
कमजोर जांच पड़ी भारी: अंबाला कोर्ट ने बिजली चोरी केस में आरोपी को दी राहत, सबूतों की कमी से टूटा आरोपों का आधार
हरियाणा के Ambala में बिजली चोरी से जुड़े एक मामले में अदालत का फैसला चर्चा का विषय बन गया है। विशेष अदालत ने आरोपी जसविंदर सिंह को बरी करते हुए साफ कर दिया कि केवल आरोप लगा देना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उन्हें साबित करने के लिए ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य भी जरूरी होते हैं। इस फैसले ने एक बार फिर जांच प्रक्रिया की खामियों को उजागर किया है।

मामला नारायणगढ़ क्षेत्र के गांव लोट्टों का है, जहां वर्ष 2017 में उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम की टीम ने एक परिसर की जांच की थी। जांच के दौरान आरोप लगाया गया कि उपभोक्ता जसविंदर सिंह ने अपने बिजली मीटर के साथ छेड़छाड़ की है और जानबूझकर उसे जला दिया है। निगम के अनुसार, इस कथित कृत्य से उसे लगभग 1,37,708 रुपये का नुकसान हुआ।
इस आधार पर फरवरी 2018 में थाना सिंचाई एवं बिजली, अंबाला में आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। केस दर्ज होने के बाद जांच शुरू हुई और मामला अदालत में पहुंचा। लेकिन सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष अपने ही तर्कों में उलझता नजर आया।
अदालत में पेश किए गए साक्ष्यों और गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास सामने आए। सबसे अहम गवाह एसडीओ यशपाल राणा की गवाही पर सवाल उठे। उन्होंने स्वीकार किया कि वह मौके पर मौजूद नहीं थे, जबकि निरीक्षण रिपोर्ट पर उनके हस्ताक्षर थे। इस तथ्य ने पूरे केस की नींव को कमजोर कर दिया।
इसके अलावा, बिजली अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं का भी पालन नहीं किया गया। जब मीटर को जांच के लिए लैब में भेजा गया, तो आरोपी को इसकी सूचना देना अनिवार्य था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। यह एक बड़ी प्रक्रिया संबंधी चूक मानी गई।
अदालत ने यह भी पाया कि नियमों के अनुसार बिजली चोरी के मामलों में 24 घंटे के भीतर एफआईआर दर्ज होनी चाहिए, लेकिन इस मामले में काफी देरी की गई। पुलिस इस देरी के पीछे कोई संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं कर सकी, जिससे केस और कमजोर हो गया।
जांच के दौरान एक और महत्वपूर्ण कमी यह सामने आई कि टीम ने मौके पर किसी स्वतंत्र गवाह को शामिल नहीं किया। आमतौर पर ऐसी कार्रवाई में स्थानीय व्यक्ति को गवाह बनाया जाता है, ताकि प्रक्रिया की पारदर्शिता बनी रहे। लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ, जिससे पूरे मामले पर संदेह गहरा गया।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि “संभावना और प्रमाण के बीच का अंतर बहुत बड़ा होता है।” न्यायाधीश ने कहा कि यह मान लेना कि चोरी हो सकती है, और यह साबित करना कि चोरी हुई है—दोनों अलग-अलग बातें हैं। जब तक ठोस साक्ष्य न हों, किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इन सभी खामियों को ध्यान में रखते हुए अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। इसलिए जसविंदर सिंह को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
अदालत ने आरोपी के निजी मुचलके को स्वीकार करते हुए उसे डिस्चार्ज करने का आदेश भी दिया। इस फैसले के बाद आरोपी और उसके परिवार ने राहत की सांस ली।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की बेगुनाही का नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों के कामकाज पर भी सवाल उठाता है। अगर शुरुआत से ही नियमों का पालन किया जाता और साक्ष्यों को सही तरीके से इकट्ठा किया जाता, तो शायद मामला अलग दिशा में जा सकता था।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में तकनीकी जानकारी और कानूनी प्रक्रिया का सही पालन बेहद जरूरी होता है। छोटी-छोटी गलतियां भी पूरे केस को प्रभावित कर सकती हैं।
यह फैसला यह भी दर्शाता है कि न्यायालय केवल तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय लेते हैं। किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक उसके खिलाफ आरोप पूरी तरह साबित न हो जाएं।
इस मामले के बाद यह चर्चा भी तेज हो गई है कि बिजली विभाग और संबंधित एजेंसियों को अपनी जांच प्रक्रिया में सुधार करना चाहिए। अधिकारियों को प्रशिक्षण देकर उन्हें नियमों के प्रति अधिक जागरूक बनाया जाना चाहिए।
अंततः, यह फैसला न्याय व्यवस्था की मजबूती को दर्शाता है, जहां हर व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार मिलता है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि कानून के सामने सब बराबर हैं और बिना ठोस सबूत के किसी को सजा नहीं दी जा सकती।
इस प्रकार, अंबाला की अदालत का यह निर्णय एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है, जो न केवल न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता को दर्शाता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि जांच में लापरवाही कितनी महंगी पड़ सकती है।

