
दिल्ली के सरकारी स्कूलों में किताबों का संकट: 10 लाख छात्र बिना पाठ्यपुस्तकों के, हाईकोर्ट ने दिखाई सख्ती
राजधानी दिल्ली में सरकारी स्कूलों की स्थिति एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुए एक महीना बीत चुका है, लेकिन अब भी लाखों छात्रों को उनकी किताबें नहीं मिल सकी हैं। इस लापरवाही पर Delhi High Court ने सख्त रुख अपनाते हुए शिक्षा विभाग के सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया है।

शिक्षा के अधिकार पर सीधा असर
करीब 10 लाख छात्र इस समस्या से प्रभावित बताए जा रहे हैं। ये छात्र कक्षा 1 से 8 तक के हैं, जिनकी पढ़ाई की बुनियाद इन्हीं वर्षों में तैयार होती है। ऐसे में किताबों की अनुपलब्धता न केवल पढ़ाई में बाधा बन रही है, बल्कि बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती कक्षाओं में पढ़ाई का निरंतर होना बेहद जरूरी है। अगर इस स्तर पर व्यवधान आता है, तो इसका असर बच्चों के आत्मविश्वास और आगे की पढ़ाई पर भी पड़ सकता है।
हाईकोर्ट की नाराजगी
इस मामले की सुनवाई Sachin Datta की एकलपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और इसे किसी भी हालत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने पाया कि पहले दिए गए निर्देशों और विभाग के आश्वासनों के बावजूद छात्रों तक किताबें नहीं पहुंचाई गईं। इसे गंभीर मानते हुए अदालत ने शिक्षा सचिव को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
याचिका से सामने आया मामला
यह मुद्दा Social Jurist द्वारा दायर अवमानना याचिका के जरिए सामने आया। याचिका में कहा गया कि सरकार ने अदालत को जो वादे किए थे, उनका पालन नहीं किया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि अदालत के आदेशों की अवहेलना है। उन्होंने कहा कि इस लापरवाही का खामियाजा सीधे बच्चों को भुगतना पड़ रहा है।
सरकार का आश्वासन
सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से पेश वकील ने अदालत को भरोसा दिलाया कि किताबों का वितरण जल्द पूरा कर लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि ग्रीष्मकालीन अवकाश शुरू होने से पहले सभी छात्रों को किताबें मिल जाएंगी।
अदालत ने इस बयान को गंभीरता से लेते हुए इसे बाध्यकारी माना और संबंधित अधिकारियों को स्थिति रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया।
पहले भी दिए जा चुके हैं निर्देश
यह पहला मौका नहीं है जब Delhi High Court ने इस मुद्दे पर हस्तक्षेप किया हो। इससे पहले भी अदालत ने शिक्षा विभाग को समय पर किताबें और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे।
8 अप्रैल 2024 को अदालत ने शिक्षा सचिव के उस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि सभी छात्रों को समय पर किताबें और अन्य सामग्री दी जाएगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि फंड की कोई कमी नहीं है।
इसके बाद 4 जुलाई 2024 को दिए गए आदेश में भी शिक्षा निदेशालय को सभी दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए कहा गया था, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हुआ।
टेंडर प्रक्रिया के बावजूद देरी
सरकार की ओर से यह भी कहा गया था कि किताबों की आपूर्ति के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली गई है और वितरण शुरू हो चुका है। 22 अप्रैल 2024 और 9 मई 2024 की रिपोर्ट में भी यही दावा किया गया था।
इसके बावजूद जमीनी स्तर पर छात्रों तक किताबें नहीं पहुंच पाईं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
मौजूदा हालात और चिंता
इस समय स्थिति यह है कि स्कूलों में पढ़ाई तो शुरू हो चुकी है, लेकिन किताबों के बिना छात्रों को पढ़ाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। शिक्षक भी बिना पाठ्यसामग्री के प्रभावी तरीके से पढ़ाने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं।
9 मई से ग्रीष्मकालीन अवकाश शुरू होने वाला है, जिसके बाद स्कूल जुलाई में खुलेंगे। ऐसे में यदि किताबें समय पर नहीं मिलीं, तो छात्र लंबे समय तक पढ़ाई से दूर रह सकते हैं।
बुनियादी शिक्षा पर खतरा
कक्षा 1 से 8 तक की शिक्षा को बुनियादी शिक्षा माना जाता है। इसी दौरान बच्चों में पढ़ने-लिखने और गणित की समझ विकसित होती है।
यदि इस स्तर पर पढ़ाई प्रभावित होती है, तो इसका असर लंबे समय तक रहता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ इस मुद्दे को बेहद गंभीर मान रहे हैं।
जवाबदेही तय करने की जरूरत
इस पूरे मामले ने प्रशासनिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जब अदालत के आदेश और विभाग के अपने वादे भी पूरे नहीं हो पा रहे हैं, तो यह व्यवस्था की कमजोरी को दर्शाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही न हो।
आगे क्या होगा?
अब सभी की नजर अगली सुनवाई पर है। यदि सरकार समय पर किताबें उपलब्ध नहीं करा पाती, तो अदालत और सख्त कदम उठा सकती है।
स्थिति रिपोर्ट के आधार पर यह तय होगा कि आगे क्या कार्रवाई की जाएगी और छात्रों को कब तक राहत मिलेगी।
निष्कर्ष
दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 10 लाख छात्रों को किताबें न मिलना एक गंभीर समस्या है, जो शिक्षा व्यवस्था की खामियों को उजागर करती है। Delhi High Court का हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है।
अब जरूरत है कि सरकार और शिक्षा विभाग इस समस्या का तुरंत समाधान करें और यह सुनिश्चित करें कि हर छात्र को समय पर उसकी किताबें मिलें। क्योंकि शिक्षा में देरी का मतलब है बच्चों के भविष्य से समझौता।



