
ब्रज की होली अब दिल्ली में: चांदनी चौक के लाडली जी मंदिर में 45 दिन तक रंग-भक्ति का उत्सव, एनसीआर से उमड़ी भीड़
दिल्ली के ऐतिहासिक चांदनी चौक में इन दिनों ब्रज की परंपरागत होली की छटा देखने को मिल रही है। लाडली जी राधा-कृष्ण मंदिर में बसंत पंचमी के साथ शुरू हुआ होली महोत्सव करीब 45 दिनों तक चलता है, जिसमें भक्ति, रंग और उत्साह का अनोखा संगम देखने को मिलता है। मथुरा-वृंदावन की परंपरा से प्रेरित इस आयोजन में रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हो रहे हैं।

मंदिर परिसर में राधा-कृष्ण भक्ति से सराबोर वातावरण बनता है। फूलों की होली, गुलाल और हल्के रंगों के साथ श्रद्धालु प्रेम और श्रद्धा के रंगों में रंग जाते हैं। इस दौरान भजन-कीर्तन की गूंज और जयकारों से पूरा मंदिर परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है। दिल्ली ही नहीं, बल्कि नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुरुग्राम जैसे एनसीआर के शहरों से भी लोग यहां पहुंच रहे हैं।
मंदिर के पुजारी नवीन गोस्वामी के अनुसार, इस परंपरा की नींव वर्षों पहले मथुरा-वृंदावन की भक्ति संस्कृति से प्रेरित होकर रखी गई थी। उन्होंने बताया कि यहां होली इस तरह आयोजित की जाती है कि हर आयु वर्ग के लोग बिना किसी असुविधा के इसमें शामिल हो सकें। होली के पूरे 45 दिनों के दौरान प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु मंदिर में दर्शन और उत्सव में भाग लेने आते हैं।
लाडली जी मंदिर की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक अनुभूति भी कराती है। राधा-कृष्ण के साथ खेली जाने वाली यह होली श्रद्धालुओं को भक्ति और शांति का अनुभव देती है। खास बात यह है कि जो लोग भीड़ या दूरी के कारण मथुरा-वृंदावन नहीं जा पाते, उनके लिए यह मंदिर ब्रज की होली का सजीव अनुभव प्रदान करता है।
दिल्ली की रहने वाली श्रद्धालु नेहा बताती हैं कि यहां आकर उन्हें वृंदावन जैसा माहौल महसूस होता है। उनके अनुसार, “यहां फूलों और रंगों के साथ होली मनाने से मन बहुत हल्का और शांत हो जाता है।”
एक अन्य श्रद्धालु का कहना है कि होली के दिनों में मथुरा-वृंदावन में अत्यधिक भीड़ रहती है, जबकि चांदनी चौक का लाडली जी मंदिर परिवार के साथ होली मनाने के लिए अधिक सहज और सुरक्षित विकल्प बन गया है।
हर साल बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या यह दर्शाती है कि लाडली जी मंदिर का यह 45 दिवसीय होली महोत्सव अब दिल्ली की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बन चुका है। ब्रज की परंपरा और राजधानी की विविध संस्कृति का यह मेल लोगों को भक्ति और उल्लास के रंगों में डुबो रहा है।



