
यूपी में दिल के मरीजों के लिए नई उम्मीद, गर्दन की नस से हो रहा हार्ट वाल्व का इलाज
उत्तर प्रदेश में हृदय रोगों के इलाज को लेकर एक बड़ी और सकारात्मक पहल सामने आई है। कानपुर स्थित एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में ऐसी आधुनिक तकनीक अपनाई जा रही है, जिससे दिल के वाल्व की बीमारी से जूझ रहे मरीजों को बिना सर्जरी राहत मिल रही है। इस विधि में जांघ की नस की जगह गर्दन की नस (जुगुलर वेन) के जरिए बैलून डालकर हृदय के वाल्व को खोला जाता है। चिकित्सा की भाषा में इसे ट्रांसजुगुलर बैलून माइट्रल वाल्वुलोटोमी कहा जाता है।

पारंपरिक इलाज से अलग है यह तरीका
अब तक माइट्रल वाल्व की समस्या होने पर अधिकतर मामलों में जांघ की नस के रास्ते बैलून डालकर वाल्व को फैलाया जाता था। लेकिन कई मरीजों में जांघ की नस पतली होती है या जन्म से ही उसमें विकृति होती है। ऐसे मरीजों के लिए यह प्रक्रिया जोखिम भरी साबित हो सकती है। गर्भवती महिलाओं और रीढ़ की गंभीर बीमारी से पीड़ित रोगियों में भी पारंपरिक तरीका जटिलताओं को बढ़ा देता है।
इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट के कार्डियोलॉजी प्रोफेसर डॉ. एसके सिन्हा ने गर्दन की नस के जरिए दिल के वाल्व तक पहुंचने की इस नई तकनीक को सफलतापूर्वक अपनाया है।
कैसे काम करती है यह तकनीक
इस प्रक्रिया में गर्दन की जुगुलर वेन के माध्यम से एक विशेष कैथेटर दिल तक पहुंचाया जाता है। इसके बाद माइट्रल वाल्व में एक बैलून पहुंचाकर उसे सावधानीपूर्वक फुलाया जाता है, जिससे सिकुड़ा हुआ वाल्व खुल जाता है और रक्त प्रवाह सामान्य हो जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया में न तो बड़े ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है और न ही मरीज को लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता है।
कम दर्द, कम खतरा और तेज रिकवरी
इस विधि का सबसे बड़ा फायदा यह है कि मरीज को दर्द बेहद कम होता है और रक्तस्राव की संभावना भी न के बराबर रहती है। जांघ की नस से की जाने वाली प्रक्रिया में जहां मरीज को कई घंटे तक पैर सीधा रखकर लेटना पड़ता है, वहीं गर्दन के रास्ते इलाज होने पर मरीज बहुत जल्दी उठने-बैठने और चलने-फिरने लगता है।
डॉक्टरों के अनुसार, इस तकनीक से मरीजों की रिकवरी तेजी से होती है और वे सामान्य जीवन में जल्द लौट पाते हैं।
किन मरीजों को मिलता है सबसे ज्यादा लाभ
यह तकनीक खासतौर पर उन मरीजों के लिए फायदेमंद साबित हो रही है—
जिनकी जांघ की नसों में रुकावट या जन्मजात विकृति है
जो स्पाइनल कॉर्ड की गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं
जिनकी रीढ़ की हड्डी अत्यधिक टेढ़ी है (काइफोस्कोलियोसिस)
गर्भवती महिलाएं, जिनमें पारंपरिक प्रक्रिया से जटिलताओं का खतरा अधिक रहता है
ऐसे मरीजों में जांघ की नस से बैलून डालने पर जान का खतरा भी हो सकता है, जबकि गर्दन के रास्ते अपनाई जाने वाली यह तकनीक अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित मानी जा रही है।
यूपी में फिलहाल एक ही केंद्र पर सुविधा
डॉ. एसके सिन्हा ने बताया कि बीते दो वर्षों में एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में इस तकनीक से करीब 50 मरीजों का सफल इलाज किया जा चुका है। इनमें से 18 मरीजों के उपचार पर आधारित शोध को वर्ष 2025 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध जर्नल ऑफ अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी में प्रकाशित किया गया है।
उन्होंने यह भी बताया कि देश में अभी केवल चार से पांच शहरों में ही इस तकनीक का उपयोग हो रहा है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह सुविधा फिलहाल सिर्फ एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में ही उपलब्ध है।
एक साथ दो वाल्व का इलाज संभव
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक की मदद से जरूरत पड़ने पर माइट्रल वाल्व के साथ-साथ ट्राइकसपिड वाल्व की मरम्मत भी एक ही प्रक्रिया में की जा सकती है। इससे मरीज को बार-बार इलाज कराने की परेशानी से भी राहत मिलती है।
हृदय चिकित्सा में नई दिशा
चिकित्सा विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रांसजुगुलर बैलून माइट्रल वाल्वुलोटोमी आने वाले समय में हृदय रोगों के इलाज में एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती है। इससे न सिर्फ जटिल मरीजों को सुरक्षित उपचार मिलेगा, बल्कि ओपन हार्ट सर्जरी पर निर्भरता भी कम होगी।
कुल मिलाकर, गर्दन की नस के जरिए दिल के वाल्व का इलाज करने की यह तकनीक उत्तर प्रदेश में हृदय रोगियों के लिए एक बड़ी राहत और चिकित्सा क्षेत्र में एक अहम उपलब्धि मानी जा रही है।



