
दिल्ली में प्रदूषण नियमों की अनदेखी—सरकारी गाड़ियां बिना पीयूसी सड़कों पर, एनजीटी ने जताई चिंता
देश की राजधानी दिल्ली में प्रदूषण को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही उजागर हुई है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, कई सरकारी वाहन बिना वैध प्रदूषण जांच प्रमाणपत्र (पीयूसी) के सड़कों पर दौड़ रहे हैं। यह मामला तब सामने आया जब इसे राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष पेश किया गया। इस खुलासे ने न केवल सरकारी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि राजधानी में बढ़ते प्रदूषण संकट को भी गंभीरता से सामने ला दिया है।

नियमों की अनदेखी का मामला
दिल्ली परिवहन विभाग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में बताया गया है कि कई सरकारी वाहनों के पास पीयूसी प्रमाणपत्र नहीं है। केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के तहत हर वाहन के लिए यह प्रमाणपत्र अनिवार्य होता है, लेकिन इसके बावजूद सरकारी स्तर पर ही नियमों की अनदेखी की जा रही है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जब नवंबर 2024 में इस मुद्दे को लेकर याचिका दायर की गई थी, तब बड़ी संख्या में सरकारी वाहन बिना पीयूसी के संचालित हो रहे थे। हालांकि इसके बाद कुछ विभागों ने प्रमाणपत्र बनवाने की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन अब भी कई वाहन नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं।
60 वाहनों पर कार्रवाई
इस मामले में कार्रवाई करते हुए अब तक 60 सरकारी वाहनों के चालान काटे जा चुके हैं। यह दर्शाता है कि नियमों का उल्लंघन व्यापक स्तर पर हो रहा है। चालान के बावजूद यदि स्थिति में सुधार नहीं आता, तो यह प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी वाहन ही नियमों का पालन नहीं करेंगे, तो आम जनता पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और लोग भी नियमों को गंभीरता से नहीं लेते।
पुराने वाहन बने चिंता का कारण
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई पुराने वाहन अब भी सड़कों पर चल रहे हैं। इनमें बीएस-3 और बीएस-4 श्रेणी के वाहन शामिल हैं, जो अधिक प्रदूषण फैलाते हैं। कुछ वाहनों को कंडेम्न घोषित कर उनका पंजीकरण रद्द कर दिया गया है या उन्हें स्क्रैप किया जा चुका है, लेकिन कई वाहन अभी भी उपयोग में हैं।
पुराने वाहनों से निकलने वाला धुआं वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। पहले से ही प्रदूषण से जूझ रही दिल्ली के लिए यह स्थिति और अधिक चिंताजनक बन जाती है।
प्रशासन ने जारी किए सख्त निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) ने 7 अप्रैल 2026 को सख्त आदेश जारी किए हैं। इन आदेशों में स्पष्ट कहा गया है कि बिना वैध पीयूसी प्रमाणपत्र वाले वाहनों का उपयोग किसी भी सरकारी कार्य में नहीं किया जाएगा।
यह निर्देश सभी विभागों, बोर्ड, निगम और सरकारी संस्थानों पर लागू होंगे। साथ ही, किराए पर लिए गए और आउटसोर्स वाहनों को भी इस दायरे में शामिल किया गया है।
तय की गई समयसीमा
सरकार ने सभी विभागों को अपने वाहनों का पीयूसी प्रमाणपत्र नवीनीकरण कराने के लिए 10 अप्रैल 2026 तक का समय दिया था। इसके साथ ही, इस कार्य की जिम्मेदारी संबंधित विभागाध्यक्षों को सौंपी गई है, ताकि किसी भी स्तर पर लापरवाही न हो।
यह कदम प्रशासन की ओर से एक स्पष्ट संकेत है कि अब नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
याचिकाकर्ता की अहम भूमिका
इस पूरे मामले को उजागर करने में याचिकाकर्ता जितेंद्र महाजन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने इस मुद्दे को उठाते हुए 106 सरकारी वाहनों की सूची भी प्रस्तुत की। इन वाहनों में कई ऐसे हैं जो 10 से 15 साल पुराने हैं और अब भी सड़कों पर चल रहे हैं।
इस खुलासे ने यह साफ कर दिया है कि सरकारी विभागों में निगरानी और जवाबदेही की कमी है।
प्रदूषण नियंत्रण पर बड़ा सवाल
दिल्ली में पहले से ही वायु प्रदूषण एक बड़ी समस्या है। ऐसे में जब सरकारी वाहन ही प्रदूषण नियंत्रण नियमों का पालन नहीं करते, तो यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।
यह मामला केवल नियमों के उल्लंघन का नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। प्रदूषण के कारण सांस संबंधी बीमारियां, एलर्जी और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।
आगे क्या हो सकता है
अब इस मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण की भूमिका अहम हो जाती है। एनजीटी इस मामले की सुनवाई कर रहा है और संभावना है कि वह संबंधित विभागों को सख्त निर्देश जारी करेगा।
यदि भविष्य में भी नियमों का पालन नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है।
निष्कर्ष
दिल्ली में सरकारी वाहनों द्वारा बिना पीयूसी के संचालन का यह मामला प्रशासनिक लापरवाही का एक बड़ा उदाहरण है। यह घटना यह दर्शाती है कि केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका सख्ती से पालन कराना भी उतना ही जरूरी है।
अब समय आ गया है कि सरकार और संबंधित विभाग इस मुद्दे को गंभीरता से लें और यह सुनिश्चित करें कि सभी वाहन, चाहे वे सरकारी हों या निजी, नियमों का पालन करें।
यदि इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो राजधानी में प्रदूषण की स्थिति और बिगड़ सकती है, जिसका सीधा असर आम जनता के स्वास्थ्य पर पड़ेगा।



