दिल्ली

नई स्टडी में चेतावनी: आधुनिक शहरी जीवनशैली घटा रही इम्यूनिटी, प्रकृति से दूरी बन रही बीमारियों की वजह

महानगरों की भागदौड़ भरी जिंदगी, तकनीक से घिरा रहन-सहन और आरामदायक सुविधाएं आधुनिक जीवन की पहचान बन चुकी हैं। लेकिन एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन ने यह संकेत दिया है कि यही शहरी जीवनशैली धीरे-धीरे लोगों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रकृति से बढ़ती दूरी मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर बना रही है।

यह अध्ययन दिल्ली विश्वविद्यालय और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं ने मिलकर किया है। इस पायलट स्टडी में यह समझने की कोशिश की गई कि शहरी और ग्रामीण जीवनशैली का शरीर के माइक्रोबायोम यानी आंतों में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया पर क्या असर पड़ता है।

शोध के लिए वैज्ञानिकों ने दिल्ली के शहरी इलाकों और हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों से लोगों के नमूने लिए। कुल 20 प्रतिभागियों को अध्ययन में शामिल किया गया, जिनमें 10 लोग शहर से और 10 गांव से थे। इन लोगों के मल और मिट्टी के नमूनों की जांच कर उनके शरीर में मौजूद सूक्ष्मजीवों की विविधता का विश्लेषण किया गया।

रिपोर्ट में सामने आया कि ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की आंतों में अच्छे बैक्टीरिया की संख्या और विविधता दोनों ज्यादा पाई गईं। ये बैक्टीरिया शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करते हैं, सूजन कम करते हैं और शरीर की ऊर्जा प्रणाली को बेहतर बनाए रखते हैं। इसके विपरीत, शहरों में रहने वाले लोगों में माइक्रोबायोम का दायरा सीमित पाया गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि उनकी रोगों से लड़ने की क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर हो सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, मानव शरीर में मौजूद गट माइक्रोबायोम स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण आधार है। यह केवल पाचन में मदद नहीं करता, बल्कि संक्रमण से बचाव, सूजन नियंत्रण और शरीर की चयापचय प्रणाली को संतुलित रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। जब इस माइक्रोबायोम की विविधता कम हो जाती है, तो कई जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है, जैसे मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और मेटाबॉलिक सिंड्रोम।

शोधकर्ताओं का मानना है कि शहरी जीवन में कुछ आदतें इस बदलाव के पीछे मुख्य कारण हो सकती हैं। जैसे लगातार एसी वातावरण में रहना, खुले वातावरण में कम समय बिताना, अत्यधिक केमिकल क्लीनिंग उत्पादों का उपयोग करना और हर समय सैनिटाइजर पर निर्भर रहना। ये सभी चीजें शरीर को प्राकृतिक बैक्टीरिया से दूर कर देती हैं, जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है।

इसके विपरीत, ग्रामीण जीवन में लोग नियमित रूप से मिट्टी, खेतों और खुले वातावरण के संपर्क में रहते हैं। इससे शरीर को प्राकृतिक सूक्ष्मजीव मिलते रहते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते हैं। यही कारण है कि गांवों में रहने वाले लोगों के माइक्रोबायोम में ज्यादा विविधता देखी गई।

अध्ययन में यह भी संकेत मिला कि ग्रामीण प्रतिभागियों में कुछ जैविक प्रक्रियाएं अधिक सक्रिय थीं, जो ऊर्जा उत्पादन और हृदय स्वास्थ्य से जुड़ी होती हैं। इससे यह अनुमान लगाया गया कि प्राकृतिक वातावरण शरीर की कार्यप्रणाली को संतुलित बनाए रखने में मदद करता है।

हालांकि वैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट किया कि यह अध्ययन प्रारंभिक स्तर का है और प्रतिभागियों की संख्या सीमित थी। इसलिए इसके निष्कर्षों को अंतिम नहीं माना जा सकता, लेकिन यह भविष्य के बड़े शोध के लिए एक महत्वपूर्ण आधार जरूर तैयार करता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि शहरों में रहने वाले लोग भी कुछ सरल बदलाव करके अपनी इम्यूनिटी मजबूत कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, रोजाना कुछ समय खुले वातावरण में बिताना, पार्क में टहलना, घर में पौधे लगाना, बच्चों को बाहर खेलने देना और बिना जरूरत बार-बार सैनिटाइजर का इस्तेमाल न करना। ये छोटे कदम शरीर के माइक्रोबायोम को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।

इसके अलावा, विशेषज्ञ संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और तनाव नियंत्रण को भी प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत करने के लिए जरूरी मानते हैं। उनका कहना है कि आधुनिक जीवनशैली अपनाना गलत नहीं है, लेकिन प्रकृति से पूरी तरह कट जाना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

यह अध्ययन इस बात की ओर संकेत करता है कि भविष्य में शहरी जीवनशैली और स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती बन सकता है। यदि लोग अपने दैनिक जीवन में थोड़ी-सी प्राकृतिक आदतें शामिल कर लें, तो वे कई गंभीर बीमारियों के खतरे को कम कर सकते हैं और लंबे समय तक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।

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