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रावी और ब्यास जलाधिकरण मोहरा बना उतर भारत की गरमाई राजनीति सियासत :-अधिवक्ता पूनम आर्या

भारत के सबसे लंबे समय तक चल रहे अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों में से एक है। यह रावी और ब्यास नदियों के अधिशेष जल (जो 1960 की सिंधु जल संधि के तहत भारत को पूरी तरह मिली पूर्वी नदियों का हिस्सा हैं) के बंटवारे से जुड़ा है, जिसमें पंजाब, हरियाणा और राजस्थान शामिल हैं।

रावी और ब्यास जलाधिकरण मोहरा बना उतर भारत की गरमाई राजनीति सियासत :-अधिवक्ता पूनम आर्या
रावी और ब्यास जलाधिकरण (Ravi and Beas Waters Tribunal या RBWT) भारत के सबसे लंबे समय तक चल रहे अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों में से एक है। यह रावी और ब्यास नदियों के अधिशेष जल (जो 1960 की सिंधु जल संधि के तहत भारत को पूरी तरह मिली पूर्वी नदियों का हिस्सा हैं) के बंटवारे से जुड़ा है, जिसमें पंजाब, हरियाणा और राजस्थान शामिल हैं।
पृष्ठभूमि और गठन
• यह अधिकरण अप्रैल 1986 में अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 (संशोधित) के तहत गठित किया गया।इसका सीधा आधार 24 जुलाई 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और शिरोमणि अकाली दल नेता संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच हस्ताक्षरित राजीव-लोंगोवाल समझौते (पंजाब समझौता) का पैराग्राफ 9 है।
इसमें मुख्य कार्य (समझौते के पैरा 9.1–9.2 से)1 जुलाई 1985 तक पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में किसानों/उपभोक्ताओं द्वारा उपयोग किए जा रहे पानी की मात्रा की जांच करना (मौजूदा उपयोग की रक्षा के लिए)।अधिशेष/बचे पानी में पंजाब और हरियाणा के दावों का फैसला करना।अधिकरण को मूल रूप से 6 महीने में बाध्यकारी फैसला देना था, लेकिन स्पष्टीकरण, आपत्तियों और बार-बार विस्तार के कारण यह लगभग 40 साल से चल रहा है।
पूर्व-ट्रिब्यूनल ऐतिहासिक बंटवारा अधिशेष रावी-ब्यास जल (विभाजन पूर्व उपयोग ~3.13 MAF को छोड़कर) कई बार बांटा गया जिसमे 1955 मुख्यमंत्री सम्मेलन: प्रारंभिक बंटवारा,1976 सरकारी अधिसूचना (1966 पंजाब पुनर्गठन के बाद)।,1981 त्रिपक्षीय समझौता (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के मुख्यमंत्री): अनुमानित अधिशेष ~17.17 MAF; राजस्थान को 8.60 MAF, पंजाब को 4.22 MAF, हरियाणा को 3.50 MAF।
अधिकरण की 1987 रिपोर्ट (अंतरिम/प्रारंभिक पुरस्कार),30 जनवरी 1987 को प्रस्तुत (राज्यों को 20 मई 1987 को भेजी गई)।1985 पूर्व उपयोग सत्यापित: पंजाब ~3.106 MAF, हरियाणा ~1.620 MAF, राजस्थान ~4.985 MAF।बचे/अधिशेष में (पंजाब बनाम हरियाणा): पंजाब को 5.00 MAF और हरियाणा को 3.83 MAF सिफारिश (उतार-चढ़ाव में अनुपातिक समायोजन)।पंजाब के तर्क को यह कहते खारिज किया कि गैर-नदी-उद्गम (non-riparian) राजस्थान को अधिशेष पर कोई दावा नहीं।यह रिपोर्ट अंतिम नहीं थी; अगस्त 1987 में राज्यों (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान) और केंद्र ने ISRWD अधिनियम की धारा 5(3) के तहत स्पष्टीकरण/संशोधन के लिए संदर्भ दिए, जो आज तक लंबित हैं।क्यों मामला अनसुलझा है (मार्च 2026 तक की स्थिति)अधिकरण ने कभी अंतिम, अधिसूचित पुरस्कार जारी नहीं किया — केवल 1987 की अंतरिम रिपोर्ट है, जिसमे स्पष्टीकरण संदर्भ अनसुलझे हैं ।पंजाब ने 2004 में पंजाब समझौते समाप्ति अधिनियम (PTAA) पारित किया, जिसमें पूर्व समझौतों (1981 सहित) को समाप्त कर दिया और पंजाब को दायित्वों से मुक्त किया। राष्ट्रपति संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में इसे असंवैधानिक घोषित किया। मामला अधिकरण के समक्ष sub judice है और SYL नहर जैसे जुड़े सुप्रीम कोर्ट मामलों से जुड़ा। केंद्र द्वारा अधिकरण की अवधि सालाना बढ़ाई जाती है (ISRWD अधिनियम की धारा 5(3) की उप-धारा के प्रावधान के तहत)। नवीनतम विस्तार रिपोर्ट जमा करने की समय सीमा को 5 अगस्त 2026 तक बढ़ा दिया गया है।