
सुप्रीम कोर्ट में अनोखा क्षण, जस्टिस पारदीवाला ने वकील से कहा– “रुकिए, आपकी जरूरत पड़ेगी”
देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India में अक्सर गंभीर और संवैधानिक महत्व के मामलों की सुनवाई होती है। लेकिन कई बार अदालत कक्ष में ऐसे पल भी आते हैं, जो न्यायिक अनुशासन, धैर्य और प्रक्रिया की अहमियत को स्पष्ट कर देते हैं। हाल ही में एक सुनवाई के दौरान ऐसा ही दृश्य देखने को मिला, जब जस्टिस J. B. Pardiwala को एक याची के व्यवहार के कारण सख्त टिप्पणी करनी पड़ी—और यहां तक कहना पड़ा, “वकील साहब, मत जाइए, आपकी जरूरत पड़ेगी।”

मामला क्या था?
यह प्रकरण सीमा सड़क कार्य बल (Border Roads Organisation) में कार्यरत एक मैकेनिकल इंजीनियर की बहाली और बकाया वेतन से जुड़ा था। याची का दावा था कि हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद उन्हें करीब 37 लाख रुपये का भुगतान नहीं मिला है। मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने सीधे सवाल किया कि क्या आदेश के अनुसार राशि मिल चुकी है या नहीं।
सुनवाई की शुरुआत सामान्य ढंग से हुई। जस्टिस पारदीवाला ने याची से स्पष्ट और सीधा उत्तर मांगा। लेकिन यहीं से घटनाक्रम ने अप्रत्याशित मोड़ लिया।
सीधा सवाल, गोल जवाब
जब अदालत ने पूछा कि क्या आपको बकाया राशि प्राप्त हुई है, तो याची ने स्पष्ट “हां” या “नहीं” में जवाब देने के बजाय लंबी व्याख्या शुरू कर दी। उन्होंने कहा कि उनके कोलकाता स्थित बैंक खाते में रकम नहीं आई है। अदालत ने दोबारा पूछा—क्या किसी अन्य खाते में भुगतान हुआ है?
इस बीच विभाग की ओर से उपस्थित वकील ने हस्तक्षेप करते हुए बताया कि भुगतान राजौरी स्थित बैंक खाते में किया जा चुका है। रिकॉर्ड के अनुसार राशि जमा हो चुकी थी। इसके बाद याची को स्वीकार करना पड़ा कि हां, राजौरी वाले खाते में पैसा आ चुका है।
अदालत कक्ष में यह स्थिति कुछ असहज हो गई, क्योंकि याची प्रारंभ में स्पष्ट जानकारी देने से बचते नजर आए।
जज की सहनशीलता की परीक्षा
जस्टिस पारदीवाला अपनी शांत और धैर्यपूर्ण कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने याची को विस्तार से बोलने का अवसर दिया। लेकिन जब वे आदेश लिखवाने लगे, तो याची फिर बीच में बोल पड़े। बार-बार समझाने के बावजूद वे अपनी दलीलें दोहराते रहे।
आखिरकार, अदालत की गरिमा और प्रक्रिया को बनाए रखने के लिए जस्टिस पारदीवाला को सख्त रुख अपनाना पड़ा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अपना मुंह बंद रखिए और मुझे आदेश लिखवाने दीजिए।” साथ ही यह टिप्पणी भी की कि इस प्रकार का व्यवहार यह दर्शाता है कि याची नौकरी के लिए उपयुक्त नहीं प्रतीत होते।
यह टिप्पणी केवल व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं थी, बल्कि अदालत की मर्यादा और अनुशासन के संदर्भ में थी। अदालत में हर पक्ष को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है, लेकिन जब न्यायालय आदेश लिख रहा हो, तब व्यवधान स्वीकार्य नहीं होता।
“वकील साहब, मत जाइए…”
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान एक और दिलचस्प क्षण आया। जब याची स्वयं अपनी पैरवी कर रहे थे और बार-बार प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रहे थे, तब जस्टिस पारदीवाला ने उनके वकील से कहा, “वकील साहब, मत जाइए, मुझे आपकी जरूरत पड़ेगी।”
यह टिप्पणी हल्की मुस्कान के साथ कही गई, लेकिन इसके पीछे गहरी न्यायिक समझ थी। अदालत को यह स्पष्ट हो गया था कि जब कोई पक्षकार भावनात्मक या आवेगपूर्ण तरीके से अपनी बात रखता है, तो उसका अधिवक्ता ही उसे प्रक्रिया और मर्यादा में रखने में मदद कर सकता है।
न्यायिक अनुशासन का संदेश
यह घटना केवल एक मामले तक सीमित नहीं है। यह अदालत में आचरण और प्रक्रिया के महत्व को रेखांकित करती है। सुप्रीम कोर्ट जैसे संस्थान में हर शब्द, हर प्रक्रिया और हर आदेश विधिक महत्व रखता है।
जब कोई पक्षकार अदालत के प्रश्नों का सीधा उत्तर देने से बचता है या आदेश लिखे जाने के दौरान हस्तक्षेप करता है, तो यह न केवल कार्यवाही में बाधा डालता है, बल्कि न्यायिक समय की भी हानि करता है।
जस्टिस पारदीवाला की टिप्पणी इस बात का संकेत थी कि अदालत धैर्य रख सकती है, लेकिन अनुशासन से समझौता नहीं कर सकती।
अधिवक्ता की भूमिका क्यों अहम?
इस प्रकरण ने यह भी दिखाया कि अदालत में अधिवक्ता की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। कानून की जटिलताओं, प्रक्रिया और भाषा को समझना हर व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता। वकील न केवल कानूनी तर्क प्रस्तुत करता है, बल्कि अपने मुवक्किल को यह भी समझाता है कि कब और कैसे बोलना है।
जस्टिस पारदीवाला का “वकील साहब, मत जाइए…” कहना इस भूमिका की अहमियत को रेखांकित करता है। अदालत चाहती है कि पक्षकार कानून की चौखट के भीतर अपनी बात रखें, और इसमें अधिवक्ता एक सेतु का काम करता है।
निष्कर्ष
यह पूरा घटनाक्रम न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता और अनुशासन की आवश्यकता को सामने लाता है। अदालतें हर व्यक्ति को सुनती हैं, लेकिन वहां आचरण की एक मर्यादा होती है। सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही में यह स्पष्ट संदेश गया कि धैर्य और सहनशीलता के बावजूद न्यायालय अपनी गरिमा और प्रक्रिया को सर्वोपरि मानता है।
जस्टिस पारदीवाला की सख्त लेकिन संतुलित टिप्पणी ने यह दिखा दिया कि न्याय केवल कानून की किताबों से नहीं, बल्कि अदालत की मर्यादा और अनुशासन से भी संचालित होता है।



