
संविधान की रक्षा के नाम पर सियासी दौड़: ‘रन फॉर अंबेडकर’ में Rahul Gandhi का भाजपा-आरएसएस पर सीधा वार
नई दिल्ली में आयोजित ‘रन फॉर अंबेडकर’ और ‘रन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन’ मैराथन 2026 ने एक बार फिर देश की राजनीति को गरमा दिया। यह कार्यक्रम सिर्फ एक सामाजिक पहल नहीं रहा, बल्कि इसके जरिए संविधान, सामाजिक न्याय और राजनीतिक विचारधाराओं पर खुलकर बहस देखने को मिली। इस आयोजन की शुरुआत कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने की, जिन्होंने मंच से भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर तीखा हमला बोला।

कार्यक्रम में राहुल गांधी ने संविधान को देश की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि यह केवल कानूनों का संग्रह नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र की आत्मा है। उन्होंने B. R. Ambedkar को याद करते हुए कहा कि बाबासाहेब ने जो संविधान दिया, उसका मकसद हर नागरिक को समान अधिकार और न्याय दिलाना था। लेकिन आज उसी संविधान को कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि भाजपा और आरएसएस की विचारधारा संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि ये संगठन समाज में बराबरी के विचार को स्वीकार नहीं करते और इसी कारण संविधान की भावना को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है। उनके अनुसार, यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि देश के भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय है।
अपने संबोधन में राहुल गांधी ने यह भी कहा कि भाजपा के नेता सार्वजनिक रूप से अंबेडकर को सम्मान देते हैं, उनकी मूर्तियों पर माल्यार्पण करते हैं, लेकिन उनकी नीतियां और फैसले उस विचारधारा से मेल नहीं खाते, जिसके लिए अंबेडकर ने जीवनभर संघर्ष किया। उन्होंने इसे “दिखावटी सम्मान” करार देते हुए कहा कि असली सम्मान तभी होगा जब संविधान के मूल्यों को पूरी तरह लागू किया जाए।
इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवा, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए। आयोजन का मकसद लोगों को संविधान के प्रति जागरूक करना और उन्हें यह समझाना था कि लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए हर नागरिक की भागीदारी जरूरी है। राहुल गांधी ने युवाओं से अपील की कि वे संविधान को समझें और उसके अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति सजग रहें।
कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया ने भी इस मौके पर अपनी बात रखते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार कई बार ऐसे फैसले लेती है, जो संवैधानिक प्रक्रियाओं के अनुरूप नहीं होते। पुनिया के अनुसार, सरकार धीरे-धीरे ऐसे कदम उठा रही है, जिससे संविधान की मूल भावना को नुकसान पहुंच सकता है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार “पिछले दरवाजे” से संविधान में बदलाव जैसी स्थिति पैदा कर रही है, जहां नियमों और प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। पुनिया ने कहा कि इस तरह की नीतियां लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं और जनता को इसके खिलाफ जागरूक होना चाहिए।
महिला आरक्षण बिल के मुद्दे पर भी कार्यक्रम में चर्चा हुई। तनुज पुनिया ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस हमेशा से महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के पक्ष में रही है। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण जरूरी है, लेकिन इसे लागू करने का तरीका सही होना चाहिए।
पुनिया ने भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि वह बिना नई जनगणना और परिसीमन के इस बिल को लागू करने की बात कर रही है, जो कि उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि आरक्षण को सही तरीके से लागू करना है, तो इसके लिए ताजा आंकड़ों के आधार पर जनगणना कराना जरूरी है। कांग्रेस का मानना है कि 2011 की पुरानी जनगणना के आधार पर निर्णय लेना सही नहीं होगा।
इस पूरे आयोजन का एक बड़ा संदेश यह था कि संविधान केवल सरकार या न्यायपालिका की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है। राहुल गांधी ने कहा कि अगर लोग अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं होंगे, तो लोकतंत्र कमजोर हो सकता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह के कार्यक्रमों के जरिए कांग्रेस अपने राजनीतिक एजेंडे को जनता के बीच मजबूती से रखने की कोशिश कर रही है। संविधान, सामाजिक न्याय और समानता जैसे मुद्दे हमेशा से कांग्रेस की राजनीति का हिस्सा रहे हैं, और अब इन्हें फिर से केंद्र में लाने का प्रयास किया जा रहा है।
वहीं, भाजपा ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। पार्टी का कहना है कि वह संविधान के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है और देश के विकास के लिए काम कर रही है। भाजपा नेताओं के अनुसार, विपक्ष केवल राजनीतिक लाभ के लिए इस तरह के आरोप लगाता है और जनता को गुमराह करने की कोशिश करता है।
‘रन फॉर अंबेडकर’ जैसे आयोजनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में संविधान और उससे जुड़े मुद्दे भारतीय राजनीति के केंद्र में रहेंगे। यह आयोजन केवल एक प्रतीकात्मक दौड़ नहीं, बल्कि एक वैचारिक संघर्ष का संकेत भी है, जिसमें अलग-अलग राजनीतिक दल अपनी-अपनी सोच के साथ मैदान में हैं।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि इस मैराथन ने देश में संविधान को लेकर एक नई चर्चा को जन्म दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बहस आगे किस दिशा में बढ़ती है और इसका देश की राजनीति पर क्या असर पड़ता है।
