
सरसों की फसल में नई उड़ान—उत्पादन 119.4 लाख टन के करीब, तिलहन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की उम्मीद मजबूत
देश के कृषि क्षेत्र से एक बार फिर सकारात्मक खबर सामने आई है। रबी सीजन 2025-26 के दौरान राई-सरसों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस बार सरसों का कुल उत्पादन लगभग 119.4 लाख टन तक पहुंच सकता है, जो पिछले साल के 115.2 लाख टन से अधिक है। यह बढ़ोतरी केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों की मेहनत, बेहतर तकनीक और अनुकूल मौसम की संयुक्त सफलता को दर्शाती है।

यह अनुमान उद्योग संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) द्वारा जारी किया गया है। संगठन के मुताबिक, उत्पादन का यह आकलन पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ आधुनिक तकनीकों की मदद से किया गया है। इसमें खेतों के सर्वेक्षण, फसल कटाई के आंकड़े और रिमोट सेंसिंग जैसी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल शामिल है। इससे अनुमान अधिक सटीक और भरोसेमंद बनता है।
भारत में सरसों की खेती पिछले कुछ वर्षों में लगातार विस्तार कर रही है। वर्ष 2019-20 में जहां इसका उत्पादन करीब 86 लाख टन था, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 120 लाख टन के करीब पहुंचने की स्थिति में है। यह तेजी इस बात का संकेत है कि किसानों का रुझान तिलहन फसलों की ओर बढ़ रहा है, जो उन्हें बेहतर मुनाफा देने में सक्षम हैं।
सरसों उत्पादन में इस बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ा कारण इसके खेती क्षेत्र का विस्तार है। इस साल राई-सरसों का कुल रकबा बढ़कर लगभग 93.91 लाख हेक्टेयर हो गया है, जो पिछले साल के 92.15 लाख हेक्टेयर से अधिक है। अधिक क्षेत्र में बुवाई होने से उत्पादन में स्वाभाविक रूप से बढ़ोतरी देखने को मिलती है। इसके अलावा, कई राज्यों में किसानों ने पारंपरिक फसलों की जगह सरसों को प्राथमिकता दी है।
उत्पादकता के स्तर पर भी सुधार हुआ है। बेहतर मौसम परिस्थितियों, उन्नत बीजों और आधुनिक कृषि तकनीकों के उपयोग से प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई है। इस बार औसत उत्पादकता 1,271 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष के 1,250 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से अधिक है। यह संकेत देता है कि किसान अब अधिक वैज्ञानिक तरीके से खेती कर रहे हैं।
राज्यवार स्थिति पर नजर डालें तो राजस्थान एक बार फिर सरसों उत्पादन में अग्रणी बना हुआ है। यहां इस बार लगभग 53.9 लाख टन उत्पादन का अनुमान है, जो देश के कुल उत्पादन का बड़ा हिस्सा है। राज्य की जलवायु और मिट्टी सरसों के लिए अनुकूल होने के कारण यहां लगातार अच्छी पैदावार होती है।
दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश है, जहां इस बार उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यहां सरसों का उत्पादन करीब 18.1 लाख टन तक पहुंच सकता है। यह वृद्धि किसानों द्वारा बेहतर खेती पद्धतियों को अपनाने और सरकार की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का परिणाम है।
हालांकि, सभी राज्यों में स्थिति समान नहीं है। मध्य प्रदेश में इस बार उत्पादन में हल्की गिरावट का अनुमान है, जहां उत्पादन घटकर करीब 13.9 लाख टन रह सकता है। इसके पीछे मौसम में बदलाव और कुछ क्षेत्रों में फसल की गुणवत्ता में कमी को कारण माना जा रहा है। हरियाणा में उत्पादन अपेक्षाकृत स्थिर रहा है और यहां लगभग 12.7 लाख टन उत्पादन होने की संभावना है।
सरसों उत्पादन में यह बढ़ोतरी देश के लिए आर्थिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा का भारी खर्च होता है। यदि घरेलू स्तर पर सरसों और अन्य तिलहन फसलों का उत्पादन इसी तरह बढ़ता रहा, तो आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है। इससे न केवल देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि किसानों को भी बेहतर बाजार मिलेगा।
इसके अलावा, सरसों की बढ़ती उपलब्धता से खाद्य तेल की कीमतों पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। जब बाजार में आपूर्ति बढ़ती है, तो कीमतों में स्थिरता आती है, जिससे आम उपभोक्ताओं को भी राहत मिलती है।
एसईए के विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल जारी किए गए आंकड़े शुरुआती अनुमान हैं और आने वाले समय में इन्हें अपडेट किया जा सकता है। फील्ड सर्वे और अन्य आंकड़ों के आधार पर अंतिम उत्पादन में थोड़ा बदलाव संभव है। फिर भी मौजूदा संकेत स्पष्ट रूप से बेहतर उत्पादन की ओर इशारा करते हैं।
भविष्य की दृष्टि से देखें तो सरसों उत्पादन में यह बढ़ोतरी भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि सरकार और किसान मिलकर इसी तरह प्रयास करते रहे, तो आने वाले वर्षों में देश खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भरता के करीब पहुंच सकता है।
कुल मिलाकर, 2025-26 का रबी सीजन सरसों उत्पादन के लिहाज से काफी उम्मीदों भरा नजर आ रहा है। यह न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद करेगा, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को भी मजबूत करेगा।
