
यूपी में टीईटी अनिवार्यता के खिलाफ शिक्षकों का उग्र आंदोलन, जिलों में निकाले जाएंगे मशाल जुलूस
उत्तर प्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को अनिवार्य किए जाने के विरोध में प्राथमिक शिक्षकों का आंदोलन अब तेज होता दिखाई दे रहा है। लंबे समय से इस मुद्दे पर अपनी मांग उठा रहे शिक्षक संगठन अब सड़क पर उतरकर सरकार के फैसले के खिलाफ आवाज बुलंद करने की तैयारी में हैं। इसी कड़ी में यूनाइटेड टीचर्स एसोसिएशन (यूटा) ने राज्य भर में चरणबद्ध आंदोलन की घोषणा की है। संगठन ने तय किया है कि सात मार्च से लेकर 15 मार्च तक अलग-अलग जिलों में मशाल जुलूस निकालकर सरकार के फैसले का विरोध किया जाएगा।

शिक्षक संगठनों का कहना है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) लागू होने से पहले जिन शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी, उन्हें टीईटी की अनिवार्यता से छूट मिलनी चाहिए। उनका तर्क है कि उस समय नियुक्ति प्रक्रिया के नियम अलग थे और अब बाद में लागू किए गए नियमों को उन पर थोपना न्यायसंगत नहीं है। इसी मांग को लेकर शिक्षक संगठन लगातार सरकार से संवाद करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जब उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो उन्होंने आंदोलन का रास्ता अपनाने का निर्णय लिया।
यूटा के प्रदेश अध्यक्ष राजेंद्र सिंह राठौर ने बताया कि सात मार्च की शाम 5:30 बजे से इस आंदोलन की शुरुआत की जाएगी। पहले चरण में बरेली सहित पांच जिलों में मशाल जुलूस निकालकर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा। इसके बाद अन्य जिलों में भी इसी प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। संगठन का कहना है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।
शिक्षकों का मानना है कि उन्होंने वर्षों तक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए अपनी सेवाएं दी हैं और अब उन पर नई शर्तें लागू करना उनके साथ अन्याय है। उनका कहना है कि आरटीई लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को उस समय की चयन प्रक्रिया के आधार पर नियुक्त किया गया था। ऐसे में उनसे टीईटी पास करने की शर्त लागू करना उनकी नौकरी की स्थिरता पर सवाल खड़ा करता है।
शिक्षक संगठनों का यह भी कहना है कि कई शिक्षकों की उम्र अब अधिक हो चुकी है और उनके लिए फिर से परीक्षा की तैयारी करना आसान नहीं है। इसके अलावा ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों को संसाधनों की कमी के कारण अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में टीईटी अनिवार्यता को लागू करना उनके लिए मानसिक और पेशेवर दोनों तरह से चुनौती बन गया है।
आंदोलन के तहत मशाल जुलूस के माध्यम से शिक्षक सरकार का ध्यान अपनी मांगों की ओर आकर्षित करना चाहते हैं। शाम के समय निकाले जाने वाले इन जुलूसों में बड़ी संख्या में शिक्षक भाग लेने की तैयारी कर रहे हैं। संगठन का दावा है कि प्रदेश के कई जिलों में शिक्षक इस आंदोलन से जुड़ने के लिए तैयार हैं और आने वाले दिनों में यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।
दूसरी ओर, इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर भी उठाने की तैयारी की जा रही है। सात मार्च को दिल्ली में टीचर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (टीएफआई) के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में आगे की रणनीति पर चर्चा की जाएगी और दिल्ली में एक बड़ी रैली आयोजित करने की तारीख भी तय की जा सकती है। माना जा रहा है कि यदि यह रैली होती है तो इसमें देश के कई राज्यों के शिक्षक संगठन हिस्सा ले सकते हैं।
शिक्षक नेताओं का कहना है कि उनका आंदोलन किसी टकराव की भावना से नहीं बल्कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए है। वे चाहते हैं कि सरकार उनकी समस्याओं को समझे और एक ऐसा समाधान निकाले जिससे शिक्षकों की नौकरी सुरक्षित रहे और शिक्षा व्यवस्था भी प्रभावित न हो।
राज्य सरकार की ओर से अभी तक इस मुद्दे पर कोई नया बयान सामने नहीं आया है, लेकिन शिक्षा विभाग के सूत्रों का कहना है कि सरकार इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है। यदि आंदोलन तेज होता है तो सरकार और शिक्षक संगठनों के बीच बातचीत की संभावना भी बन सकती है।
फिलहाल प्रदेश के शिक्षक संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। आने वाले दिनों में मशाल जुलूस, बैठकें और संभावित रैलियां इस आंदोलन को और तेज कर सकती हैं। इससे यह साफ है कि टीईटी अनिवार्यता का मुद्दा आने वाले समय में प्रदेश की शिक्षा और राजनीति दोनों में महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन सकता है।



