
महंगी गैस ने छीनी रोजी-रोटी: राजधानी में बढ़ते संकट के बीच प्रवासी मजदूरों का गांव की ओर रुख
राजधानी दिल्ली में इन दिनों रसोई गैस का संकट गहराता जा रहा है, जिसने सबसे ज्यादा असर प्रवासी मजदूरों और निम्न आय वर्ग के लोगों पर डाला है। महंगे गैस सिलेंडर, सीमित उपलब्धता और वैकल्पिक ईंधन पर प्रतिबंधों ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि हजारों मजदूर अब शहर छोड़कर अपने गांवों की ओर लौटने लगे हैं। रोज कमाकर खाने वाले इन लोगों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे अपनी कमाई से पेट भरें या गैस खरीदें।

मजदूरों की मानें तो उनके पास काम की कमी नहीं है, लेकिन जीवन यापन की लागत इतनी बढ़ गई है कि बचत करना तो दूर, गुजारा करना भी मुश्किल हो गया है। एक मजदूर दिनभर मेहनत कर 400 से 600 रुपये तक कमा लेता है, लेकिन उसमें से किराया, खाना, बिजली और परिवार के लिए पैसे भेजने के बाद गैस सिलेंडर खरीदना लगभग असंभव हो जाता है। ऐसे में उन्हें मजबूरन शहर छोड़ने का फैसला लेना पड़ रहा है।
सबसे बड़ी परेशानी यह है कि अब मजदूरों के पास खाना बनाने का कोई सस्ता विकल्प भी नहीं बचा है। पहले वे लकड़ी या कोयले पर खाना बनाकर खर्च कम कर लेते थे, लेकिन अब मकान मालिकों ने इस पर रोक लगा दी है। सुरक्षा कारणों और प्रदूषण के डर से मकान मालिक किसी भी तरह का धुआं करने की अनुमति नहीं देते। इससे मजदूरों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
जमशेदपुर से आए करम चंद बताते हैं कि वे दिल्ली इसलिए आए थे ताकि कुछ पैसे जोड़कर गांव में अपने घर की मरम्मत करवा सकें। लेकिन गैस की बढ़ती कीमतों ने उनकी सारी योजनाओं पर पानी फेर दिया। अब वे न तो पैसे बचा पा रहे हैं और न ही ठीक से खाना बना पा रहे हैं। आखिरकार उन्होंने गांव लौटने का निर्णय लिया।
बिलासपुर के रहने वाले शोएब का दर्द भी कुछ ऐसा ही है। उनका कहना है कि 600 रुपये की दिहाड़ी में वे रोज बाहर का खाना नहीं खा सकते। उनके ऊपर परिवार की जिम्मेदारी है और बच्चों का पालन-पोषण करना है। ऐसे में गैस संकट ने उनकी आर्थिक स्थिति को पूरी तरह से हिला दिया है। वे मानते हैं कि सरकार को मजदूरों के लिए विशेष व्यवस्था करनी चाहिए थी।
बिहार से आए अनिल ने बताया कि उनकी मासिक आय करीब 13 हजार रुपये है, जिसमें उन्हें सभी खर्च पूरे करने होते हैं। गैस सिलेंडर की कीमत इतनी अधिक हो गई है कि उसे खरीदना उनके लिए संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि या तो वे गैस खरीदें या घर का राशन, दोनों एक साथ संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने गांव वापस जाने का फैसला किया।
दिल्ली के प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर इन दिनों मजदूरों की भीड़ बढ़ती जा रही है। आनंद विहार, नई दिल्ली और निजामुद्दीन स्टेशन पर लोग अपने परिवार और सामान के साथ गांव लौटते नजर आ रहे हैं। यह दृश्य एक बार फिर उस पलायन की याद दिला रहा है, जो पहले भी संकट के समय देखने को मिला था।
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मिले प्रेम मौर्य ने बताया कि वे बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर दिल्ली आए थे, लेकिन यहां की महंगाई ने उन्हें तोड़ दिया। उन्होंने कहा कि जब गैस इतनी महंगी हो गई है कि दो वक्त की रोटी भी मुश्किल हो जाए, तो शहर में रहने का क्या फायदा। कई दिनों तक भूखे रहने के बाद उन्होंने घर लौटने का फैसला किया।
गैस की कालाबाजारी भी इस संकट को और गंभीर बना रही है। जिन लोगों के पास गैस कनेक्शन नहीं है, उनसे एक सिलेंडर के लिए 3500 से 4000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। इससे गरीब वर्ग पूरी तरह से गैस से वंचित हो गया है।
सरकार ने इस स्थिति को देखते हुए कुछ राहत देने की कोशिश की है। खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने घोषणा की है कि प्रवासी मजदूरों के लिए गैस सिलेंडरों की आपूर्ति बढ़ाई जाएगी। छोटे सिलेंडरों की संख्या बढ़ाकर 1368 प्रतिदिन कर दी गई है और कॉमर्शियल सिलेंडरों का कोटा भी बढ़ाया गया है।
सरकार का दावा है कि अब कुल 6480 सिलेंडर प्रतिदिन उपलब्ध कराए जाएंगे और वितरण प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाएगा। इसके लिए आधार वेरिफिकेशन और केंद्रीकृत डाटाबेस का उपयोग किया जा रहा है, ताकि कोई गड़बड़ी न हो।
हालांकि जमीनी हकीकत अभी भी अलग नजर आ रही है। कई इलाकों में गैस की उपलब्धता सीमित है और कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। इससे लोगों की परेशानी कम होने के बजाय और बढ़ रही है।
इस संकट का असर छोटे कारोबारियों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। ढाबे, रेस्टोरेंट और फास्टफूड दुकानदारों को गैस नहीं मिल पा रही है, जिससे उनका व्यवसाय प्रभावित हो रहा है। कई दुकानदार घरेलू सिलेंडर का उपयोग कर रहे हैं, जो नियमों के खिलाफ है।
शादी-विवाह जैसे सामाजिक आयोजनों में भी अब कटौती देखने को मिल रही है। पहले जहां शादी में कई प्रकार के व्यंजन बनाए जाते थे, अब लोग खर्च कम करने के लिए सीमित मेन्यू ही रख रहे हैं।
पहाड़गंज के चाय विक्रेता रमेश कुमार बताते हैं कि गैस की कमी के कारण उन्हें अब इंडक्शन पर चाय बनानी पड़ रही है। इससे उनका काम धीमा हो गया है और लागत भी बढ़ गई है।
गैस संकट ने न केवल आम आदमी के जीवन को प्रभावित किया है, बल्कि शहर की अर्थव्यवस्था पर भी असर डालना शुरू कर दिया है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में इसका प्रभाव और भी व्यापक हो सकता है।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि गैस संकट ने राजधानी में रहने वाले गरीब और मजदूर वर्ग के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। जब तक इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला जाता, तब तक पलायन का सिलसिला जारी रहेगा और शहर की रफ्तार पर भी इसका असर पड़ेगा।