जिसमे हाल की गतिविधियां (2025–2026): अधिकरण के सदस्य (अध्यक्ष जस्टिस विनीत सरन, सदस्य जस्टिस पी. नवीन राव और जस्टिस सुमन श्याम) ने फील्ड विजिट/बैठकें कीं, जैसे फरवरी 2026 में पंजाब में रोपड़ निरीक्षण (किरती किसान यूनियन के किसानों के बड़े विरोध और हाईवे ब्लॉकेज के कारण रद्द ),पंजाब सीएम भगवंत मान ने फरवरी 2025 में अधिकरण से मुलाकात की (2026 संदर्भ में दोहराया), कहा कि पंजाब के पास “किसी राज्य को देने के लिए कोई पानी नहीं”, भूजल की कमी, खेतों में उपयोग दक्षता में सुधार (~21-22% से 60%+), और कोई अधिशेष नहीं।वही दूसरी तरफ हरियाणा ने सहकारी संघवाद के लिए चर्चाओं का स्वागत किया।पंजाब में विरोध जारी, riparian अधिकारों पर खतरे की आशंका। SYL नहर (1990 के दशक से पंजाब विरोध के कारण रुकी) और व्यापक रावी-ब्यास बंटवारे से जुड़ा महत्वपूर्ण।वर्तमान व्यावहारिक बंटवारा (अंतरिम/परिचालन)
भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) द्वारा प्रबंधित। हाल के वर्षों में उदाहरण: पंजाब ~5.512 MAF, हरियाणा ~2.987 MAF, राजस्थान ~3.318 MAF (लेकिन ओवर-ड्रॉइंग पर विवाद, जैसे हरियाणा साल की शुरुआत में हिस्से से अधिक ले लेता है)। पंजाब का तर्क: बदलती जलवायु (कम प्रवाह, जलवायु तनाव, अत्यधिक दोहन) से अब सच्चा अधिशेष नहीं, गैर-riparian दावे कमजोर।
(2026 संदर्भ),यह अधिकरण पंजाब की हालिया राजस्थान से ₹1.44 लाख करोड़ की मांग (1920 गंग नहर समझौते से जुड़ी) से जुड़ा है। पंजाब अधिकरण का इस्तेमाल गैर-riparian राज्यों (जैसे राजस्थान) को “मुफ्त” या अतिरिक्त आवंटन के खिलाफ तर्क देने के लिए कर रहा है।1987 रिपोर्ट की गैर-अंतिम स्थिति सब कुछ लटका रखती है। पंजाब का मामला riparian प्राथमिकता और वर्तमान कमी पर टिका, लेकिन सिंचाई सफलताएं (उच्च उपयोग) “कोई अधिशेष नहीं” दावे को कमजोर कर सकती हैं अगर सावधानी न बरती जाए।हरियाणा अंतिमकरण चाहता है ताकि SYL और हिस्से सुरक्षित हों।अधिकरण का अंतिम रिपोर्ट (अगर कभी आए) सुप्रीम कोर्ट में अपील योग्य है 19 मार्च 2026 तक रावी-ब्यास अधिकरण सक्रिय लेकिन ठप है — अगस्त 2026 तक विस्तारित, 39+ साल बाद भी कोई अंतिम पुरस्कार नहीं, विरोध, राजनीतिक बयानबाजी और बदलती जलवायु वास्तविकताओं के बीच। यह भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों को न्यायिक तरीके से सुलझाने की चुनौतियों का जीता-जागता उदाहरण है।
यह मामला सिर्फ पानी का नहीं, राजनीति का भी है।
आप (AAP) की पंजाब सरकार ने 66 साल पुरानी बात को उठाकर BJP शासित राजस्थान पर दबाव बनाया है। भगवंत मान कहते हैं कि कांग्रेस और अकाली दल की पिछली सरकारों ने कभी यह मुद्दा नहीं उठाया — हर 25 साल में समीक्षा का प्रावधान था, लेकिन कोई नहीं बोला। अब AAP इसे पंजाब के किसानों के हक के रूप में पेश कर रही है। पंजाब में भूजल स्तर गिर रहा है, किसान संकट में हैं — ऐसे में “राजस्थान को मुफ्त पानी” का नारा वोट बैंक को मजबूत करता है।
दूसरी ओर, राजस्थान (BJP) अभी चुप है, लेकिन अगर पानी रोका गया तो श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ के किसान बर्बाद हो जाएंगे। केंद्र (BJP सरकार) बीच में फंस जाएगा। यह AAP vs BJP की सियासत है — पंजाब अपना riparian हक दोहरा रहा है, जबकि राजस्थान 1920 के समझौते को “पुराना” बताकर बचने की कोशिश करेगा। 1981 का समझौता पंजाब विधानसभा में कभी पास नहीं हुआ, इसलिए AAP उसे चुनौती दे रही है। कुल मिलाकर, उत्तर भारत की पानी की राजनीति फिर से गरमा गई है — SYL कैनाल, रावी-ब्यास ट्रिब्यूनल और अब यह नया मोर्चा।
अधिवक्ता पूनम आर्या

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