
बिजली चोरी मामले में कंपनी को राहत नहीं, अदालत ने याचिका की खारिज
गुरुग्राम जिले में बिजली चोरी से जुड़े एक मामले में जिला अदालत ने कंपनी की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया है। कंपनी ने बिजली निगम द्वारा लगाए गए भारी जुर्माने को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद साफ कर दिया कि यह मामला सिविल अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। इसके साथ ही अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।

यह फैसला सिविल जज (जूनियर डिवीजन) निधि बेनीवाल की अदालत ने सुनाया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि बिजली चोरी से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए अलग प्रावधान और विशेष मंच बनाए गए हैं। ऐसे में इस प्रकार के मामलों की सुनवाई सिविल अदालत में नहीं की जा सकती।
दरअसल, यह मामला मानेसर क्षेत्र की एक कंपनी से जुड़ा हुआ है। बिजली निगम की टीम ने 9 जुलाई 2021 को मानेसर स्थित कंपनी परिसर में अचानक जांच की थी। जांच के दौरान अधिकारियों ने कंपनी में लगे दो अलग-अलग बिजली मीटरों की स्थिति का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान टीम को संदेह हुआ कि मीटर के साथ छेड़छाड़ की गई है।
जब अधिकारियों ने तकनीकी जांच की तो पाया गया कि दोनों बिजली मीटरों के तारों के साथ छेड़छाड़ की गई थी। इस छेड़छाड़ की वजह से बिजली की खपत सही तरीके से दर्ज नहीं हो रही थी और कंपनी को वास्तविक खपत से कम बिजली बिल देना पड़ रहा था। निगम के अधिकारियों के मुताबिक यह बिजली चोरी का स्पष्ट मामला था।
जांच के दौरान यह भी पाया गया कि मीटर की वायरिंग में बदलाव करके बिजली की आपूर्ति को इस तरह से मोड़ा गया था कि मीटर पूरी खपत को रिकॉर्ड नहीं कर पा रहा था। इससे बिजली निगम को आर्थिक नुकसान हो रहा था। जांच पूरी होने के बाद अधिकारियों ने मौके पर ही इसकी रिपोर्ट तैयार की और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर कंपनी के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी।
बिजली निगम ने नियमों के अनुसार कंपनी पर कुल 13 लाख 30 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। यह जुर्माना बिजली चोरी और मीटर से छेड़छाड़ के आधार पर निर्धारित किया गया था। निगम के अधिकारियों का कहना था कि जांच के दौरान मिले सबूतों के आधार पर ही यह कार्रवाई की गई है।
हालांकि कंपनी की ओर से इस कार्रवाई का विरोध किया गया। कंपनी की तरफ से मानेसर के नवादा गांव निवासी सतीश ने अदालत में याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि कंपनी ने किसी भी तरह की बिजली चोरी नहीं की है और बिजली निगम ने गलत तरीके से जुर्माना लगाया है।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि जांच प्रक्रिया सही तरीके से नहीं की गई और कंपनी को बिना पर्याप्त आधार के दोषी ठहरा दिया गया। उनका कहना था कि कंपनी के मीटर और बिजली कनेक्शन में किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की गई थी। इसलिए लगाया गया जुर्माना अनुचित है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर बिजली निगम की तरफ से अदालत में कहा गया कि जांच पूरी तरह नियमों के तहत की गई थी। निगम के अधिकारियों ने अदालत को बताया कि जांच के दौरान मीटर की तारों के साथ छेड़छाड़ साफ तौर पर पाई गई थी और इसके पुख्ता सबूत भी मौजूद हैं।
निगम की ओर से यह भी कहा गया कि बिजली चोरी के मामलों में कार्रवाई करने के लिए कानून में स्पष्ट प्रावधान हैं और उसी के तहत कंपनी पर जुर्माना लगाया गया है। निगम के वकील ने अदालत को बताया कि यह कार्रवाई किसी व्यक्तिगत आधार पर नहीं बल्कि तकनीकी जांच और नियमों के आधार पर की गई है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने इस मामले पर विस्तार से विचार किया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि बिजली चोरी से जुड़े मामलों के लिए विशेष कानूनी प्रक्रिया तय की गई है। ऐसे मामलों में सिविल अदालत का सीधा हस्तक्षेप सीमित होता है।
अदालत ने अपने फैसले में हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी हवाला दिया। अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि बिजली चोरी या उससे जुड़े विवादों को सिविल अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके लिए अलग से निर्धारित मंच और प्रक्रिया मौजूद है।
इसी आधार पर अदालत ने यह माना कि इस मामले की सुनवाई सिविल अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती। इसलिए कंपनी की ओर से दायर याचिका को स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि याचिका कानूनन सुनवाई योग्य नहीं है।
इसके साथ ही अदालत ने कंपनी की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत के इस फैसले के बाद बिजली निगम द्वारा लगाया गया जुर्माना यथावत बना रहेगा।
इस फैसले को बिजली चोरी के मामलों में एक अहम उदाहरण के तौर पर भी देखा जा रहा है। बिजली निगम के अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के मामलों में सख्त कार्रवाई जरूरी है ताकि बिजली चोरी पर लगाम लगाई जा सके।
बिजली चोरी के कारण न केवल बिजली निगम को आर्थिक नुकसान होता है बल्कि इसका असर आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ता है। जब बड़ी मात्रा में बिजली चोरी होती है तो उसका बोझ अंततः ईमानदारी से बिल भरने वाले उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
इसी वजह से बिजली निगम समय-समय पर औद्योगिक इकाइयों, फैक्ट्रियों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में जांच अभियान चलाता है। इन अभियानों का उद्देश्य बिजली चोरी को रोकना और नियमों का पालन सुनिश्चित करना होता है।
बिजली विभाग के अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में भी इस तरह की जांच जारी रहेगी और यदि कहीं भी बिजली चोरी या मीटर से छेड़छाड़ पाई जाती है तो संबंधित व्यक्ति या संस्था के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल अदालत के इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि बिजली चोरी के मामलों में सीधे सिविल अदालत में राहत मिलना आसान नहीं है। ऐसे मामलों में कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना ही जरूरी होता

