों को खासतौर पर साइबर अपराध को अंजाम देने के लिए तैयार किया गया था।
एसपी क्राइम सुभाषचंद्र गंगवार के अनुसार, इन 1100 खातों में से 500 से अधिक खाते अब तक बंद किए जा चुके हैं, जबकि बाकी खातों पर नजर रखी जा रही है। पुलिस का कहना है कि इन खातों की पहचान करना और उन्हें चिन्हित करना इस पूरे मामले की जांच में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ है।
सबसे अधिक बैंक खाते मुरादाबाद जिले में ही खोले गए हैं, जहां करीब 400 से अधिक खातों की पुष्टि हुई है। इसके अलावा बदायूं जिले में भी बड़ी संख्या में खाते खोले गए, जिनका इस्तेमाल मुरादाबाद के लोगों से ठगे गए पैसों को ट्रांसफर करने में किया गया। इतना ही नहीं, संभल, रामपुर और बिजनौर जैसे अन्य जिलों के लोगों को भी इस नेटवर्क में शामिल किया गया।
ठगों का तरीका बेहद चालाकी भरा था। वे पहले ऐसे लोगों को निशाना बनाते थे जो आर्थिक रूप से कमजोर हों और सरकारी योजनाओं का लाभ पाने की उम्मीद रखते हों। उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता था कि यदि वे बैंक खाता खुलवाते हैं, तो उन्हें सरकारी सहायता मिलेगी। इस झांसे में आकर कई लोगों ने अपने नाम पर खाते खुलवा लिए।
खाता खुलने के बाद ठग उन खातों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेते थे। कुछ मामलों में खाता धारकों को मामूली रकम भी दी जाती थी, ताकि उन्हें शक न हो और वे इस प्रक्रिया का विरोध न करें। इसके बाद इन खातों में साइबर ठगी के जरिए प्राप्त रकम डाली जाती थी।
जैसे ही खाते में पैसा आता, कुछ ही घंटों के भीतर उसे कई अन्य खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता था। इस तेज और जटिल लेनदेन प्रक्रिया के कारण पुलिस के लिए पैसे के स्रोत और गंतव्य का पता लगाना काफी मुश्किल हो जाता था। इस तरह ठगों ने एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया था, जिससे वे लंबे समय तक पकड़ में नहीं आए।
हालांकि अब साइबर पुलिस इस नेटवर्क को तोड़ने में जुटी है। अब तक लगभग 800 बैंक खाता धारकों तक पुलिस पहुंच चुकी है और उनसे पूछताछ की जा रही है। शुरुआती जांच में यह सामने आया है कि अधिकतर खाता धारकों को इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि उनके खातों का इस्तेमाल अपराध के लिए किया जा रहा है।
पुलिस अब इन खाता धारकों के जरिए उन लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, जिन्होंने इन खातों को खुलवाने में भूमिका निभाई थी। माना जा रहा है कि इस पूरे गिरोह के पीछे एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा है, जिसमें कई लोग शामिल हो सकते हैं।
इस मामले में एक राहत की बात यह है कि जिन पीड़ितों ने समय पर शिकायत दर्ज कराई, उन्हें कुछ हद तक मदद मिल पाई है। साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर सूचना देने वाले लोगों में से कई को उनके ठगे गए पैसे वापस मिल चुके हैं। अब तक करीब 9 करोड़ रुपये की राशि पीड़ितों को लौटाई जा चुकी है।
पुलिस और साइबर विशेषज्ञों ने इस घटना के बाद लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। खासतौर पर यह कहा गया है कि किसी भी अनजान व्यक्ति के कहने पर बैंक खाता न खुलवाएं और अपनी व्यक्तिगत जानकारी जैसे आधार नंबर, बैंक डिटेल या ओटीपी किसी के साथ साझा न करें।
इसके अलावा, किसी भी संदिग्ध कॉल, मैसेज या लिंक पर भरोसा करने से पहले उसकी जांच करना बेहद जरूरी है। साइबर अपराधी अक्सर फर्जी ऑफर, लॉटरी या सरकारी योजना का लालच देकर लोगों को फंसाने की कोशिश करते हैं।
ऑनलाइन लेनदेन के दौरान यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वेबसाइट सुरक्षित हो और उसका URL “https” से शुरू होता हो। सार्वजनिक वाई-फाई का उपयोग करते समय भी सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि ऐसे नेटवर्क पर डेटा चोरी होने का खतरा अधिक होता है।
यह मामला एक बड़ी चेतावनी है कि साइबर अपराधी अब पहले से कहीं अधिक संगठित और चालाक हो गए हैं। ऐसे में आम लोगों को जागरूक और सतर्क रहना बेहद जरूरी है। सही समय पर उठाया गया एक कदम न सिर्फ आपकी मेहनत की कमाई को बचा सकता है, बल्कि आपको बड़ी परेशानी से भी दूर रख सकता है।



