
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें एक दोषी व्यक्ति ने करीब 32 साल जेल में बिताए, लेकिन इस दौरान उसकी सजा के खिलाफ कोई अपील ही दाखिल नहीं की गई। इस गंभीर लापरवाही पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है और कहा है कि न्याय में इतनी देरी किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं की जा सकती।

यह मामला रमेश नाम के व्यक्ति का है, जिसे 19 नवंबर 1993 को करनाल की सत्र अदालत ने हत्या के एक मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। साथ ही उस पर 500 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।
अभियोजन के अनुसार, 27 फरवरी 1992 की शाम को पुरानी रंजिश के चलते रमेश और उसके पिता फूल सिंह ने प्रीतम सिंह नामक व्यक्ति पर चाकू से हमला किया था। इस हमले में घायल प्रीतम सिंह की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई थी।
घटना के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच की और गवाहों के आधार पर रमेश को दोषी ठहराया गया। अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई।
हालांकि, सजा के बाद आमतौर पर दोषी उच्च अदालत में अपील करता है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। रमेश ने 32 वर्षों तक कोई अपील दाखिल नहीं की, जो कि बेहद असामान्य और चिंताजनक है।
मार्च 2026 में जब यह मामला हाईकोर्ट के सामने आया, तो अदालत ने इस पर सख्त रुख अपनाया। जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने कहा कि यह मामला न्याय व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करता है।
कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति खुद अपील दाखिल नहीं कर पाता, तो यह जिम्मेदारी संबंधित संस्थाओं—जैसे जेल प्रशासन और कानूनी सहायता प्रणाली—की होती है कि वे उसे उचित मदद प्रदान करें। लेकिन इस मामले में यह जिम्मेदारी निभाई नहीं गई।
हाईकोर्ट ने 11,740 दिनों की देरी को माफ करते हुए अपील को स्वीकार कर लिया और मामले की सुनवाई शुरू करने का फैसला लिया। साथ ही ट्रायल कोर्ट से केस से जुड़े सभी दस्तावेज मंगवाए गए हैं।
इस मामले की अगली सुनवाई 2 मई को निर्धारित की गई है।
यह मामला तब सामने आया जब करनाल जिला जेल के डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ने रमेश की अपील से संबंधित एक आवेदन हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी को भेजा। इसके बाद अधिवक्ता संजीव शर्मा को केस सौंपा गया।
दस्तावेजों की जांच के दौरान यह पता चला कि अपील दाखिल करने में 32 साल की देरी हुई है। इसके बाद कोर्ट में देरी माफ करने की याचिका दायर की गई, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
हाईकोर्ट ने इस मामले में करनाल जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को भी निर्देश दिए हैं कि वे इस लापरवाही के कारणों की जांच करें और रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
यह मामला न केवल एक व्यक्ति के अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि यह पूरे न्याय तंत्र के लिए एक चेतावनी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि हर कैदी को समय पर न्याय मिलना उसका मूल अधिकार है और इसमें किसी भी प्रकार की देरी अस्वीकार्य है।
फिलहाल, इस मामले की सुनवाई जारी है और आने वाले समय में इससे जुड़े कई अहम पहलू सामने आ सकते हैं।

