
उच्च शिक्षा के बावजूद नौकरी का संकट: पंजाब-हरियाणा के युवाओं के सामने बढ़ती बेरोजगारी की चुनौती
देश में शिक्षा का स्तर लगातार ऊंचा हो रहा है, लेकिन इसके समानांतर रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ पा रहे। इसका सीधा असर पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में साफ तौर पर देखा जा सकता है, जहां पढ़े-लिखे युवाओं के लिए नौकरी पाना अब पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2025 की रिपोर्ट ने इस समस्या को आंकड़ों के जरिए उजागर किया है।

रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब और हरियाणा में स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के युवाओं में बेरोजगारी की दर उल्लेखनीय रूप से अधिक बनी हुई है। पंजाब में जहां ग्रेजुएट युवाओं की बेरोजगारी दर 11.6 प्रतिशत है, वहीं पोस्ट ग्रेजुएट युवाओं में यह 9.4 प्रतिशत दर्ज की गई है। हरियाणा में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है—यहां ग्रेजुएट स्तर पर बेरोजगारी 10.3 प्रतिशत और पोस्ट ग्रेजुएट में 9.6 प्रतिशत है। यह आंकड़े भले ही राष्ट्रीय औसत के आसपास हों, लेकिन यह संकेत देते हैं कि उच्च शिक्षा के बावजूद रोजगार मिलना आसान नहीं है।
सबसे दिलचस्प और चिंताजनक पहलू यह है कि जैसे-जैसे शिक्षा का स्तर बढ़ता है, बेरोजगारी का दबाव भी बढ़ता जाता है। 12वीं पास युवाओं में बेरोजगारी दर 5.5 प्रतिशत है, जबकि डिप्लोमा या सर्टिफिकेट धारकों में यह बढ़कर 6.1 प्रतिशत हो जाती है। इसके बाद जब युवा ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन तक पहुंचते हैं, तो यह दर और भी ऊपर चली जाती है। इसका मतलब यह है कि डिग्री हासिल करने के बाद भी युवाओं को उनकी योग्यता के अनुसार काम नहीं मिल पा रहा।
हरियाणा की कुल बेरोजगारी दर भी राष्ट्रीय औसत से अधिक है। 15 से 59 वर्ष की आयु वर्ग में राज्य की बेरोजगारी दर 4.7 प्रतिशत है, जबकि पूरे देश का औसत 3.4 प्रतिशत है। खासकर 15 से 29 वर्ष के युवाओं के बीच स्थिति अधिक गंभीर है, जहां बेरोजगारी दर 11.8 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत 9.9 प्रतिशत से काफी ज्यादा है और इस आयु वर्ग के युवाओं के लिए रोजगार की कमी को दर्शाता है।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के आंकड़ों में भी रोजगार की असमानता साफ दिखाई देती है। हरियाणा में ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर लगभग 10 प्रतिशत के आसपास है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह बढ़कर 14 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। पंजाब में ग्रामीण युवाओं की बेरोजगारी दर 18.7 प्रतिशत है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 14.5 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अवसरों की कमी है, जबकि शहरों में प्रतिस्पर्धा इतनी अधिक है कि नौकरी पाना आसान नहीं रह गया है।
महिलाओं के संदर्भ में यह स्थिति और भी जटिल हो जाती है। रिपोर्ट बताती है कि उच्च शिक्षित महिलाओं में बेरोजगारी दर पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्नातक महिलाओं की बेरोजगारी दर 13.2 प्रतिशत है, जबकि स्नातकोत्तर महिलाओं में यह 21.1 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। शहरी क्षेत्रों में तो यह आंकड़ा और भी अधिक चिंताजनक है—यहां ग्रेजुएट महिलाओं में बेरोजगारी दर 31.1 प्रतिशत और पोस्ट ग्रेजुएट महिलाओं में 29.3 प्रतिशत दर्ज की गई है।
हालांकि हरियाणा में कुल मिलाकर महिलाओं की बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से कम है, लेकिन जब बात उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाओं की आती है, तो स्थिति उतनी सकारात्मक नहीं दिखती। इसका एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि महिलाओं के लिए सुरक्षित और अनुकूल कार्यस्थलों की कमी, सामाजिक प्रतिबंध और सीमित अवसर अब भी एक बड़ी बाधा बने हुए हैं।
इसके विपरीत, कम शिक्षित या अशिक्षित वर्ग की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई देती है। इन वर्गों में बेरोजगारी दर काफी कम है, क्योंकि ये लोग छोटे-मोटे काम या असंगठित क्षेत्र में आसानी से रोजगार प्राप्त कर लेते हैं। वहीं, उच्च शिक्षित युवा अपने स्तर के अनुरूप नौकरी की तलाश में अधिक समय तक बेरोजगार रह जाते हैं, जिससे उनकी बेरोजगारी दर अधिक दिखती है।
यह स्थिति एक बड़े असंतुलन की ओर इशारा करती है, जहां शिक्षा और रोजगार के बीच तालमेल नहीं बैठ पा रहा है। एक ओर जहां विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से हर साल बड़ी संख्या में डिग्रीधारी युवा निकल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उद्योग, व्यापार और सेवा क्षेत्रों में उतनी तेजी से नौकरियों का सृजन नहीं हो रहा है। इसका नतीजा यह है कि पढ़े-लिखे युवाओं को भी नौकरी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल डिग्री देने से नहीं होगा, बल्कि शिक्षा को रोजगारपरक बनाना जरूरी है। इसके लिए स्किल डेवलपमेंट, व्यावसायिक प्रशिक्षण और उद्योगों के साथ तालमेल बढ़ाने की आवश्यकता है। साथ ही, सरकार को भी ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जो रोजगार के नए अवसर पैदा करें और युवाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित करें।
कुल मिलाकर, पंजाब और हरियाणा में बढ़ती शिक्षित बेरोजगारी एक गंभीर चुनौती के रूप में सामने आ रही है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह समस्या सामाजिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर गहरा प्रभाव डाल सकती है। युवाओं की बढ़ती उम्मीदों और सीमित अवसरों के बीच का यह अंतर कम करना अब बेहद जरूरी हो गया है।

