
गुमशुदगी के आंकड़ों से आगे की सच्चाई
दिल्ली में लापता लोगों के मामलों को लेकर अक्सर चिंता जताई जाती है, लेकिन पुलिस का कहना है कि सिर्फ कुल संख्या देखकर हालात का सही आकलन नहीं किया जा सकता। हाल में जारी आंकड़ों के मुताबिक, बीते वर्ष राजधानी में दर्ज गुमशुदगी के मामलों में करीब 2 प्रतिशत की कमी आई है। नए साल की शुरुआत में भी यही रुझान देखने को मिला है, जिससे संकेत मिलता है कि स्थिति स्थिर बनी हुई है।

पुलिस के अनुसार, पिछले दस वर्षों के रिकॉर्ड पर नजर डालें तो लगभग 77 प्रतिशत लापता लोगों का पता लगा लिया गया है। यानी अधिकांश मामलों में लोग सुरक्षित अपने घर लौट आते हैं। दिल्ली में प्रति एक लाख आबादी पर 122.5 गुमशुदगी के मामले दर्ज होते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटेन और अमेरिका की तुलना में कम बताए गए हैं। पुलिस का दावा है कि इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि राजधानी की स्थिति उतनी चिंताजनक नहीं है, जितनी कई बार प्रस्तुत की जाती है।
जनवरी माह के आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष के पहले महीने में 1,777 गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज हुईं। यह संख्या वर्ष 2025 के मासिक औसत 2,042 से कम है और जनवरी 2024 में दर्ज 1,786 मामलों से भी थोड़ी कम है। पुलिस का कहना है कि इनमें से कई मामलों में व्यक्ति कुछ ही घंटों में मिल जाते हैं। लेकिन कई बार परिवार द्वारा सूचना अपडेट नहीं किए जाने के कारण वे रिकॉर्ड में बने रहते हैं, जिससे कुल आंकड़ा अधिक दिखाई देता है।
दिल्ली पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया है कि अब शिकायत दर्ज कराना पहले से कहीं आसान हो गया है। मोबाइल ऐप और ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से तुरंत गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की जा सकती है। इसका उद्देश्य त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करना है। हालांकि, इस व्यवस्था के चलते छोटी-छोटी बातों पर भी एहतियातन शिकायत दर्ज हो जाती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई बच्चा स्कूल से देर से लौटे या मोबाइल नेटवर्क की समस्या के कारण संपर्क न हो पाए, तो परिवार तुरंत रिपोर्ट दर्ज करा देता है। ऐसे मामलों को भी आधिकारिक आंकड़ों में शामिल किया जाता है।
पिछले वर्ष कुल 24,508 गुमशुदगी के मामले दर्ज हुए थे। इनमें से 15,421 लोगों को उसी वर्ष खोज लिया गया। पुलिस का कहना है कि बाकी मामलों में भी तलाश जारी रहती है और समय-समय पर सफलता मिलती है। अधिकारियों के अनुसार, केवल एक साल के भीतर सुलझे मामलों को देखकर ही निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि कई मामलों में जांच लंबी चलती है।
सोशल मीडिया पर लापता लड़कियों की बढ़ती संख्या को लेकर फैल रही खबरों पर भी पुलिस ने प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि कई बार भ्रामक या अधूरी जानकारी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, जिससे लोगों में अनावश्यक भय पैदा होता है। पुलिस ने चेतावनी दी है कि गलत सूचना फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली जैसे बड़े महानगर में आबादी का आकार, रोज़गार और शिक्षा के लिए आने-जाने वाले लोगों की संख्या, और अस्थायी रूप से संपर्क टूट जाने की घटनाएं—ये सभी कारक गुमशुदगी के आंकड़ों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में केवल संख्या को देखकर अपराध दर या सुरक्षा स्थिति का आकलन करना भ्रामक हो सकता है।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि तकनीक के उपयोग से लापता व्यक्तियों की तलाश को अधिक प्रभावी बनाया गया है। सीसीटीवी नेटवर्क, डिजिटल ट्रैकिंग और समन्वित टीमवर्क के जरिए खोज अभियान को तेज किया जाता है।
अंततः, गुमशुदगी का हर मामला संवेदनशील होता है और उससे जुड़ा परिवार गहरी चिंता से गुजरता है। इसलिए जरूरी है कि आंकड़ों को संतुलित नजरिए से देखा जाए—न तो अनावश्यक भय फैलाया जाए और न ही समस्या को हल्के में लिया जाए। सही जानकारी और पारदर्शिता ही इस मुद्दे को समझने का सबसे बेहतर तरीका है।



