
हरियाणा वर्क स्लिप घोटाला: सिस्टम की खामियों ने खोले 1500 करोड़ की लूट के रास्ते, जांच में चौंकाने वाले तथ्य उजागर
हरियाणा के श्रम विभाग से जुड़े 1500 करोड़ रुपये के वर्क स्लिप घोटाले ने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में सामने आया है कि इस पूरे फर्जीवाड़े की जड़ें न केवल तकनीकी खामियों में थीं, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर बरती गई लापरवाही ने भी इस घोटाले को पनपने का मौका दिया। मजदूरों के पंजीकरण से लेकर भुगतान तक की प्रक्रिया में नियमों की खुलेआम अनदेखी की गई।

पंजीकरण प्रक्रिया बनी घोटाले की पहली कड़ी
जांच के शुरुआती चरण में यह स्पष्ट हुआ कि कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) इस पूरे मामले की पहली और सबसे अहम कड़ी रहे। मजदूरों के पंजीकरण के दौरान नियमों का पालन करने के बजाय जल्दबाजी और लापरवाही को प्राथमिकता दी गई। एक ही पते को बार-बार इस्तेमाल कर बड़ी संख्या में मजदूरों का डाटा सिस्टम में अपलोड किया गया।
सूत्रों के अनुसार, कंप्यूटर पर पहले से भरे गए फॉर्म को सिर्फ नाम और मोबाइल नंबर बदलकर दोबारा इस्तेमाल किया गया। पते, कार्यस्थल और काम के विवरण की कोई वास्तविक जांच नहीं की गई। मोबाइल नंबर सही डालने पर ओटीपी मिलता रहा और उसी के आधार पर वर्क स्लिप जारी होती चली गई।
तकनीक का गलत इस्तेमाल
सरकारी व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए अपनाई गई तकनीक इस घोटाले में कमजोर कड़ी साबित हुई। ओटीपी आधारित सत्यापन को ही अंतिम प्रमाण मान लिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि फर्जी या अधूरी जानकारी के बावजूद वर्क स्लिप सिस्टम में वैध दिखाई देने लगी।
सत्यापन अधिकारियों की भूमिका संदेह के घेरे में
वर्क स्लिप जारी होने के बाद उनका सत्यापन स्थानीय अधिकारियों द्वारा किया जाना अनिवार्य था। इसके लिए पटवारी, ग्राम सचिव, लेखपाल, जूनियर इंजीनियर और अन्य अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई थी। नियमों के अनुसार, मजदूर और उसके पते की भौतिक जांच के बाद ही वर्क स्लिप को मंजूरी मिलनी चाहिए थी।
लेकिन जांच में सामने आया कि अधिकांश मामलों में सत्यापन केवल कागजों तक सीमित रहा। फीस जमा होने के बाद बिना किसी फील्ड जांच के वर्क स्लिप को अप्रूव कर दिया गया। यही नहीं, कई जगह अधिकारियों ने एक ही दिन में दर्जनों वर्क स्लिप स्वीकृत कर दीं।
डीबीटी के जरिए निर्बाध भुगतान
वर्क स्लिप अप्रूव होते ही लाभ राशि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के माध्यम से मजदूरों के खातों में पहुंचती रही। इस प्रक्रिया ने घोटाले को और तेज कर दिया। जांच में यह बात सामने आई है कि अधिकतर मजदूर वास्तविक हैं, लेकिन उनके पंजीकृत पते गलत या अस्तित्वहीन पाए गए।
एक पते पर सैकड़ों मजदूर
जांच रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि कई मामलों में एक ही पते पर 500 से 800 मजदूरों का पंजीकरण दर्ज मिला। यह साफ संकेत है कि सीएससी स्तर पर डाटा भरते समय कोई वास्तविक सत्यापन नहीं किया गया। कई पते तो ऐसे निकले, जहां रहने लायक कोई मकान तक मौजूद नहीं था।
चार महीने, 22 जिले और हजारों फाइलें
हरियाणा के 22 जिलों में करीब चार महीने तक चली जांच के बाद श्रम विभाग अब विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहा है। अधिकारियों का कहना है कि सभी मामलों को एक ही तराजू में नहीं तौला जाएगा। जहां मजदूर वास्तविक हैं लेकिन पते गलत हैं, वहां सुधारात्मक कार्रवाई की जाएगी, जबकि पूरी तरह फर्जी मामलों में कानूनी कार्रवाई तय मानी जा रही है।
फर्जी लाभार्थियों पर गिरेगी गाज
जांच के दौरान कुछ ऐसे आवेदन भी सामने आए हैं, जिनमें न मजदूर मिले और न ही पते का कोई अस्तित्व। ऐसे मामलों को अलग कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की सिफारिश की जाएगी। विभाग का कहना है कि सरकारी धन का गलत इस्तेमाल करने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।
उच्चस्तरीय कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय कमेटी अब जांच रिपोर्ट का अध्ययन कर रही है। माना जा रहा है कि रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद प्रशासनिक स्तर पर बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। इसमें दोषी अधिकारियों की पहचान, सिस्टम में सुधार और भविष्य में ऐसी गड़बड़ियों को रोकने के लिए नए दिशा-निर्देश शामिल होंगे।
सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर असर
यह घोटाला सिर्फ आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता भी प्रभावित हुई है। अब यह देखना अहम होगा कि सरकार इस मामले से क्या सबक लेती है और आम मजदूरों तक योजनाओं का लाभ पारदर्शी तरीके से कैसे पहुंचाया जाता है।

