
2025 का लक्ष्य पीछे छूटा, 2026 में भी दिल्ली में टीबी की चुनौती बरकरार
भारत ने वर्ष 2025 तक तपेदिक (टीबी) के उन्मूलन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया था, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी चिंता बढ़ाने वाली है। वर्ष 2026 में भी राजधानी दिल्ली में टीबी के मरीज लगातार सामने आ रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि बीमारी पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं हो सका है। इंडिया टीबी रिपोर्ट के ताजा आंकड़े इस ओर इशारा करते हैं कि दिल्ली अभी टीबी मुक्त बनने से काफी दूर है।

रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली का टीबी स्कोर 82 रहा है, जिसे विशेषज्ञ संतोषजनक नहीं मानते। स्वास्थ्य जानकारों का कहना है कि यह स्कोर बताता है कि रोकथाम, पहचान और इलाज की मौजूदा व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। दिल्ली जैसे महानगर में आबादी का घनत्व, प्रवासी मजदूरों की बड़ी संख्या और सीमित संसाधनों पर बढ़ता दबाव टीबी नियंत्रण को और जटिल बना देता है।
टीबी नियंत्रण कार्यक्रम के तहत मरीजों की पहचान और इलाज की निगरानी के लिए पेशेंट प्रोवाइडर सपोर्ट सिस्टम (PPSS) लागू किया गया है, ताकि निजी और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाया जा सके। हालांकि दिल्ली के 25 जिलों को इस व्यवस्था के लिए स्वीकृति मिलने के बावजूद अभी तक कोई भी जिला पूरी तरह से इस सिस्टम पर काम नहीं कर पा रहा है। इसका सीधा असर निजी अस्पतालों में इलाज करा रहे टीबी मरीजों की ट्रैकिंग और फॉलोअप पर पड़ रहा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार झुग्गी-झोपड़ी इलाकों में भीड़भाड़, खराब रहन-सहन और जागरूकता की कमी टीबी के फैलाव को बढ़ावा देती है। कई मामलों में मरीज शुरुआती लक्षणों को हल्के में लेते हैं और समय पर जांच नहीं कराते। जब तक खांसी, बुखार या कमजोरी गंभीर रूप नहीं ले लेती, तब तक डॉक्टर के पास नहीं पहुंचते, जिससे बीमारी का इलाज मुश्किल हो जाता है।
गुरु तेग बहादुर अस्पताल, पूर्वी दिल्ली के एडिशनल मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. प्रवीण कुमार बताते हैं कि टीबी एक संक्रामक रोग है, जो माइकोबैक्टेरियम ट्यूबरक्यूलोसिस नामक बैक्टीरिया के कारण होता है। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक खांसी, बुखार, वजन में गिरावट और थकान जैसे लक्षणों को नजरअंदाज करना सबसे बड़ी गलती साबित होती है।
डॉ. प्रवीण कुमार के अनुसार टीबी का सफल इलाज तभी संभव है, जब मरीज दवाओं का पूरा कोर्स नियमित रूप से पूरा करे। दवा बीच में छोड़ने से दवा प्रतिरोधी टीबी का खतरा बढ़ जाता है, जो मरीज और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। इसके साथ ही पोषणयुक्त भोजन भी इलाज का अहम हिस्सा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि टीबी उन्मूलन के लिए केवल दवाइयां ही काफी नहीं हैं। इसके लिए जागरूकता अभियान, समय पर जांच, मजबूत निगरानी व्यवस्था और निजी-सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। जब तक इन सभी पहलुओं पर प्रभावी ढंग से काम नहीं किया जाता, तब तक टीबी मुक्त भारत का सपना हकीकत बनने में समय लगेगा।



