
खेत की मेड़ पर बिछी लाश: जमीन के फैसले के बाद भाई ही बना दुश्मन, हाईकोर्ट के अधिवक्ता को पीट-पीटकर मौत के घाट उतारा
उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले से एक ऐसी वारदात सामने आई है जिसने रिश्तों, कानून और लालच — तीनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। नौ बीघा जमीन के विवाद ने ऐसा खूनी रूप लिया कि एक बुजुर्ग अधिवक्ता की दिनदहाड़े लाठी और लोहे की रॉड से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। हैरानी की बात यह है कि इस हमले में आरोपी कोई बाहरी लोग नहीं, बल्कि मृतक के अपने रिश्तेदार और गांव के प्रभावशाली लोग बताए जा रहे हैं।

मृतक की पहचान 67 वर्षीय अधिवक्ता सुभाष मिश्रा के रूप में हुई है, जो पेशे से वकील थे और लंबे समय से लखनऊ में रह रहे थे। बताया जा रहा है कि वे न्यायिक मामलों में सक्रिय थे और उनका जुड़ाव इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़े मामलों से रहा है।
परिवार के मुताबिक, सुभाष मिश्रा का अपने छोटे भाई और गांव के कुछ लोगों से करीब तीन साल से जमीन को लेकर विवाद चल रहा था। मामला अदालत तक पहुंचा और हाल ही में फैसला उनके पक्ष में आया। परिजनों को उम्मीद थी कि अब विवाद खत्म हो जाएगा, लेकिन फैसले के बाद जमीन पर कब्जे की कोशिश ने माहौल को बारूद बना दिया।
रविवार सुबह सुभाष मिश्रा अपने गांव पहुंचे। उनके साथ परिवार के सदस्य भी थे। उन्होंने विवादित जमीन पर ट्रैक्टर चलवाकर जोताई शुरू कर दी। गांव के कुछ लोगों ने बताया कि यह खबर आग की तरह फैल गई। थोड़ी ही देर में विरोधी पक्ष के लोग भी वहां पहुंच गए।
पहले बहस हुई। आवाजें ऊंची हुईं। फिर गाली-गलौज शुरू हुई और देखते ही देखते विवाद हिंसा में बदल गया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, आरोपियों ने बिना किसी चेतावनी के हमला कर दिया। उनके हाथों में लोहे की रॉड, लाठियां और डंडे थे।
हमला इतना अचानक और क्रूर था कि बचाव का मौका तक नहीं मिला। सुभाष मिश्रा को सिर और शरीर पर कई वार किए गए। उनके साथ मौजूद भतीजे आकाश, विश्वास और अभय कुमार भी हमले में बुरी तरह घायल हो गए। ग्रामीणों के मुताबिक, हमलावर तब तक मारते रहे जब तक सभी जमीन पर लहूलुहान होकर गिर नहीं पड़े।
घटना के बाद खेत चीख-पुकार से गूंज उठा। गांव में अफरा-तफरी मच गई। परिवार और स्थानीय लोग घायल अवस्था में सभी को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए। डॉक्टरों ने स्थिति गंभीर देखते हुए तीन लोगों को मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया।
इलाज के दौरान सुभाष मिश्रा ने दम तोड़ दिया। यह खबर मिलते ही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। गांव में भी सन्नाटा फैल गया।
मृतक के भतीजे विश्वास ने पुलिस को दी तहरीर में अपने ही चाचा के छोटे भाई अरुण कुमार मिश्रा, पूर्व ग्राम प्रधान हरिशरण मिश्रा, रामकेवल और संतोष कुमार पर हमला करने का आरोप लगाया है। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर लिया है और दो आरोपियों को हिरासत में भी लिया गया है।
इस मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जमीन के इस विवाद ने भाई को भाई का दुश्मन बना दिया। गांव के लोगों का कहना है कि दोनों पक्षों में पहले भी कई बार झड़प हो चुकी थी, लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि मामला हत्या तक पहुंच जाएगा।
पुलिस का कहना है कि मारपीट में दूसरे पक्ष के कुछ लोग भी घायल हुए हैं, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि मुख्य आरोपियों की भूमिका स्पष्ट है और जांच तेजी से की जा रही है।
घटना के बाद गांव में तनाव की स्थिति को देखते हुए पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी तरह की बदले की कार्रवाई रोकने के लिए लगातार निगरानी रखी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण इलाकों में जमीन विवाद अक्सर सबसे ज्यादा हिंसक होते हैं। अदालत का फैसला आने के बाद भी जमीन पर कब्जे की कोशिशें टकराव को जन्म देती हैं। कई बार इसमें रिश्तेदारी, स्थानीय राजनीति और सामाजिक प्रतिष्ठा भी जुड़ जाती है, जिससे मामला और विस्फोटक हो जाता है।
सुभाष मिश्रा के परिवार का कहना है कि उन्हें न्यायपालिका पर भरोसा था, इसलिए उन्होंने कानूनी रास्ता अपनाया। अदालत से फैसला भी मिला, लेकिन जमीन लेने की कोशिश में उनकी जान चली गई।
अब सवाल यह है कि क्या कानून का फैसला भी जमीन की लड़ाई रोकने के लिए काफी नहीं?
क्या ग्रामीण समाज में जमीन आज भी रिश्तों से बड़ी है?
और सबसे बड़ा सवाल — क्या लालच इंसान को इतना अंधा बना देता है कि वह अपने ही खून का दुश्मन बन जाए?
फिलहाल पुलिस पोस्टमार्टम रिपोर्ट और गवाहों के बयान के आधार पर आगे की कार्रवाई कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि अगर जांच में हत्या की साजिश के संकेत मिले तो धाराएं और सख्त की जाएंगी।
लेकिन गांव में चर्चा सिर्फ एक ही बात की है —
एक खेत, एक फैसला… और एक लाश।



