
ऊर्जा भू-राजनीति का नया समीकरण: पश्चिम एशिया में तनाव के बीच भारत के लिए रूस बना बैकअप सप्लायर
पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। समुद्री मार्गों की सुरक्षा, तेल टैंकरों की आवाजाही और प्रमुख निर्यातकों की उत्पादन क्षमता को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। इसी पृष्ठभूमि में रूस ने भारत को लगभग 95 लाख बैरल कच्चा तेल उपलब्ध कराने की तैयारी जताई है। यह पेशकश ऐसे समय आई है जब भारत के पास सीमित अवधि का तेल भंडार बचा है और पश्चिम एशिया से आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा मंडरा रहा है।

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है। इसमें बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आता है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाले मार्ग पर भारत की निर्भरता अधिक है। मौजूदा तनाव के चलते इस समुद्री रास्ते की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए हैं। यदि इस मार्ग पर बाधा आती है, तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर तत्काल असर पड़ सकता है।
हाल के घटनाक्रमों में इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने हालात को और जटिल बना दिया है। जवाबी हमलों और सैन्य गतिविधियों ने पूरे क्षेत्र को संवेदनशील बना दिया है। तेल टैंकरों की आवाजाही पर खतरे की आशंका ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों को अस्थिर कर दिया है। भारत, जो अपने लगभग 40 प्रतिशत आयात इसी क्षेत्र से करता है, स्वाभाविक रूप से चिंतित है।
ऊर्जा मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, भारत के पास फिलहाल लगभग 25 दिनों की जरूरत के बराबर कच्चे तेल का भंडार है। इसमें रणनीतिक और वाणिज्यिक दोनों तरह के स्टॉक शामिल हैं। हालांकि यह भंडार अल्पकालिक संकट से निपटने के लिए पर्याप्त माना जाता है, लेकिन लंबी अवधि की बाधा की स्थिति में यह अपर्याप्त साबित हो सकता है। इसी संदर्भ में रूस की पेशकश अहम हो जाती है।
बताया जा रहा है कि रूसी तेल से लदे कुछ जहाज एशियाई समुद्री क्षेत्र में पहले से मौजूद हैं। आवश्यकता पड़ने पर इन टैंकरों को भारतीय बंदरगाहों की ओर मोड़ा जा सकता है और कुछ ही हफ्तों में आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है। भारत की रिफाइनरियां प्रतिदिन लगभग 56 लाख बैरल कच्चा तेल प्रोसेस करती हैं। इस लिहाज से 95 लाख बैरल की अतिरिक्त आपूर्ति आपात स्थिति में राहत देने वाला कदम हो सकता है।
रूस और भारत के बीच ऊर्जा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते रूस ने एशियाई बाजारों की ओर रुख किया और भारत को रियायती दरों पर तेल की आपूर्ति बढ़ाई। इससे भारत को अपने आयात बिल को संतुलित रखने में मदद मिली। हालांकि कुछ समय के लिए आपूर्ति में उतार-चढ़ाव देखा गया, लेकिन दोनों देशों के बीच ऊर्जा व्यापार जारी रहा।
हाल ही में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने मॉस्को में हंगरी के विदेश मंत्री पीटर सिज्जार्तो से मुलाकात की। इस बैठक में ऊर्जा आपूर्ति प्रमुख मुद्दा रही। हंगरी को रूस से तेल और गैस की आपूर्ति मुख्य रूप से द्रुज्बा पाइपलाइन के माध्यम से होती है, जो यूक्रेन के रास्ते गुजरती है। हाल में इस मार्ग पर आपूर्ति में रुकावट की खबरें आईं। हंगरी ने आरोप लगाया कि यूक्रेन की वजह से आपूर्ति बाधित हुई, जबकि यूक्रेन ने इन आरोपों को खारिज किया।
इस मुलाकात के दौरान पुतिन ने यह स्पष्ट किया कि रूस अपने ऊर्जा अनुबंधों को निभाने के लिए प्रतिबद्ध है। यह बयान यूरोप के साथ-साथ एशियाई देशों के लिए भी संकेत था कि रूस वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी भूमिका को बनाए रखना चाहता है। भारत के संदर्भ में यह संदेश महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि संकट की स्थिति में विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता की उपलब्धता बेहद अहम होती है।
ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर भारत को गैस आपूर्ति को लेकर भी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। कतर, जो भारत का प्रमुख एलएनजी आपूर्तिकर्ता है, ने हाल में अपने उत्पादन में अस्थायी कटौती की है। इसके चलते कुछ औद्योगिक क्षेत्रों में गैस आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। यदि तेल और गैस दोनों आपूर्ति शृंखलाओं में बाधा आती है, तो इसका असर उद्योग, परिवहन और घरेलू उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संकट भारत को अपनी ऊर्जा नीति पर फिर से विचार करने का अवसर भी देता है। दीर्घकालिक समाधान के लिए रणनीतिक भंडार को बढ़ाना, आयात स्रोतों का विविधीकरण और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाना जरूरी होगा। हालांकि फिलहाल प्राथमिकता आपूर्ति की निरंतरता सुनिश्चित करना है।
भारत पहले ही रूस, अमेरिका, अफ्रीकी देशों और लैटिन अमेरिकी उत्पादकों से भी तेल खरीद रहा है। लेकिन पश्चिम एशिया की भौगोलिक निकटता और स्थापित व्यापारिक संबंधों के कारण उस क्षेत्र की भूमिका अभी भी प्रमुख है। इसलिए वहां की अस्थिरता का असर भारत पर ज्यादा पड़ता है।
रूस की ओर से 95 लाख बैरल तेल की पेशकश को एक बैकअप व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है। यह कदम न केवल आपूर्ति संकट की स्थिति में राहत दे सकता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारत वैश्विक ऊर्जा भू-राजनीति में संतुलित कूटनीति अपनाने की कोशिश कर रहा है।
आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की स्थिति किस दिशा में जाती है, यह कहना मुश्किल है। यदि तनाव कम होता है तो बाजार स्थिर हो सकते हैं, लेकिन यदि संघर्ष बढ़ता है तो तेल की कीमतों में तेज उछाल संभव है। ऐसे परिदृश्य में भारत को अपने रणनीतिक निर्णय तेजी से लेने होंगे।
कुल मिलाकर, मौजूदा हालात भारत के लिए चुनौती और अवसर दोनों लेकर आए हैं। चुनौती इसलिए क्योंकि आयात निर्भरता अधिक है, और अवसर इसलिए क्योंकि विविध आपूर्ति स्रोतों के जरिए ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने का मौका है। रूस की ताजा पहल इसी व्यापक परिदृश्य का हिस्सा है, जो संकट की घड़ी में भारत के लिए संभावित सहारा बन सकती है।
