
मतदाता सूची में महा-सफाई अभियान: करोड़ों नाम बाहर, नए वोटरों की एंट्री से बदली तस्वीर
देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत सामने आए आंकड़ों ने चुनावी परिदृश्य में नई बहस छेड़ दी है। यह प्रक्रिया जहां एक ओर चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची को अधिक सटीक और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है, वहीं दूसरी ओर इसके आंकड़े राजनीतिक हलकों में चर्चा और विवाद का कारण भी बन गए हैं। करोड़ों नाम हटाए जाने और बड़ी संख्या में नए मतदाताओं के जुड़ने से यह स्पष्ट हो गया है कि इस बार का पुनरीक्षण अभूतपूर्व स्तर पर किया गया है।

व्यापक स्तर पर हुआ सत्यापन
एसआईआर के दूसरे चरण में नौ राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूची की गहन जांच की गई। इस दौरान कुल 7.2 करोड़ से अधिक नाम सूची से हटाए गए। यह संख्या अपने आप में बहुत बड़ी है और इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि मतदाता सूची में कितनी बड़ी संख्या में ऐसे नाम थे, जिन्हें अपडेट या हटाने की जरूरत थी।
हालांकि, इस प्रक्रिया का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसी अवधि में करीब 2 करोड़ नए मतदाताओं को सूची में जोड़ा गया। ये वे लोग हैं जिन्होंने नए पंजीकरण (फॉर्म-6) या अपने विवरण में सुधार (फॉर्म-8) के जरिए खुद को अपडेट कराया।
अगर कुल आंकड़ों को संतुलित रूप में देखा जाए, तो वास्तविक रूप से हटाए गए नामों की संख्या लगभग 5.2 करोड़ के आसपास बैठती है। यानी जितने नाम हटे, उनमें से कुछ की भरपाई नए मतदाताओं के जुड़ने से भी हुई है।
कुल मतदाता संख्या में गिरावट
एसआईआर से पहले इन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कुल मतदाता संख्या लगभग 51 करोड़ थी। पुनरीक्षण के बाद यह संख्या घटकर 45.8 करोड़ रह गई है। यानी कुल मतदाताओं में करीब 10.2 प्रतिशत की कमी आई है।
यह कमी कई कारणों से हुई है। चुनाव आयोग के अनुसार बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता पाए गए, जो या तो अब जीवित नहीं हैं, या फिर अपने पंजीकृत पते से कहीं और स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके हैं। इसके अलावा कई लोग ऐसे भी थे, जिनके नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज थे।
उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा बदलाव
उत्तर प्रदेश इस पूरे अभियान का केंद्र बिंदु रहा है। यहां सबसे ज्यादा 2.04 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। लेकिन इसके साथ ही यह राज्य नए मतदाताओं को जोड़ने में भी सबसे आगे रहा है।
करीब 92.4 लाख नए मतदाता उत्तर प्रदेश में शामिल किए गए हैं। यह संख्या देश के किसी भी अन्य राज्य से ज्यादा है। इससे यह साफ होता है कि जहां एक ओर पुराने और अपात्र नाम हटाए गए, वहीं नई पीढ़ी के मतदाताओं को भी बड़े पैमाने पर जोड़ा गया है।
अन्य राज्यों का हाल
तमिलनाडु में 97 लाख नाम हटाए गए, जबकि 35 लाख नए मतदाता जुड़े। पश्चिम बंगाल में 90.8 लाख नाम हटे और करीब 7.5 लाख नए मतदाता जोड़े गए।
मध्य प्रदेश में 42 लाख से अधिक नाम हटाए गए, वहीं करीब 12.9 लाख नए मतदाता जुड़े। राजस्थान में भी 42 लाख के आसपास नाम हटे और 15.4 लाख नए मतदाता सूची में शामिल हुए।
गुजरात में 73 लाख नाम हटाए गए और 12.1 लाख नए मतदाता जुड़े। छत्तीसगढ़, केरल, गोवा और अन्य केंद्रशासित प्रदेशों में भी इसी तरह का ट्रेंड देखने को मिला।
पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा सियासी हलचल
पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर सबसे ज्यादा विवाद देखने को मिला। यहां करीब 60 लाख लोगों का सत्यापन किया गया। इनमें से 27 लाख से अधिक नाम सत्यापन के बाद हटाए गए, जबकि 6 लाख नाम आपत्तियों के आधार पर हटाए गए।
इस प्रक्रिया के बाद राज्य में मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.75 करोड़ रह गई। इस बड़े बदलाव ने राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू कर दिया है।
नाम हटाने के प्रमुख कारण
चुनाव आयोग द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार नाम हटाने के पीछे कई प्रमुख कारण रहे हैं। करीब 66.9 लाख नाम ऐसे थे, जिन्हें संबंधित व्यक्ति की मृत्यु के कारण हटाया गया।
करीब 1.3 करोड़ नाम ऐसे थे, जो एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत थे। इसके अलावा 1.3 करोड़ लोग अपने पंजीकृत पते पर नहीं मिले, जिससे उनके नाम हटाने पड़े।
सबसे बड़ी संख्या यानी करीब 3.1 करोड़ लोग ऐसे थे, जो स्थायी रूप से दूसरे स्थानों पर चले गए थे। इसके अलावा 12.7 लाख नाम अन्य कारणों के तहत हटाए गए।
प्रतिशत के हिसाब से स्थिति
अगर प्रतिशत के आधार पर देखा जाए, तो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सबसे ज्यादा 16.6% नाम हटाए गए। उत्तर प्रदेश और गुजरात में यह आंकड़ा 13% से अधिक रहा।
छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में 10% से ज्यादा नाम हटाए गए। तमिलनाडु और गोवा में भी लगभग 10% नाम हटे। वहीं मध्य प्रदेश और राजस्थान में यह प्रतिशत 5-6% के बीच रहा।
केरल में केवल 2.5% नाम हटाए गए, जबकि लक्षद्वीप में यह आंकड़ा बहुत कम यानी 0.3% रहा।
चुनावी असर और राजनीतिक बहस
इतनी बड़ी संख्या में मतदाता सूची में बदलाव का असर आने वाले चुनावों पर जरूर पड़ेगा। राजनीतिक दल इस मुद्दे को अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं। जहां सत्तापक्ष इसे पारदर्शिता और सुधार का कदम बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे लेकर सवाल उठा रहा है।
चुनाव आयोग की सफाई
चुनाव आयोग का कहना है कि एसआईआर का मकसद मतदाता सूची को पूरी तरह से अपडेट और त्रुटिरहित बनाना है। आयोग के अनुसार यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि केवल पात्र नागरिक ही सूची में शामिल हों।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत और पारदर्शी तरीके से की गई है। जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उन्हें दोबारा आवेदन करने का मौका भी दिया गया है।
निष्कर्ष
मतदाता सूची का यह विशेष गहन पुनरीक्षण देश के चुनावी तंत्र में एक बड़ा बदलाव लेकर आया है। करोड़ों नाम हटने और लाखों नए मतदाताओं के जुड़ने से यह स्पष्ट है कि यह प्रक्रिया व्यापक और गहन रही है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बदलाव का असर आगामी चुनावों पर किस तरह पड़ता है। फिलहाल इतना तय है कि एसआईआर ने चुनावी व्यवस्था को एक नई दिशा दी है और इसके परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।
