
जंग, तेल और महंगाई का दबाव—अमेरिकी शेयर बाजार में उथल-पुथल, निवेशकों की बढ़ी बेचैनी
वैश्विक स्तर पर बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता ने वित्तीय बाजारों की स्थिरता को एक बार फिर चुनौती दी है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी का सीधा असर दुनिया के सबसे बड़े शेयर बाजार—अमेरिका—पर देखने को मिल रहा है। हालिया कारोबारी सत्र में अमेरिकी बाजारों ने मिश्रित प्रदर्शन किया, जिससे यह साफ हो गया कि निवेशकों के बीच भरोसे की कमी और भविष्य को लेकर आशंका गहराती जा रही है

सोमवार को अमेरिकी शेयर बाजार में दिनभर उतार-चढ़ाव का माहौल बना रहा। प्रमुख सूचकांक S&P 500 0.4 प्रतिशत गिरकर बंद हुआ, जबकि Dow Jones Industrial Average मामूली बढ़त के साथ ऊपर रहा। वहीं टेक्नोलॉजी कंपनियों से जुड़ा Nasdaq Composite 0.7 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुआ। यह प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि बाजार फिलहाल किसी स्पष्ट दिशा में नहीं है और हर नई खबर के साथ रुख बदल रहा है।
दिलचस्प बात यह रही कि दिन की शुरुआत सकारात्मक संकेतों के साथ हुई थी। शुरुआती कारोबार में S&P 500 करीब 0.9 प्रतिशत तक चढ़ गया था, लेकिन जैसे-जैसे तेल की कीमतों में तेजी और ईरान से जुड़े घटनाक्रम सामने आए, बाजार की यह तेजी टिक नहीं पाई। निवेशकों ने तेजी से मुनाफावसूली शुरू कर दी और सूचकांक गिरावट में चला गया।
तेल की कीमतों में उछाल इस पूरे परिदृश्य का केंद्र बना हुआ है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है, जिससे कच्चे तेल के दाम ऊपर जा रहे हैं। इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे आर्थिक ढांचे को प्रभावित करता है। जब तेल महंगा होता है, तो परिवहन, उत्पादन और अन्य सेवाओं की लागत बढ़ जाती है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा होता है।
इसी चिंता ने निवेशकों को सबसे ज्यादा परेशान किया है। बाजार में अब यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या महंगाई फिर से नियंत्रण से बाहर हो सकती है। यदि ऐसा होता है, तो अमेरिकी केंद्रीय बैंक Federal Reserve को फिर से सख्त रुख अपनाना पड़ सकता है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी महंगाई को तो काबू में ला सकती है, लेकिन इससे आर्थिक गतिविधियां धीमी हो जाती हैं और शेयर बाजार पर नकारात्मक असर पड़ता है।
राजनीतिक स्तर पर भी स्थिति कम तनावपूर्ण नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने हाल ही में बयान देते हुए कहा कि ईरान के साथ चल रहे सैन्य अभियान को समाप्त करने के लिए प्रगति हो रही है। हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि जल्द कोई समझौता नहीं हुआ, तो अमेरिका सख्त कदम उठा सकता है। ऐसे बयानों से बाजार में अस्थिरता और बढ़ जाती है, क्योंकि निवेशक किसी भी अप्रत्याशित घटना से बचना चाहते हैं।
पिछले कुछ हफ्तों का बाजार रुझान भी इसी अनिश्चितता को दर्शाता है। S&P 500 अपने रिकॉर्ड स्तर से लगभग 9 प्रतिशत नीचे आ चुका है, जबकि डाउ जोंस और नैस्डैक दोनों ही अपने उच्चतम स्तर से 10 प्रतिशत से ज्यादा गिर चुके हैं। इस स्थिति को बाजार विशेषज्ञ “करेक्शन” कह रहे हैं, जो आमतौर पर तब होता है जब बाजार में लंबे समय तक तेजी के बाद कुछ गिरावट आती है।
हालांकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह गिरावट स्थायी नहीं हो सकती। यदि अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहती है और महंगाई नियंत्रण में रहती है, तो बाजार फिर से उभर सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि तेल की कीमतों में स्थिरता आए और वैश्विक तनाव कम हो।
बॉन्ड बाजार में भी निवेशकों के रुख में बदलाव देखा गया है। सुरक्षित निवेश की तलाश में लोग बॉन्ड की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड घटकर 4.35 प्रतिशत के आसपास आ गई है। यह संकेत है कि निवेशक फिलहाल जोखिम लेने से बच रहे हैं और सुरक्षित विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
कॉरपोरेट सेक्टर में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। Sysco Corporation द्वारा Jetro Restaurant Depot के अधिग्रहण की घोषणा के बाद उसके शेयरों में भारी गिरावट आई। दूसरी ओर Alcoa के शेयरों में तेजी देखी गई, क्योंकि वैश्विक आपूर्ति बाधित होने से कंपनी को फायदा होने की उम्मीद है।
अंतरराष्ट्रीय बाजारों की बात करें तो यूरोप में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही। FTSE 100 और CAC 40 जैसे सूचकांकों में बढ़त दर्ज की गई। इसके विपरीत एशियाई बाजारों में कमजोरी देखने को मिली। Kospi, Nikkei 225 और Hang Seng Index सभी गिरावट के साथ बंद हुए।
कुल मिलाकर, मौजूदा समय में अमेरिकी शेयर बाजार कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। एक ओर बढ़ती तेल कीमतें हैं, दूसरी ओर भू-राजनीतिक तनाव और तीसरी ओर महंगाई को लेकर अनिश्चितता। इन सभी कारकों ने निवेशकों के मन में असमंजस पैदा कर दिया है।
आने वाले समय में बाजार की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि वैश्विक हालात कैसे बदलते हैं। यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है और तेल की कीमतों में स्थिरता आती है, तो बाजार को राहत मिल सकती है। वहीं, अगर महंगाई पर काबू नहीं पाया गया और ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो बाजार में और गिरावट देखने को मिल सकती है।
फिलहाल निवेशक सतर्क हैं और हर नए घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। बाजार में यह दौर अनिश्चितता का है, जहां हर फैसला सोच-समझकर लेना जरूरी हो गया है।
