
कचरे से ईंधन, ईंधन से भविष्य: आईआईटी दिल्ली का अनोखा प्रयोग बना देश के लिए मिसाल
भारत में ऊर्जा की बढ़ती मांग और पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता लंबे समय से चिंता का विषय रही है। ऐसे समय में राजधानी स्थित आईआईटी दिल्ली ने एक ऐसा प्रयोग किया है, जो देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है। यहां वैज्ञानिकों ने घरेलू और हॉस्टल के कचरे से बायोगैस तैयार कर उसे कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) में बदलकर गाड़ी चलाने में सफलता हासिल की है।

यह पहल केवल एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं, बल्कि एक सोच का बदलाव है। जहां आमतौर पर कचरे को बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, वहीं आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिकों ने उसे ऊर्जा का स्रोत बना दिया है। यह मॉडल आने वाले समय में शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।
इस परियोजना के तहत संस्थान में रोजाना करीब 250 किलोग्राम जैविक कचरा इकट्ठा किया जाता है। इसमें रसोई का बचा हुआ खाना, सब्जियों के छिलके और अन्य जैविक अपशिष्ट शामिल होते हैं। इस कचरे को एक विशेष प्लांट में डालकर बायोगैस बनाई जाती है। इसके बाद इस गैस को शुद्ध करके कंप्रेस्ड बायोगैस यानी सीबीजी में बदला जाता है।
इस प्रक्रिया से रोजाना लगभग 25 क्यूबिक मीटर बायोगैस तैयार होती है, जिसे शुद्ध करने के बाद करीब 8 किलोग्राम सीबीजी प्राप्त होती है। यही सीबीजी गाड़ियों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल की जा रही है। इस गैस की गुणवत्ता इतनी अच्छी है कि यह प्राकृतिक गैस के बराबर मानी जाती है।
आईआईटी दिल्ली में इस तकनीक का परीक्षण पिछले कई वर्षों से किया जा रहा है। वर्ष 2011 में एक वाहन पर इस प्रयोग की शुरुआत की गई थी। तब से लेकर अब तक यह गाड़ी करीब डेढ़ लाख किलोमीटर तक चल चुकी है। इस दौरान इसकी औसत माइलेज करीब 21 किलोमीटर प्रति किलोग्राम सीबीजी दर्ज की गई है, जो इसे व्यावहारिक रूप से उपयोगी बनाती है।
गाड़ी में एक मजबूत सिलेंडर लगाया गया है, जिसमें उच्च दबाव पर सीबीजी भरी जाती है। यह सिलेंडर पूरी तरह सुरक्षित है और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार तैयार किया गया है। इससे यह साबित होता है कि सीबीजी का उपयोग बड़े स्तर पर भी सुरक्षित तरीके से किया जा सकता है।
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा पर्यावरण को होता है। सीबीजी से चलने वाले वाहनों में हानिकारक गैसों का उत्सर्जन काफी कम होता है। इससे वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। आज जब देश के बड़े शहर प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं, ऐसे में यह तकनीक एक बड़ा समाधान बन सकती है।
इसके अलावा, यह पहल कचरा प्रबंधन की समस्या को भी हल करने में मदद करती है। शहरों में हर दिन बड़ी मात्रा में कचरा निकलता है, जिसे संभालना एक बड़ी चुनौती है। यदि इसी कचरे का उपयोग बायोगैस बनाने में किया जाए, तो यह समस्या भी काफी हद तक कम हो सकती है।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बायोगैस की अपार संभावनाएं हैं। गांवों में गोबर, कृषि अवशेष और अन्य जैविक पदार्थ आसानी से उपलब्ध होते हैं। यदि इनका सही तरीके से उपयोग किया जाए, तो ग्रामीण क्षेत्रों में भी ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है। इससे किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत भी मिल सकता है।
सरकार ने भी इस दिशा में कदम उठाए हैं। वर्ष 2018 की बायोफ्यूल नीति के तहत देश में हजारों सीबीजी प्लांट लगाने की योजना बनाई गई थी। हालांकि, अभी तक इस दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई है। यदि इस योजना को तेजी से लागू किया जाए, तो देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत में करोड़ों बायोगैस संयंत्र स्थापित करने की क्षमता है। अभी तक लाखों संयंत्र लगाए जा चुके हैं, लेकिन अभी भी काफी संभावनाएं बाकी हैं। खासकर शहरी क्षेत्रों में, जहां कचरे की मात्रा अधिक होती है, वहां इस तकनीक को अपनाना बेहद फायदेमंद हो सकता है।
आईआईटी दिल्ली का यह प्रयोग यह साबित करता है कि अगर सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो कचरे जैसी समस्या को भी अवसर में बदला जा सकता है। यह पहल न केवल पर्यावरण के लिए फायदेमंद है, बल्कि आर्थिक रूप से भी देश को मजबूत बना सकती है।
अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि कचरे से ईंधन बनाने की यह तकनीक भविष्य की जरूरत है। यह हमें न केवल स्वच्छ ऊर्जा प्रदान करती है, बल्कि हमें आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी आगे बढ़ाती है। अब जरूरत है कि इस मॉडल को पूरे देश में लागू किया जाए, ताकि भारत ऊर्जा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छू सके।



